इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के वरिष्ठ अधिकारी राजेश कुमार सिंह को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही और विभागीय चार्जशीट को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी भ्रष्ट मंशा या दुर्भावना के बिना सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर ‘अनापत्ति’ (नो ऑब्जेक्शन) देना सेवा नियमों के तहत कदाचार नहीं माना जा सकता।
12 सप्ताह के भीतर सभी सेवा और पदोन्नति लाभ बहाल करने का आदेश
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने चार्जशीट के साथ-साथ उससे संबंधित सभी दंडात्मक कार्यवाहियों को खारिज कर दिया। इसके साथ ही खंडपीठ ने सक्षम प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 12 सप्ताह के भीतर आईएएस अधिकारी के वे सभी सेवा लाभ बहाल करें, जो उन्हें अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू न होने की स्थिति में मिलते। अदालत ने साफ किया कि इन लाभों में उनकी पदोन्नति और बकाया वित्तीय परिलाभ भी शामिल रहेंगे।
दुर्भावना के अभाव में कदम को कदाचार मानना अनुचित: अदालत
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने रेखांकित किया कि अधिकारी के आचरण में किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत लाभ, भ्रष्टाचार या दुर्भावनापूर्ण इरादा नजर नहीं आता। अदालत ने कहा कि जब कोई प्रशासनिक अधिकारी विधिक राय के आधार पर अपने पदीय दायित्वों का निर्वहन करता है और उसमें किसी गलत मंशा का अभाव हो, तो ऐसी आधिकारिक सहमति को कदाचार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
कोलकाता की कंपनी और सीबीआई क्लोजर रिपोर्ट से जुड़ा है प्रकरण
यह पूरा मामला उस समय का है जब राजेश कुमार सिंह भारी उद्योग विभाग में संयुक्त सचिव और मुख्य सतर्कता अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। उस दौरान उन्हें कोलकाता स्थित सार्वजनिक उपक्रम ‘ब्रिज एंड रूफ कंपनी (इंडिया) लिमिटेड’ के तत्कालीन अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) एम.के. सिंह के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) में प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश मिला था।
जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने विशेष सीबीआई अदालत के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। संबंधित अभियोजन अधिकारी की कानूनी सलाह के आधार पर राजेश कुमार सिंह ने इस क्लोजर रिपोर्ट पर अपनी अनापत्ति दर्ज कराई, जिसे विशेष अदालत ने भी स्वीकार कर लिया। हालांकि, बाद में विभागीय अधिकारियों ने क्लोजर रिपोर्ट पर सहमति देने को आधार बनाते हुए उनके खिलाफ चार्जशीट जारी कर दी और अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू कर दी थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया है।

