कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने मुवक्किल के वित्तीय विवाद में कानूनी सहायता देने वाले एक वकील के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी के मामले को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि अगर अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने वाले वकीलों को आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ेगा, तो कानूनी पेशे की स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी और वकील लगातार डर के साए में काम करने को मजबूर होंगे।
हाईकोर्ट के जज जस्टिस एम नागप्रसन्न ने 5 अगस्त को दिए अपने फैसले में कहा कि असंतुष्ट मुकदमों को अदालत के अधिकारियों के खिलाफ प्रतिशोध या दबाव बनाने के हथियार के रूप में आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि निराधार आरोपों के आधार पर वकीलों के खिलाफ जांच शुरू करने से उनके निडर होकर काम करने की क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा।
धोखाधड़ी और धमकी के आरोपों का कोई कानूनी आधार नहीं
एडवोकेट मयूर डी भानु के खिलाफ दर्ज मामले की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के अपराध के लिए शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच किसी लेन-देन का होना और शुरुआत से ही बेईमानी की नीयत होना आवश्यक है।
जस्टिस नागप्रसन्न ने पाया कि इस मामले में वकील और शिकायतकर्ता श्रेणिक चंद्रशेखर के बीच कोई लेन-देन नहीं हुआ था। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता का आरोप केवल फोन पर दी गई एक कथित धमकी तक सीमित था, जिससे धोखाधड़ी की धाराएं लगाना तथ्य और कानून दोनों के लिहाज से पूरी तरह आधारहीन है।
वित्तीय विवाद और देर से दर्ज की गई शिकायत
यह पूरा विवाद चंद्रशेखर और वकील के मुवक्किल गौरव के बीच पैसों के लेन-देन को लेकर शुरू हुआ था। घटनाक्रम के अनुसार, 3 फरवरी को चंद्रशेखर एक पुलिस कांस्टेबल और एक अन्य व्यक्ति के साथ बकाया रकम वसूलने गौरव के घर पहुंचे थे। उस दौरान गौरव ने अपने वकील भानु को फोन मिलाकर पुलिस कांस्टेबल से बात करवाई थी।
इसके बाद 2 मार्च को हुई मारपीट के मामले में गौरव ने चंद्रशेखर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इस घटना के ढाई महीने से अधिक समय बाद—3 फरवरी की मुलाकात के तीन महीने बाद—12 मई को चंद्रशेखर ने गौरव और उनके वकील भानु के खिलाफ धोखाधड़ी और धमकी देने की एक क्रॉस-शिकायत दर्ज कराई।
शिकायत में देरी और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत दर्ज कराने में हुई तीन महीने की देरी पर सवाल उठाए। जस्टिस नागप्रसन्न ने कहा कि अगर शिकायतकर्ता को वास्तव में फोन पर धमकी महसूस हुई थी, तो उन्हें तुरंत कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी। बिना किसी स्पष्ट कारण के तीन महीने तक चुप रहना और फिर अस्पष्ट आरोप लगाना, मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने और बाद में सोची-समझी साजिश का स्पष्ट संकेत देता है।
वकील भानु की ओर से पेश हुए एडवोकेट कीर्ति कृष्णा रेड्डी ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल को केवल अपने क्लाइंट को कानूनी सलाह देने के कारण इस विवाद में घसीटा गया है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2025 के ‘सुरेंद्र खावसे बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि जब आपराधिक कार्यवाहियों का इस्तेमाल बदला लेने या उत्पीड़न करने के उद्देश्य से किया जाता है, तो संवैधानिक अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे आरोपों के पीछे की मंशा और परिस्थितियों की गहराई से जांच करें ताकि कानून की प्रक्रिया को उत्पीड़न का जरिया न बनने दिया जाए।

