असहमति का अपराधीकरण लोकतंत्र के लिए खतरनाक: सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस उज्ज्वल भुयान

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों और सामान्य गतिविधियों के बढ़ते अपराधीकरण पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि नागरिकों के असहमति जताने के अधिकार को दबाया जा रहा है और अदालतों द्वारा दी जाने वाली सख्त ज़मानत शर्तें भी बुनियादी आजादियों को सीमित कर रही हैं। भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में शनिवार को आयोजित जस्टिस जी.पी. सिंह के चौथे मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बातें कहीं।

गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाने से लेकर छात्र आंदोलनों का ज़िक्र

व्याख्यान के दौरान जस्टिस भुयान ने गंगा नदी पर उपवास तोड़ते समय चिकन बिरयानी खाने पर कुछ युवाओं की गिरफ्तारी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि उस स्थान पर चिकन खाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है और यह कोई अपराध नहीं हो सकता, फिर भी उन युवाओं को तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा।

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उन्होंने पर्यावरण कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ हो रही दंडात्मक कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के नुकसान पर चिंता जताने वाले लोगों को अपराधियों की तरह खदेड़ दिया जाता है। वहीं, परिसरों में विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर 30 से 40 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है। इसके अलावा उन्हें शैक्षणिक निलंबन का सामना करना पड़ता है, जिसे रद्द कराने के लिए दोबारा कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।

ज़मानत की सख्त शर्तों और अदालती फैसलों पर सवाल

जनसभाओं में शामिल होने या सोशल मीडिया पोस्ट करने पर रोक लगाने वाली ज़मानत शर्तों की आलोचना करते हुए उन्होंने पूछा कि क्या अदालतें ऐसे कड़े प्रतिबंध लगाकर अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को असहमति व्यक्त करने से हतोत्साहित कर रही हैं। उन्होंने कहा कि हालांकि अदालतें ज़मानत देती हैं, लेकिन कई बार राहत मिलने में काफी देरी हो जाती है।

इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2024 में ‘बुलडोज़र जस्टिस’ के खिलाफ सुनाए गए निर्णय का स्वागत करते हुए उन्होंने टिप्पणी की कि यह कदम सही था, लेकिन दो साल देर से आया।

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अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रदर्शन और सेवानिवृत्त जजों के राजनीतिक पद

बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा फलस्तीन के समर्थन में रैली की अनुमति न देने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि अदालत द्वारा यह पूछा जाना अजीब था कि लोग भारत के आंतरिक मुद्दों के बजाय गाजा पर प्रदर्शन क्यों करना चाहते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि भारत के फलस्तीन के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध हैं और नई दिल्ली में उसका दूतावास भी मौजूद है।

पूर्व जजों के सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक पद स्वीकार करने की प्रवृत्ति पर भी उन्होंने कड़ा रुख अपनाया। पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा राज्यसभा जाने के पीछे ‘न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच दूरी खत्म करने’ के दिए गए तर्क को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि इस सोच में ही बुनियादी खराबी है।

न्यायिक फैसलों की समीक्षा और नई पीढ़ी से उम्मीद

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जस्टिस भुयान ने कानून के छात्रों और विद्वानों का आह्वान किया कि वे अदालती फैसलों की आलोचनात्मक समीक्षा करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी निर्णय का मूल्यांकन या आलोचना करना जज की व्यक्तिगत निष्ठा पर हमला नहीं है। न्यायपालिका की वैधता और साख आंतरिक आत्म-मूल्यांकन के बजाय जनता के विश्वास पर टिकी होती है।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने युवा वकीलों और छात्रों पर भरोसा जताते हुए कहा कि नई पीढ़ी संविधान और कानून के शासन के प्रति पुरानी पीढ़ियों की तुलना में अधिक प्रतिबद्ध नजर आती है।

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