जजों  की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका की गंभीर दखलंदाजी: पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर

भारत के पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर ने बुधवार को न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि जजों  की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका की “गंभीर दखलंदाजी” हो रही है, जो न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।

द ग्लोबल ज्यूरिस्ट्स द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में “न्यायपालिका में नैतिकता: एक आदर्श या एक विरोधाभास” विषय पर बोलते हुए जस्टिस लोकुर ने कहा:

“जजों  की नियुक्ति को लेकर हाल के समय में कई समस्याएं सामने आई हैं। मेरा मानना है कि इस प्रक्रिया में कार्यपालिका की काफी दखलंदाजी हुई है।”

उन्होंने बताया कि जजों  की नियुक्ति के लिए मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) काफी पहले ही सरकार की सहमति से तैयार कर लिया गया था, लेकिन इसके बावजूद इसके क्रियान्वयन में अनेक बाधाएं उत्पन्न की गईं।

“कई बार नियुक्तियों में योग्यता की बजाय उन मामलों को आधार बनाया जाता है, जिन्हें संबंधित व्यक्ति ने पहले निर्णय किया हो। योग्य और उत्कृष्ट अधिवक्ताओं को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।”

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पारदर्शिता की कमी और वरिष्ठता में हेरफेर

जस्टिस लोकुर ने कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह कार्यपालिका के हाथ में हो जाए, तो “शरारत” की संभावना बनी रहती है।

“किसी कनिष्ठ व्यक्ति को पहले नियुक्त कर दिया जाता है, और किसी वरिष्ठ को छह-सात महीने तक लंबित रख दिया जाता है, ताकि उसकी वरिष्ठता समाप्त हो जाए — और यह सब हो रहा है।”

उन्होंने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता पर बल दिया — न केवल हाई कोर्ट  और सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की ओर से, बल्कि सरकार की ओर से भी।

दो महाभियोग प्रस्ताव लंबित

जस्टिस लोकुर ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि देश के इतिहास में पहली बार दो जजों  के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद और राज्यसभा में लंबित हैं — एक जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ, और दूसरा जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ।

“हमें इस बात पर सतर्क रहना होगा कि किस प्रकार के व्यक्तियों को न्यायपालिका में नियुक्त किया जा रहा है, और नियुक्ति के बाद उन पर सतत निगरानी भी होनी चाहिए।”

तबादले और सेवानिवृत्ति के बाद की नियुक्तियां

जस्टिस लोकुर ने जजों  के मनमाने तबादलों पर भी नाराजगी जताई और वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर के तबादले का उदाहरण दिया। उन्होंने इसे “सरकार की नापसंदगी” के कारण हुआ तबादला बताया।

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उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद जजों  को राजनीतिक और संवैधानिक पदों पर नियुक्त किए जाने पर भी सवाल उठाए।

“हमारे एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यसभा की सीट दी गई। एक अन्य सेवानिवृत्त न्यायाधीश को राज्यपाल बनाया गया, और एक तीसरे को भी राज्यपाल पद मिला। एक न्यायाधीश तो पद से इस्तीफा देकर सीधे राजनीति में चले गए और सांसद बन गए।”

कठिन अंग्रेजी में लिखे निर्णय

जस्टिस लोकुर ने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायिक निर्णयों की भाषा आम जनता और वकीलों के लिए समझने योग्य होनी चाहिए।

“मैंने कुछ ऐसे निर्णय देखे जिनमें अंग्रेजी इतनी जटिल थी कि न वकील समझ सके, न न्यायाधीश — और यह स्थिति आज देखने को मिल रही है।”

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