गुजरात हाईकोर्ट ने खुद को वकील बताकर कई लोगों से लगभग ₹80 लाख की ठगी करने वाली एक कानून की छात्रा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि वकालत जैसे “नेक पेशे को इस तरह कलंकित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
आवेदक साधु फाल्गुनी मितेशकुमार ने मेहसाणा के कड़ी पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी (FIR) के संबंध में गिरफ्तारी से बचने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत की गुहार लगाई थी। यह मामला भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ा है।
मामले की पृष्ठभूमि
प्राथमिकी के अनुसार, आवेदक और अन्य आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने आवेदक को एक अभ्यास करने वाली वकील के रूप में पेश किया और शिकायतकर्ता सहित अन्य लोगों से बड़ी रकम ऐंठी। पुलिस जांच में यह बात सामने आई है कि आवेदक अभी एलएलबी की छात्रा है, फिर भी वह एक पेशेवर वकील के रूप में काम कर रही थी।
पक्षों की दलीलें
आवेदक की ओर से: आवेदक के वकील श्री बकुल एस. पांचाल ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल को दुर्भावनापूर्ण इरादे से झूठा फंसाया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि आवेदक एलएलबी के अंतिम सेमेस्टर की छात्रा है और केवल एक जूनियर इंटर्न के रूप में काम कर रही है। बचाव पक्ष ने दावा किया कि उसने कभी अदालत में वकालतनामा पेश नहीं किया और न ही वह कभी कोर्ट में पेश हुई। वकील ने यह भी कहा कि आवेदक ने केवल अपने वकील देवर के राजस्व संबंधी कार्यों में मदद की थी और शिकायतकर्ता ने फीस देने से बचने के लिए यह झूठी प्राथमिकी दर्ज कराई है।
राज्य सरकार की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) श्री चिंतन दवे ने जमानत का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि जांच के दौरान कई आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई है, जिनमें शामिल हैं:
- बार काउंसिल ऑफ गुजरात द्वारा जारी आवेदक के नाम का पहचान पत्र और नामांकन संख्या।
- “सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की एडवोकेट” के नाम वाली नेमप्लेट।
- विभिन्न पुलिस स्टेशनों की मुहरें और नोटरी रजिस्टर।
- आवेदक के नाम वाला हैंडबैग और कैलेंडर जिस पर उसे हाईकोर्ट की वकील बताया गया है।
अभियोजन पक्ष ने सूचित किया कि अब तक की जांच में लगभग ₹80,00,000 की ठगी का मामला सामने आया है, जिसमें आवेदक और अन्य आरोपी शामिल हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस पी. एम. रावल ने मामले के कागजातों और पुलिस द्वारा की गई जब्ती का अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि कड़ी स्थित एक दुकान और आवेदक के घर से ऐसे कई साक्ष्य मिले हैं जो साबित करते हैं कि आवेदक ने कानून की छात्रा होने के बावजूद खुद को वकील के रूप में प्रस्तुत किया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“यह प्रतीत होता है कि वकालत के नेक पेशे को इस तरह से कलंकित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
अदालत ने कहा कि इस अपराध की जड़ों तक पहुंचने, अन्य शामिल व्यक्तियों की पहचान करने और ठगी गई ₹80 लाख की रकम का पता लगाने के लिए आवेदक से हिरासत में पूछताछ (custodial interrogation) आवश्यक है। संविधान पीठ द्वारा श्री गुरुबख्श सिंह सिब्बिया एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य (1980) 2 SCC 665 के मामले में निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर, कोर्ट ने माना कि आवेदक को अग्रिम जमानत देने का कोई ठोस आधार नहीं बनता।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482 के तहत अपने विवेकाधीन अधिकार का उपयोग करने के लिए कोई असाधारण आधार नहीं पाया और अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। आवेदक के वकील द्वारा आदेश पर रोक लगाने की मांग को भी अदालत ने नामंजूर कर दिया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: साधु फाल्गुनी मितेशकुमार बनाम गुजरात राज्य
- केस नंबर: R/Criminal Misc. Application No. 5522 of 2026
- बेंच: जस्टिस पी. एम. रावल
- दिनांक: 08/04/2026

