मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में शिकायतकर्ता के खिलाफ झूठी गवाही देने के आरोप में अभियोजन की कार्रवाई को बरकरार रखा है। जस्टिस संजीव एस कलगांवकर ने कहा कि CrPC की धारा 340 के तहत कार्रवाई तब उचित है, जब गवाह जानबूझकर और सोच-समझकर झूठी गवाही दे, वह गवाही मामले के महत्वपूर्ण पहलू से जुड़ी हो और कोर्ट को न्यायहित में अभियोजन जरूरी लगे। हाईकोर्ट ने अर्जुन प्रसाद त्रिपाठी की अपील खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने IPC की धारा 193 के तहत अपने खिलाफ अभियोजन के आदेश को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने पाया कि रिश्वत ट्रैप के दौरान phenolphthalein लगे नोट देने और स्वीकार किए जाने के संबंध में त्रिपाठी ने अपनी पहले की बात से महत्वपूर्ण रूप से पलटी मारी थी और उनकी गवाही रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य ठोस सामग्री से मेल नहीं खाती थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 23 मार्च 1987 को अर्जुन प्रसाद त्रिपाठी द्वारा लोकायुक्त संगठन, रीवा के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस को दी गई लिखित शिकायत से शुरू हुआ।
त्रिपाठी ने आरोप लगाया था कि MPEB के Divisional Officer के कार्यालय में Assistant Grade-II के पद पर कार्यरत कुंजन लाल रैकवार ने उनकी earned leave application आगे बढ़ाने और बिल क्लियर कराने के लिए ₹200 की अवैध रिश्वत मांगी थी।
इसके बाद ट्रैप की कार्रवाई की गई और रैकवार को पकड़ा गया। ₹200 के phenolphthalein लगे नोट बरामद हुए। लोकायुक्त ने बाद में उनके खिलाफ IPC की धारा 161 और Prevention of Corruption Act, 1947 की धाराओं 5(1)(d) और 5(2) के तहत अभियोजन रिपोर्ट दाखिल की।
30 सितंबर 1993 को स्पेशल जज ने रैकवार को दोषी ठहराया। इसी फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता अर्जुन प्रसाद त्रिपाठी ने ट्रायल के दौरान झूठा बयान दिया और उनके खिलाफ CrPC की धारा 340 के तहत कार्यवाही दर्ज करने का निर्देश दिया।
बाद में रैकवार ने अपनी सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी और 28 मार्च 2006 को उन्हें बरी कर दिया गया। हालांकि हाईकोर्ट ने त्रिपाठी के खिलाफ झूठी गवाही देने के संबंध में कार्रवाई वाले निर्देश में हस्तक्षेप नहीं किया और संबंधित अधिकारियों को कानून के अनुसार आगे बढ़ने को कहा।
इसके बाद First Additional Sessions Judge, Rewa ने 28 जुलाई 2009 को त्रिपाठी के खिलाफ IPC की धारा 193 के तहत अभियोजन का आदेश दिया। इसी आदेश को उन्होंने CrPC की धारा 341 के तहत वर्तमान अपील में चुनौती दी।
अपीलकर्ता की दलीलें
त्रिपाठी की ओर से कहा गया कि अभियोजन का आदेश तथ्यों और कानून की सही सराहना किए बिना पारित किया गया।
उनका तर्क था कि उन्हें जारी नोटिस में यह स्पष्ट नहीं था कि कार्रवाई क्यों शुरू की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि कोर्ट में दिए गए बयान और पुलिस के सामने दिए गए पहले के बयान में अंतर मात्र से झूठी गवाही का मामला नहीं बनता।
यह भी कहा गया कि ट्रैप की घटना पुरानी थी और समय बीतने के कारण याददाश्त कमजोर होने से बयान में कुछ अंतर या omission हो सकते हैं। ऐसे अंतर के आधार पर IPC की धारा 193 के तहत कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
उनके वकील ने यह भी कहा कि पहले वाला बयान उनकी सही बात के अनुसार दर्ज नहीं किया गया था, उन्हें जल्दी में हस्ताक्षर करने को कहा गया और बयान पढ़कर या समझाकर नहीं सुनाया गया।
राज्य ने अपील का विरोध किया
राज्य की ओर से कहा गया कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय कोर्ट दोनों ने यह निष्कर्ष निकाला था कि त्रिपाठी ने झूठा बयान दिया और इसका असर भ्रष्टाचार मामले के परिणाम पर पड़ा।
राज्य ने कहा कि अभियोजन का आदेश उचित था और अपील में कोई मेरिट नहीं है।
धारा 340 CrPC के तहत कब हो सकती है कार्रवाई
हाईकोर्ट ने Himanshu Kumar v. State of Chhattisgarh में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए सिद्धांतों का उल्लेख किया।
Chajoo Ram v. Radhey Shyam के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल किसी बयान में कुछ गलती या असंगति होने से perjury की कार्रवाई शुरू नहीं की जानी चाहिए। इसके लिए महत्वपूर्ण मुद्दे पर जानबूझकर झूठ बोलने का प्रथमदृष्टया मामला होना चाहिए और आरोप के लिए उचित आधार मौजूद होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने R.S. Sujatha v. State of Karnataka और Muthu Karuppan v. Parithi Ilamvazhuthi के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया कि perjury की कार्यवाही असाधारण परिस्थितियों में ही शुरू होनी चाहिए और केवल संदेह पर्याप्त नहीं है।
Aarish Asgar Qureshi v. Fareed Ahmed Qureshi का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि झूठा बयान जानबूझकर और इरादतन दिया गया होना चाहिए और उसे विश्वसनीय तथा निर्विवाद सामग्री से परखा जा सकना चाहिए।
हाईकोर्ट ने धारा 340 CrPC के तहत शिकायत के लिए तीन आवश्यक शर्तें बताईं:
- गवाह ने जानबूझकर और इरादतन झूठी गवाही दी हो।
- झूठी गवाही मामले के महत्वपूर्ण पहलू से संबंधित हो।
- कोर्ट को न्यायहित में ऐसे गवाह के खिलाफ अभियोजन जरूरी लगे।
रिश्वत के नोट देने के मुद्दे पर बदला बयान
रिकॉर्ड के अनुसार, त्रिपाठी ने शिकायत में कहा था कि रैकवार ने travelling allowance और leave encashment से जुड़े दावे क्लियर करने के लिए ₹200 मांगे थे।
ट्रैप के लिए ₹100-₹100 के दो नोटों पर phenolphthalein powder लगाया गया था। अभियोजन का मामला था कि त्रिपाठी ने ये नोट रैकवार को दिए, जिन्होंने उन्हें स्वीकार कर अपनी पैंट की जेब में रख लिया। बाद में रैकवार के हाथ और पैंट की जेब पर phenolphthalein के निशान पाए गए और नोट शौचालय के पास रखे एक माचिस के डिब्बे से बरामद हुए।
लेकिन ट्रायल के दौरान त्रिपाठी ने शिकायत और ट्रैप की कार्रवाई का कुछ हिस्सा तो स्वीकार किया, पर रिश्वत की वास्तविक अदायगी और रैकवार द्वारा नोट लेने के आरोप से पीछे हट गए।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि phenolphthalein लगे नोट देने और लेने के बारे में उनके विरोधाभासी बयान का असर अंततः रैकवार की अपील में बरी होने पर पड़ा।
झूठी गवाही जानबूझकर और मामले के लिए महत्वपूर्ण थी: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि त्रिपाठी ने अपने बयान में इस बात से इनकार किया कि उन्होंने phenolphthalein लगे नोट रैकवार को दिए थे या रैकवार ने उन्हें अपनी पैंट की जेब में रखा था।
इसके विपरीत, रैकवार के हाथ और पैंट की जेब पर phenolphthalein के निशान मिले थे। कोर्ट ने माना कि त्रिपाठी की गवाही रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य ठोस सामग्री से खारिज होती है।
यह सफाई भी स्वीकार नहीं की गई कि उन्होंने पुलिस बयान और अन्य अभियोजन दस्तावेज जल्दबाजी में बिना पढ़े हस्ताक्षर कर दिए थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि First Additional Sessions Judge ने सही निष्कर्ष निकाला कि त्रिपाठी ने जानबूझकर और इरादतन झूठी गवाही दी और यह गवाही मामले के नतीजे के लिए महत्वपूर्ण थी।
अपील खारिज
हाईकोर्ट ने माना कि First Additional Sessions Judge का निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की उचित सराहना पर आधारित था और IPC की धारा 193 के तहत अभियोजन के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं था।
कोर्ट ने अपील को मेरिटहीन बताते हुए खारिज कर दिया।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Arjun Prasad Tripathi v. State of Madhya Pradesh
केस नंबर: Criminal Appeal No. 1559 of 2009
बेंच: जस्टिस संजीव एस कलगांवकर
तारीख: 21 सितंबर 2026

