“दक्षिण भारतीय हिंदी न जानने के कारण अलग-थलग नहीं होना चाहते”: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने न्यायपालिका में भाषाई संयम की आवश्यकता पर जोर दिया

भारत की समृद्ध भाषाई विविधता और एक संपर्क भाषा की व्यावहारिक आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए, सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारतीय केवल इसलिए अलग-थलग (Isolate) नहीं होना चाहते क्योंकि वे हिंदी नहीं जानते हैं। जस्टिस नागरत्ना ने भाषाई विशिष्टता (Exclusivity) के प्रति आगाह करते हुए याद दिलाया कि भारत एक देश ही नहीं, बल्कि एक उपमहाद्वीप है जहां संविधान के तहत कई भाषाओं को मान्यता प्राप्त है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने न्यायपालिका में हिंदी के उपयोग के संबंध में मौखिक रूप से महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भाषा नीतियों में संयम (Moderation) की आवश्यकता है ताकि कोई भी क्षेत्र खुद को बेगाना महसूस न करे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान में अंग्रेजी ही वह भाषा है जो दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों को आपस में जोड़ती है और संवैधानिक अदालतों में न्याय प्रशासन के लिए अनिवार्य है। जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि उनकी ये टिप्पणियाँ राजनीतिक नहीं हैं, बल्कि भारत के संवैधानिक और जनसांख्यिकीय यथार्थ पर आधारित हैं।

यह वाकया उस समय हुआ जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत कानूनी बिरादरी के सवालों का जवाब दे रहे थे। एक महिला वकील ने उन वकीलों के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में चिंता जताई थी जो अपनी स्थानीय भाषाओं में तो निपुण हैं, लेकिन अंग्रेजी में उन्हें महारत हासिल नहीं है।

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मुख्य न्यायाधीश के जवाब के बाद, न्यायपालिका में हिंदी के उपयोग को लेकर एक विशिष्ट प्रश्न पूछा गया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, जस्टिस नागरत्ना ने विस्तार से बताया कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में किसी एक भाषा को विशेष रूप से क्यों नहीं थोपा जा सकता या उस पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता।

जस्टिस नागरत्ना ने भारत को केवल एक देश के रूप में नहीं, बल्कि एक उपमहाद्वीप के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया। विविधता की संवैधानिक मान्यता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा, “संविधान की 8वीं अनुसूची में बहुत सी भाषाएं हैं, और दक्षिण भारत में ही कम से कम छह भाषाएं बोली जाती हैं।”

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गैर-हिंदी भाषी लोगों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के लोगों की आशंकाओं को संबोधित करते हुए, जस्टिस नागरत्ना ने कहा:

“दक्षिण भारतीय हिंदी न जानने के कारण अलग-थलग नहीं होना चाहते। दक्षिण से आने के नाते मैं यह बात कह रही हूं।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि भाषाई कट्टरता या विशिष्टता पूरे के पूरे क्षेत्रों को अलग-थलग कर सकती है। उन्होंने टिप्पणी की, “कोई भी अपनी भाषा को लेकर बहुत विशिष्ट (Exclusive) नहीं हो सकता।”

जस्टिस नागरत्ना ने भाषाई खाई को पाटने में अंग्रेजी की व्यावहारिक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों को जोड़ने वाली भाषा अंग्रेजी ही है। व्यावहारिक कठिनाइयों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि तमिलनाडु जैसे राज्यों में, यदि कोई केवल हिंदी पर निर्भर रहता है, तो संचार एक बड़ा मुद्दा बन जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आम जनता न तो हिंदी बोलती है और न ही अंग्रेजी, फिर भी अंतर-राज्यीय और संवैधानिक संचार का माध्यम अंग्रेजी ही बनी हुई है।

जस्टिस नागरत्ना ने विशेष रूप से उच्च न्यायपालिका में भाषा के प्रशासनिक प्रभावों को संबोधित किया। उन्होंने सवाल उठाया कि अंग्रेजी जैसी सामान्य भाषा के बिना जजों का विभिन्न हाईकोर्ट (High Courts) में स्थानांतरण कैसे संभव होगा।

“जिला अदालतों में हमारे पास कन्नड़, तमिल आदि जैसी अपनी व्यक्तिगत भाषाएं हैं। लेकिन संवैधानिक अदालतों में अंग्रेजी आधिकारिक भाषा है। अन्यथा, हम जजों को विभिन्न हाईकोर्ट में कैसे ट्रांसफर करेंगे?”

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जस्टिस नागरत्ना ने न्यायपालिका में भाषा से संबंधित विमर्श में “संयम” बरतने का आह्वान करते हुए अपनी बात समाप्त की। उन्होंने दोहराया कि उनका रुख राजनीति से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से न्यायपालिका के प्रभावी कामकाज और राष्ट्र की एकता पर केंद्रित है। उनकी टिप्पणियाँ भारतीय न्यायिक प्रणाली में एक एकीकृत माध्यम के रूप में अंग्रेजी की निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित करती हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी क्षेत्रों के न्यायाधीश और कानूनी पेशेवर भाषा की बाधाओं के कारण अलग-थलग पड़े बिना देश भर में प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें।

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