इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय शामिल हैं, ने अपने तीन नाबालिग बच्चों को नदी में डुबोकर मारने के आरोप में एक मां को दी गई फांसी की सजा और सह-अभियुक्त की उम्रकैद को पूरी तरह निरस्त करते हुए दोनों को बाइज्जत बरी कर दिया है। बिना किसी ठोस समर्थन वाले बाल गवाह के बयानों की विधिक विश्वसनीयता और अभियोजन पक्ष द्वारा मुख्य गवाह को अदालत में पेश न करने के गंभीर कानूनी बिंदु पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। बेंच ने रेखांकित किया कि आठ वर्षीय बाल गवाह की गवाही गंभीर अंतर्विरोधों से घिरी है और उसमें सिखाए-पढ़ाए जाने (ट्यूटरिंग) के स्पष्ट लक्षण मौजूद हैं। साथ ही, घटना की सबसे पहली सूचना पुलिस को देने वाले ग्राम प्रधान को अदालत में पेश न करने पर हाईकोर्ट ने अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 27 जून 2024 की सुबह करीब 5:00 बजे का है, जब सेंगर नदी में डूबने से तीन मासूम बच्चों (उम्र 6 वर्ष, 5 वर्ष और 4 वर्ष) की मौत हो गई थी। घटना की पहली सूचना संबंधित गांव के ग्राम प्रधान ने औरैया के कोतवाली थाने को दोपहर 13:44 बजे दी, जिसे जनरल डायरी (जीडी) संख्या 36 पर दर्ज किया गया। हालांकि पुलिस ने उस समय कोई एफआईआर दर्ज नहीं की, लेकिन सूचना के आधार पर सेंगर नदी के पुल के पास पहुंचकर तीनों बच्चों के शव बरामद किए गए। पुलिस ने दोपहर 13:41 से 14:25 बजे के बीच नदी किनारे ही पंचायतनामा तैयार किया और इसके बाद शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। इन शुरुआती दस्तावेजों में किसी भी अपराध संख्या का उल्लेख नहीं था।
उसी दिन शाम 18:44 बजे मृतक बच्चों के चाचा ने कोतवाली थाने में एफआईआर दर्ज कराई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके बड़े भाई की मौत दो साल पहले हो चुकी थी और बच्चों की मां का अपने रिश्तेदार (सह-अभियुक्त) के साथ कथित प्रेम संबंध था। शिकायतकर्ता के अनुसार, दोनों अभियुक्तों ने अपने रिश्ते के बीच बाधा बन रहे चारों बच्चों को रास्ते से हटाने की साजिश रची। आरोप लगाया गया कि मां अपने चारों बच्चों को नदी किनारे ले गई और उन्हें एक-एक कर डुबोने लगी, लेकिन सबसे बड़ा बेटा (आठ वर्ष) अपनी जान बचाकर भाग निकला और उसने इस घटना की जानकारी अपने चाचा को दी।
पुलिस जांच पूरी होने के बाद दोनों अभियुक्तों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302, 307 और 120-बी के तहत आरोप तय किए गए। ट्रायल के दौरान अभियोजन ने सात गवाह पेश किए। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (कोर्ट संख्या 3), औरैया ने 5/10 जुलाई 2025 के निर्णय में दोनों अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 302 सहपठित 120-बी के तहत उम्रकैद और एक-एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट ने मां को धारा 302 के तहत फांसी की सजा सुनाई, जिसे पुष्टि के लिए हाईकोर्ट में रेफरेंस के तौर पर भेजा गया था। अभियुक्तों ने भी अपनी सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
पक्षों की दलीलें
हाईकोर्ट में अपीलकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता व एमिकस क्यूरी ने दलील दी कि पूरा मामला केवल आठ वर्षीय बाल गवाह की अविश्वसनीय और ट्यूटर की गई गवाही पर टिका हुआ है। बचाव पक्ष ने कहा कि घटनास्थल पर बच्चे की मौजूदगी पूरी तरह संदिग्ध है। यदि बच्चे ने सुबह ही अपने चाचा को घटना बताई थी, तो एफआईआर दर्ज कराने में शाम 18:44 बजे तक की देरी क्यों हुई? इसके अलावा, पुलिस ने बच्चे का बयान घटना के आठ दिन बाद 5 जुलाई 2024 को दर्ज किया, जिससे स्पष्ट है कि इस अवधि में बच्चे को उसकी बुआ और फूफा द्वारा सिखाया-पढ़ाया गया था।
बचाव पक्ष ने यह भी जोरदार तरीके से उठाया कि चार्जशीट में गवाह के रूप में दर्ज होने के बावजूद ग्राम प्रधान को अदालत में पेश नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले तोमासो ब्रूनो बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कहा गया कि जब अभियोजन सबसे अहम और प्राथमिक साक्ष्य को अदालत से छुपाता है, तो कानूनन उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। इसके साथ ही यह स्वाभाविक मानवीय आचरण के भी विपरीत है कि यदि कोई मां सभी बच्चों को खत्म करना चाहती, तो वह सबसे बड़े बच्चे को जीवित क्यों छोड़ती जो उसके खिलाफ गवाही दे सकता था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने सजा का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि तीन अबोध बच्चों को बेरहमी से डुबोकर मारना अत्यंत नृशंस कृत्य है, जो समाज की अंतरात्मा को झकझोर देता है और यह मामला ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) की श्रेणी में आता है। एजीए ने तर्क दिया कि बाल गवाह ने घटना को प्रत्यक्ष देखा था और उसका बयान सुसंगत व विश्वसनीय है, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई फांसी की सजा को बरकरार रखा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
डिवीजन बेंच ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 118 के तहत बाल गवाह की सक्षमता और विश्वसनीयता के कानूनी सिद्धांतों का गहन विश्लेषण किया। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा रमेश्वर बनाम राजस्थान राज्य में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख करते हुए बेंच ने उद्धृत किया:
“प्रत्येक गवाह गवाही देने के लिए सक्षम है, जब तक कि अदालत यह न माने कि वह कम उम्र, अत्यधिक वृद्धावस्था, शारीरिक या मानसिक बीमारी या इसी तरह के किसी अन्य कारण से पूछे गए सवालों को समझने या उनका तर्कसंगत उत्तर देने में असमर्थ है। वास्तव में योग्यता हमेशा मानी जाती है जब तक कि अदालत अन्यथा विचार न करे… जजों और मजिस्ट्रेटों के लिए यह हमेशा वांछनीय है कि वे अपनी यह राय दर्ज करें कि बच्चा सच बोलने के कर्तव्य को समझता है और यह बताएं कि वे ऐसा क्यों सोचते हैं, अन्यथा गवाह की विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है, यहां तक कि कुछ मामलों में साक्ष्य को पूरी तरह से खारिज करना पड़ सकता है।”
हाईकोर्ट ने बाल गवाहों के साक्ष्य से जुड़े अन्य निर्णयों—प्रदीप बनाम हरियाणा राज्य, मंगू बनाम मध्य प्रदेश राज्य, पांचू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और मध्य प्रदेश राज्य बनाम रमेश—का हवाला देते हुए कहा कि बच्चे कच्ची उम्र के कारण आसानी से बाहरी प्रभाव और ट्यूटरिंग के शिकार हो जाते हैं। प्रस्तुत मामले में बच्चे की गवाही का परीक्षण करते हुए कोर्ट ने पाया:
“उपर्युक्त न्यायिक दृष्टांतों में प्रतिपादित सिद्धांतों को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए, यह अदालत पाती है कि 8 वर्षीय बाल गवाह की एकमात्र गवाही गंभीर अंतर्विरोधों से ग्रस्त है और इसमें सिखाए-पढ़ाए जाने के स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं, जिससे इसे दोषसिद्धि का एकमात्र आधार बनाना पूरी तरह असुरक्षित हो जाता है।”
कोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत स्वाभाविक मानवीय आचरण के आधार पर अभियोजन की कहानी को परखते हुए गंभीर टिप्पणी की:
“अभियोजन पक्ष का दावा है कि अपीलकर्ता-मां ने अपने 4, 5 और 6 वर्ष के तीन बच्चों की निर्मम हत्या कर दी, लेकिन 8 वर्ष के बच्चे को बिना नुकसान पहुंचाए छोड़ दिया ताकि वह उसके खिलाफ चश्मदीद गवाह बन सके। यह परिकल्पना स्वाभाविक रूप से असंभव और अप्राकृतिक है। यदि किसी आरोपी मां में अपनी संतानों को समाप्त करने की आपराधिक मंशा आ गई थी, तो यह बुनियादी तर्क और मानवीय व्यवहार के विपरीत है कि वह सबसे बड़े बच्चे को छोड़ देगी जो बोलने, देखने और उस पर आरोप लगाने में पूरी तरह सक्षम था।”
डिवीजन बेंच ने प्रथम सूचनाकर्ता (चाचा) की गवाही में आए गंभीर विरोधाभासों को भी चिन्हित किया। चाचा ने पहले कहा कि उसे घटना की सूचना ग्राम प्रधान से मिली, फिर कहा कि रिश्तेदार चाची ने सूचना दी। उसने सुबह से घटनास्थल पर मौजूद रहने का दावा किया, लेकिन तीनों में से किसी भी पंचायतनामे पर उसके हस्ताक्षर मौजूद नहीं थे। साथ ही, घटनास्थल का नक्शा बनाने को लेकर जांच अधिकारी और शिकायतकर्ता के बयानों में सीधा टकराव दिखा।
ग्राम प्रधान को गवाह के रूप में अदालत में पेश न किए जाने पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले तखाजी हिराजी बनाम ठाकोर कुबेरसिंह चमनसिंह का हवाला देते हुए टिप्पणी की:
“यह चूक अभियोजन के मामले में एक ऐसा शून्य छोड़ती है जिसे पाटा नहीं जा सकता। ऐसी परिस्थितियों में अदालत अभियोजन पक्ष के विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य है। हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि यदि प्रधान को पेश किया जाता और उनसे जिरह की जाती, तो उनकी गवाही अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं करती, या फिर घटना की वास्तविक शुरुआत उजागर हो जाती, जो पुलिस द्वारा पेश किए गए संस्करण से बिल्कुल अलग हो सकती थी।”
जांच की गंभीर कमियों पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने माना:
“घटना के दिन ही पीडब्ल्यू-2 का बयान दर्ज करने में जानबूझकर की गई विफलता, जबकि प्रधान के अनुसार पुलिस घटना के दिन ही पीडब्ल्यू-2 को थाने ले गई थी; घटनास्थल का नक्शा किसकी निशानदेही पर तैयार किया गया, इस पर परस्पर विरोधी बयान; प्रधान द्वारा दिए गए आवेदन पर एफआईआर दर्ज न करना—यद्यपि उसमें संज्ञेय अपराध का खुलासा हुआ था और उस पर जीडी प्रविष्टि भी की गई थी—अभियोजन पक्ष के मामले की जड़ को हिला देती है और उसकी विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न करती है।”
कोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि अभियोजन पक्ष दोनों अभियुक्तों के खिलाफ आरोपों को बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। किसी भी व्यक्ति को केवल सिखाए-पढ़ाए गए बाल गवाह, सर्वोत्तम साक्ष्य को छुपाने और भारी जांच संबंधी खामियों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने सतर्कता के नियम का पालन करते हुए दोनों अभियुक्तों को संदेह का लाभ दिया।
इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों अभियुक्तों की अपीलों को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा 5/10 जुलाई 2025 को पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने मां की फांसी की सजा और सह-अभियुक्त की उम्रकैद को रद्द करते हुए दोनों को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया और निर्देश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों, तो उन्हें तत्काल जेल से रिहा किया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: प्रियंका बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: कैपिटल केसेज संख्या – 14 / 2025 साथ में रेफरेंस संख्या 11 / 2025
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय
निर्णय की तिथि: 22 सितंबर 2026

