इस्तीफे के बाद बाउंस हुए चेक के लिए पूर्व प्रधानाचार्य को एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी शैक्षणिक संस्थान का पूर्व प्रधानाचार्य पद से इस्तीफा देने के बाद बाउंस हुए चेक के मामले में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत आपराधिक मुकदमे का सामना नहीं करेगा। जस्टिस अनूप कुमार ढांड की एकल पीठ ने 74 वर्षीय मोहन लाल शर्मा के खिलाफ निचली अदालत द्वारा जारी संज्ञान आदेश और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए माना कि इस्तीफा देने के साथ ही नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध समाप्त हो जाता है, जिसके बाद व्यक्ति को संस्थान के वित्तीय या प्रबंधकीय मामलों के लिए जवाबदेह नहीं बनाया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मोहन लाल शर्मा बूंदी जिले के नैनवां स्थित सेंट सोल्जर सीनियर सेकेंडरी स्कूल में प्रधानाचार्य के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने 24 मार्च 2017 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद, शिकायतकर्ता अशोक वर्धन सिंह ने 10 मई 2017 को बैंक में उनके हस्ताक्षर वाला 28 अप्रैल 2017 की तारीख का एक चेक प्रस्तुत किया। बैंक ने ‘खाते में अपर्याप्त राशि’ (फंड्स इंसफिशिएंट) की टिप्पणी के साथ चेक को बाउंस कर दिया।

शिकायतकर्ता ने एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें शर्मा (पूर्व प्रधानाचार्य के रूप में), वर्तमान प्रधानाचार्य प्रियंका शर्मा के माध्यम से स्कूल और स्कूल के निदेशक राजवीर सुआलिका को आरोपी बनाया गया। नैनवां के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने 1 सितंबर 2017 को केवल पूर्व प्रधानाचार्य मोहन लाल शर्मा के खिलाफ अपराध का संज्ञान लिया, जबकि स्कूल प्रबंधन या उसके निदेशक के खिलाफ कोई संज्ञान नहीं लिया गया। इस आदेश से व्यथित होकर शर्मा ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि संबंधित चेक मूल रूप से सेवा में रहने के दौरान सुरक्षा (सिक्योरिटी) के रूप में दिया गया था और शर्मा द्वारा 24 मार्च 2017 को इस्तीफा देने के बाद इसका दुरुपयोग किया गया। उन्होंने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं अपनी शिकायत में शर्मा के इस्तीफे की बात स्वीकार की थी। याचिकाकर्ता के वकील ने जोर दिया कि जब किसी पूर्व प्रधानाचार्य का प्रासंगिक समय पर स्कूल के प्रबंधन में कोई हस्ताक्षेप नहीं था, तो उन पर कोई अप्रत्यक्ष दायित्व (विकेरियस लायबिलिटी) नहीं डाला जा सकता, और प्राथमिक दायित्व स्वयं स्कूल संस्थान का था।

दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि विवादित चेक पर शर्मा के हस्ताक्षर मौजूद थे और वह खाते में अपर्याप्त राशि के कारण बाउंस हुआ था, इसलिए प्रथम दृष्टया एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध बनता है। शिकायतकर्ता का कहना था कि ट्रायल कोर्ट का संज्ञान आदेश कानून के अनुकूल था और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और नज़ीरें

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि शर्मा ने 24 मार्च 2017 को इस्तीफा दे दिया था, जबकि चेक पर 28 अप्रैल 2017 की तारीख दर्ज थी और उसे मई 2017 में बैंक में पेश किया गया था। इस प्रकार, जब चेक बैंक में प्रस्तुत या बाउंस हुआ, उस समय शर्मा प्रधानाचार्य के रूप में कोई आधिकारिक दायित्व नहीं निभा रहे थे। एक पूर्व कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही करने और प्रबंधन को बख्श देने के निचली अदालत के फैसले पर चिंता व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही एक गंभीर मामला है क्योंकि यह उस व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है। किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में घसीटने से उसकी प्रतिष्ठा को उससे बड़ा कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।”

इस्तीफा दे चुके अधिकारियों की देनदारी के संबंध में कानूनी स्थिति का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पूर्व निर्णयों का हवाला दिया:

  1. अधिराज सिंह बनाम योगराज सिंह एवं अन्य (2024): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी: “पक्षकारों के विद्वान वकीलों द्वारा दी गई दलीलों पर विचार करने के बाद, हम पाते हैं कि वर्तमान मामले में चेक जारी होने की तारीख को अपीलकर्ता पहले ही इस्तीफा दे चुका था। इस्तीफे के संबंध में तथ्य विवाद में नहीं है। यह भी विवाद में नहीं है कि कंपनी द्वारा जारी चेक पर कंपनी की ओर से एक अन्य सक्षम व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। एक बार जब तथ्य स्पष्ट और साफ हैं कि जब कंपनी द्वारा चेक जारी किए गए थे, तब अपीलकर्ता इस्तीफा दे चुका था और कंपनी में निदेशक नहीं था तथा कंपनी से जुड़ा नहीं था, तो एनआई एक्ट की धारा 141 के प्रावधानों के आलोक में उसे कंपनी के मामलों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।”
  2. अनिता मल्होत्रा बनाम परिधान निर्यात संवर्धन परिषद एवं अन्य (2012): सुप्रीम कोर्ट ने माना था: “चूंकि 30.09.1999 की वार्षिक विवरण (एनुअल रिटर्न) की प्रमाणित प्रति एक सार्वजनिक दस्तावेज है, विशेष रूप से भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 74(2) के साथ पठित कंपनी अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के मद्देनजर, हम मानते हैं कि अपीलकर्ता ने वर्ष 1998 में ही कंपनी की निदेशक के पद से वैध रूप से इस्तीफा दे दिया था और उन्हें वर्ष 2004 में जारी किए गए चेक के बाउंस होने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।”
  3. के. सुंदरी बनाम सी.ए.आर.पी. मारी (2024): मद्रास हाईकोर्ट ने भी यही माना था कि शिकायत दर्ज होने से पहले इस्तीफा दे चुके अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के खिलाफ एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकती।
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इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“याचिकाकर्ता स्कूल के प्रधानाचार्य पद से अपने इस्तीफे के बाद, अपने हस्ताक्षरों के तहत जारी किए गए चेक (यदि कोई हो) के लिए न तो उत्तरदायी है और न ही जिम्मेदार है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने आपराधिक विविध याचिका को स्वीकार करते हुए नैनवां के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 1 सितंबर 2017 को पारित संज्ञान आदेश को याचिकाकर्ता की हद तक रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता संस्थान के मामलों और कथित अपराध के लिए जिम्मेदार वास्तविक व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र है।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मोहन लाल शर्मा बनाम अशोक वर्धन सिंह एवं अन्य
वाद संख्या: एस.बी. क्रिमिनल मिसलेनियस (पिटिशन) नंबर 7077/2021
पीठ: जस्टिस अनूप कुमार ढांड
निर्णय की तिथि: 14/07/2026

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