इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि सार्वजनिक रोजगार एक संवैधानिक विश्वास है और अंतरिम अदालती आदेशों के सहारे हासिल की गई अवैध नौकरियों के वेतन की शत-प्रतिशत वसूली की जाएगी। चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की पीठ ने बागपत जिले के एक शिक्षक की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए 2.16 लाख रुपये की वसूली का आदेश बरकरार रखा है। यदि यह राशि जमा नहीं की जाती है, तो इसे भू-राजस्व के बकाया की तरह वसूला जाएगा।
फर्जीवाड़े से हासिल नौकरी पर कड़ा रुख
हाईकोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी, गलत बयानबाजी या अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करके हासिल की गई नियुक्तियों को कोई कानूनी संरक्षण नहीं दिया जा सकता। पीठ के अनुसार, कानून के उल्लंघन में की गई ऐसी नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता, निष्पक्षता और पारदर्शिता के मूल अधिकारों पर सीधा हमला हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मूल याचिका खारिज हो जाती है, तो अंतरिम आदेश से मिला वित्तीय लाभ भी अपना कानूनी आधार खो देता है और उस राशि को सरकारी खजाने में लौटाना अनिवार्य है।
1992 से शुरू हुआ विवादित मामला
यह मामला बागपत जिले के अहमद शाहपुर (पादड़ा) स्थित शास्त्री स्मारक इंटर कॉलेज का है। दिसंबर 1992 में सुभाष चंद्र त्यागी को सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त किया गया था। यह दावा किया गया था कि शिक्षक वेद प्रकाश हरित के बिना वेतन छुट्टी पर जाने के कारण यह अल्पकालिक रिक्ति बनी थी। जब त्यागी का वेतन रोका गया, तो उन्होंने 1993 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अंतरिम आदेश प्राप्त कर लिया। इसी आदेश के आधार पर 23 मई 1995 को तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी, जिससे त्यागी वर्षों तक सरकारी खजाने से वेतन लेते रहे।
जांच में काल्पनिक निकला शिक्षक का नाम
वर्ष 2010 और 2011 में जब इस याचिका पर अंतिम सुनवाई हुई, तब राज्य सरकार ने अदालत के सामने चौंकाने वाले तथ्य रखे। सरकारी रिकॉर्ड और वेतन रजिस्टरों की जांच में पाया गया कि वेद प्रकाश हरित नाम के किसी व्यक्ति का कोई अस्तित्व ही नहीं था और न ही उनके अवैतनिक अवकाश से संबंधित कोई दस्तावेज संस्थान में मौजूद थे। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक ने यह जांचे बिना ही नियुक्ति को मंजूरी दे दी थी कि हरित वास्तव में मौजूद थे या फर्जी रिक्ति बनाने के लिए गढ़ा गया एक काल्पनिक नाम थे।
दोषी अधिकारी पर कार्रवाई और बर्खास्तगी
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि मंजूरी देने वाले तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक एस. एस. रावत 96 फर्जी नियुक्तियों और अवैध वेतन वितरण के मामले में विभागीय जांच में दोषी पाए गए थे। इस वजह से उनकी ग्रेच्युटी जब्त कर ली गई थी और पेंशन में 50 प्रतिशत की स्थायी कटौती की गई थी। याचिका खारिज होने के बाद, 19 और 20 जनवरी 2011 को त्यागी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। जब उन्होंने इस बर्खास्तगी और 2.16 लाख रुपये के हर्जाने को चुनौती दी, तो एकल पीठ ने उनकी अपील खारिज कर दी थी, जिसे अब डिवीजन बेंच ने भी कायम रखा है।
पुनर्स्थापना का सिद्धांत और उत्तर प्रदेश अधिनियम का खारिज होना
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की धारा 33-एफ का हवाला देने वाली त्यागी की दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए पीठ ने दोहराया कि अंतरिम आदेश के आधार पर प्राप्त कोई भी लाभ अंतिम निर्णय के अधीन होता है। अदालत ने साफ किया कि बर्खास्त याचिका से मिला वेतन किसी जायज अधिकार का फल नहीं था, बल्कि एक ऐसी अस्थायी व्यवस्था का हिस्सा था जिसका याचिका खारिज होते ही कोई कानूनी आधार नहीं बचा।

