दशकों तक मकान में रहने से केयरटेकर को मालिकाना हक नहीं मिलता, अचल संपत्ति का मौखिक उपहार मान्य नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी संपत्ति में वर्षों या दशकों तक रहने मात्र से कोई केयरटेकर या अनुमति से रहने वाला व्यक्ति उस संपत्ति पर मालिकाना हक हासिल नहीं कर सकता। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह भी स्पष्ट किया कि Transfer of Property Act, 1882 की धारा 123 के तहत आने वाली अचल संपत्ति का उपहार केवल रजिस्टर्ड दस्तावेज के जरिए ही वैध रूप से किया जा सकता है। कोर्ट ने शाहदरा स्थित संपत्ति के कब्जे से जुड़े मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की adverse possession यानी प्रतिकूल कब्जे की दलील भी नहीं मानी। कोर्ट ने कहा कि उसका कब्जा शुरुआत से ही अनुमति आधारित था और यह न तो स्पष्ट रूप से बताया गया और न साबित किया गया कि वह कब्जा कब और कैसे असली मालिक के खिलाफ शत्रुतापूर्ण हो गया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद दिल्ली के शाहदरा स्थित एक संपत्ति को लेकर था। राजिंदर कौर ने संपत्ति का कब्जा वापस पाने के साथ हर्जाना और mesne profits मांगते हुए सिविल मुकदमा दायर किया था।

वादी के अनुसार, उसने 18 जुलाई 1988 के Receipt, General Power of Attorney और Agreement to Sell के जरिए संपत्ति में अधिकार प्राप्त किए थे। प्रतिवादी चंद्रावती शाह के पति अनिरुद्ध शाह पहले वादी के यहां घरेलू काम में मदद करते थे। बाद में चंद्रावती भी परिवार के घरेलू काम में सहयोग करने लगीं।

वादी के पति की मृत्यु के बाद जब वह अपने बेटे के पास कनाडा गईं, तब चंद्रावती और उनके पति को बिना किराया दिए संपत्ति में रहने की अनुमति दी गई। यह व्यवस्था इस समझ के साथ थी कि वे संपत्ति की देखरेख करेंगे और मांगने पर कब्जा वापस कर देंगे। वादी का कहना था कि यह केवल अस्थायी और अनुमति आधारित व्यवस्था थी, जिससे उनके पक्ष में कोई अधिकार, टाइटल या हित पैदा नहीं हुआ।

जनवरी 2018 में वादी भारत लौटीं और संपत्ति के पुनर्निर्माण के लिए प्रतिवादी से उसे खाली करने को कहा। प्रतिवादी ने कब्जा देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद 21 फरवरी 2018 को कानूनी नोटिस भेजा गया और बाद में कब्जे के लिए मुकदमा दायर किया गया।

9 जुलाई 2024 को जिला जज ने वादी के पक्ष में कब्जे की डिक्री पारित की और ₹1 लाख damages/mesne profits के साथ 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया।

प्रतिवादी ने मौखिक उपहार का दावा किया

प्रतिवादी का मुख्य दावा था कि लगभग 35 वर्ष पहले वादी और उसके पति ने प्रेम और स्नेह के कारण संपत्ति मौखिक रूप से उसे और उसके पति को दे दी थी।

उसका कहना था कि 1984 के सिख दंगों के दौरान उसके पति ने वादी और उसके परिवार की जान बचाई थी और इसी पृष्ठभूमि में संपत्ति उन्हें उपहार में दी गई।

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प्रतिवादी ने वादी के मालिकाना हक को भी चुनौती दी और Suraj Lamp & Industries Pvt. Ltd. v. State of Haryana के फैसले का सहारा लेते हुए कहा कि GPA, Agreement to Sell और Receipt से मालिकाना हक नहीं बनता।

अपील में उसने यह भी कहा कि उसका परिवार करीब चार दशक से संपत्ति में लगातार रह रहा था और इतने लंबे कब्जे के कारण उसने adverse possession के जरिए मालिकाना हक हासिल कर लिया।

वादी ने कहा, मौखिक उपहार साबित नहीं हुआ

वादी की ओर से कहा गया कि प्रतिवादी खुद अपना अधिकार उसी कथित उपहार से जोड़ रही है जो कथित रूप से वादी और उसके पति ने दिया था। इसलिए उस उपहार को साबित करने का भार प्रतिवादी पर था।

रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि प्रतिवादी ने जिरह के दौरान माना कि उसके पास मालिकाना हक का कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है, कोई लिखित gift deed नहीं बनी और संपत्ति अब भी वादी के नाम पर दर्ज है।

वादी ने Transfer of Property Act की धारा 123 पर भी भरोसा किया और कहा कि अचल संपत्ति का मौखिक उपहार कोई अधिकार, टाइटल या हित पैदा नहीं कर सकता।

जिससे अधिकार मिलने का दावा, उसी का हक नकार नहीं सकती: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी का अपना मामला इस आधार पर टिका था कि वादी और उसके पति ने ही संपत्ति उसे दी थी।

कोर्ट के अनुसार, इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिवादी खुद मान रही थी कि वादी और उसके पति के पास ऐसा मालिकाना अधिकार था जिसे वे ट्रांसफर कर सकते थे। ऐसे में वह एक तरफ अपना अधिकार वादी से मिला हुआ बताए और दूसरी तरफ यह कहे कि वादी के अधिकार का कोई कानूनी आधार ही नहीं था, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Suraj Lamp का फैसला Agreement to Sell, GPA या Receipt को पूरी तरह निरर्थक नहीं बनाता। ऐसे दस्तावेज रजिस्टर्ड sale deed का विकल्प बनकर पूर्ण मालिकाना हक नहीं दे सकते, लेकिन पक्षकारों के तुलनात्मक अधिकार और संपत्ति से उनके संबंध की उत्पत्ति तय करते समय इन्हें पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने पाया कि इन दस्तावेजों के साथ बिजली, पानी और नगर निगम के रिकॉर्ड तथा प्रतिवादी की अपनी दलीलों को मिलाकर देखने पर वादी का अधिकार प्रतिवादी की तुलना में बेहतर साबित होता है।

मौखिक उपहार का दावा साबित नहीं

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जिरह के दौरान प्रतिवादी ने स्वीकार किया था:

“मेरे पास यह दावा करने के लिए कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है कि मैं विवादित संपत्ति की मालिक हूं।”

उसने यह भी माना कि कथित उपहार से संबंधित कोई लिखित दस्तावेज या gift deed मौजूद नहीं है और संपत्ति अभी भी वादी के नाम पर है।

हाईकोर्ट ने कहा कि तीन दशक से अधिक पुराने बताए जा रहे इस कथित उपहार का समर्थन करने वाला कोई समकालीन दस्तावेज मौजूद नहीं था।

प्रतिवादी की ओर से पेश किए गए अन्य गवाह भी यह नहीं बता सके कि कथित उपहार कब, कैसे और किन परिस्थितियों में दिया गया था। किसी निश्चित तारीख का उल्लेख नहीं था और न ही ऐसा कोई रिकॉर्ड था जो संपत्ति के ट्रांसफर को दिखाता हो।

अचल संपत्ति के उपहार के लिए रजिस्टर्ड दस्तावेज जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि Transfer of Property Act की धारा 123 के अनुसार अचल संपत्ति का उपहार रजिस्टर्ड दस्तावेज के जरिए ही किया जा सकता है। ऐसे दस्तावेज पर donor या उसकी ओर से हस्ताक्षर होना और कम से कम दो गवाहों से attest होना जरूरी है।

कोर्ट ने Gomtibai v. Mattulal और R.N. Dawar v. Ganga Ram Saran Dhama का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां धारा 123 लागू होती है, वहां केवल मौखिक उपहार से अचल संपत्ति का मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं हो सकता।

केयरटेकर का लंबा कब्जा मालिकाना हक में नहीं बदलता

हाईकोर्ट ने इसके बाद यह जांचा कि क्या कई दशकों तक संपत्ति में रहने से प्रतिवादी को कोई स्वतंत्र मालिकाना अधिकार मिल गया था।

कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी और उसके पति संपत्ति में वादी के परिवार की सहायता और देखरेख के कारण आए थे। उनका कब्जा किसी स्वतंत्र कानूनी अधिकार पर आधारित नहीं था, बल्कि अनुमति से था।

Supreme Court के Maria Margarida Sequeria Fernandes v. Erasmo Jack de Sequeria फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को मुफ्त या देखरेख के उद्देश्य से संपत्ति में रहने दिया गया हो तो वर्षों या दशकों की मौजूदगी से भी उसे उसमें कोई अधिकार नहीं मिलता।

फैसले में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उद्धृत की गई:

“केयरटेकर, चौकीदार या नौकर संपत्ति पर कभी कोई हित हासिल नहीं कर सकता, चाहे उसका कब्जा कितना ही लंबा क्यों न हो, और मांग किए जाने पर उसे तुरंत कब्जा सौंपना होगा।”

हाईकोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक रहने से मूल रूप से अनुमति आधारित कब्जा अपने आप स्वतंत्र मालिकाना अधिकार में नहीं बदल सकता।

Adverse Possession की दलील भी असफल

प्रतिवादी ने adverse possession की दलील अपने Written Statement में नहीं ली थी। इसे पहली बार ट्रायल कोर्ट में अंतिम बहस के दौरान उठाया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि adverse possession के लिए यह साबित करना जरूरी है कि कब्जा शांतिपूर्ण, खुला, लगातार और वास्तविक मालिक के अधिकार के खिलाफ शत्रुतापूर्ण था।

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कोर्ट ने Karnataka Board of Wakf v. Government of India, Konda Lakshmana Bapuji v. Government of A.P., Ravinder Kaur Grewal v. Manjit Kaur और Bhag Singh v. Basant Kaur के फैसलों का उल्लेख किया।

हाईकोर्ट ने पाया कि यह न तो plead किया गया और न साबित हुआ कि प्रतिवादी का अनुमति आधारित कब्जा किस तारीख को वादी के खिलाफ शत्रुतापूर्ण हो गया।

कोर्ट ने कहा कि केवल लंबे समय तक कब्जा जारी रहने से उसके कानूनी स्वरूप में बदलाव नहीं आ जाता।

हाईकोर्ट ने Narasamma v. A. Krishnappa का भी उल्लेख करते हुए कहा कि कोई व्यक्ति एक ही तारीख से एक तरफ दूसरे व्यक्ति से मिले टाइटल का दावा और दूसरी तरफ उसी व्यक्ति के खिलाफ adverse possession का दावा एक साथ नहीं कर सकता।

चूंकि प्रतिवादी ने खुद कहा था कि उसे मालिकाना हक वादी से कथित मौखिक उपहार के जरिए मिला, इसलिए उसे अलग से यह plead और prove करना था कि बाद में किस समय उसका कब्जा वादी के खिलाफ hostile हुआ। ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया।

कोर्ट ने अंततः माना कि adverse possession के आवश्यक तत्व साबित नहीं हुए।

₹1 लाख का हर्जाना वादी ने छोड़ा

ट्रायल कोर्ट ने ₹1 लाख lump sum damages/mesne profits देने का आदेश दिया था। हालांकि संपत्ति की prevailing rental value या mesne profits की वास्तविक राशि तय करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया था।

अपील लंबित रहने के दौरान वादी ने हाईकोर्ट को बताया कि वह प्रतिवादी से damages/mesne profits की रकम लेने की इच्छुक नहीं है। इस तरह उसने डिक्री में मिला मौद्रिक लाभ छोड़ दिया।

अपील खारिज

हाईकोर्ट ने नोट किया कि execution proceedings के दौरान 26 नवंबर 2024 को संपत्ति का कब्जा पहले ही वादी को सौंपा जा चुका था।

कोर्ट ने अपील में कोई मेरिट नहीं पाई और इसे खारिज कर दिया। साथ ही वादी द्वारा अदालत में दिए गए बयान के कारण ₹1 लाख damages/mesne profits और ब्याज की वसूली का अधिकार भी छोड़ दिया गया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Smt. Chandrawati Shah v. Smt. Rajinder Kaur
केस नंबर: RFA 453/2025
बेंच: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
तारीख: 22 सितंबर 2026

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