सूरत नासिर नगर तोड़फोड़ मामला: गुजरात हाईकोर्ट ने सरकार और पुलिस को जवाब दाखिल करने के लिए दिया अतिरिक्त समय

गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत के नासिर नगर में हुई अवैध तोड़फोड़ के मामले में राज्य सरकार और सूरत पुलिस को अपना जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दे दिया है। इस अनधिकृत कार्रवाई के कारण नासिर नगर में रहने वाले 100 से अधिक परिवार बेघर हो गए थे। कोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई तय की है।

जस्टिस निखिल करियल की पीठ के समक्ष गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सरकारी वकील जी.एच. विर्क ने सूरत में बाढ़ की मौजूदा स्थिति का हवाला देते हुए पुलिस कमिश्नर का हलफनामा पेश करने के लिए कुछ और दिनों की मोहलत मांगी। दूसरी तरफ, सूरत नगर निगम (एसएमसी) की ओर से पेश महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने भी कोर्ट के रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों की समीक्षा करने के लिए एक हफ्ते का समय मांगा। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के अनुरोधों को स्वीकार करते हुए सुनवाई टाल दी।

यह कानूनी कार्रवाई नासिर नगर के 26 प्रभावित निवासियों द्वारा दायर एक याचिका पर की जा रही है, जिन्होंने इस कार्रवाई को अवैध बताते हुए जवाबदेही तय करने और उचित पुनर्वास की मांग की है। बीते 30 मई को बिना किसी पूर्व सूचना या लिखित आदेश के इन लोगों के आशियाने ढहा दिए गए थे, जिसे बाद में नगर निगम ने सीमांकन की सामान्य कार्रवाई का हिस्सा बताया था।

पीड़ित परिवारों के पुनर्वास और पुलिस की भूमिका पर कोर्ट के निर्देश

इससे पहले 1 जुलाई को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सूरत नगर निगम कमिश्नर के हलफनामे के आधार पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। नगर निगम ने स्वीकार किया था कि यह तोड़फोड़ बिना किसी वैध आदेश के हुई थी, जिसे कोर्ट ने निगम द्वारा अपनी गलती स्वीकार करने जैसा माना था।

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हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि प्रभावित लोगों को तुरंत बसाना और उनका पुनर्वास करना पूरी तरह से नगर निगम की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने नगर निगम कमिश्नर को आदेश दिया था कि वे या तो मूल स्थान पर ही मकानों का पुनर्निर्माण कराएं या फिर वैकल्पिक आवास की एक ठोस योजना हलफनामे के जरिए पेश करें।

इसके साथ ही, अदालत ने गुजरात सरकार को भी इस पूरे मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि जब यह कार्रवाई अवैध थी, तो पुलिस को तोड़फोड़ करने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा देने के बजाय स्थानीय लोगों की शिकायतों पर त्वरित कदम उठाने चाहिए थे।

निलंबित अधिकारियों के निजी वकीलों को कोर्ट से राहत

गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया गया कि याचिका में व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी बनाए गए नगर निगम के निलंबित अधिकारियों ने अपने बचाव के लिए अलग से निजी वकील नियुक्त किए हैं। इन अधिकारियों में अधिशासी अभियंता (सड़क विकास) सुजल प्रजापति, नगर नियोजन विभाग के नरेश गलचार, जूनियर इंजीनियर मोनिक गढिया और सहायक अभियंता जैनिश पटेल शामिल हैं।

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निजी वकीलों ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ने उनके वकालतनामों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और उन पर नगर निगम की आधिकारिक मुहर लगवाने को कहा जा रहा था। जस्टिस करियल ने रजिस्ट्री के इस निर्देश को खारिज करते हुए कहा कि चूंकि अधिकारियों को उनकी व्यक्तिगत क्षमता में आरोपी बनाया गया है, इसलिए रजिस्ट्री को उनके वकालतनामों को बिना किसी आधिकारिक मुहर के स्वीकार करना चाहिए।

नगर निगम की आंतरिक जांच में सामने आया था कि जिम्मेदार अधिकारियों ने तोड़फोड़ की इस पूरी घटना को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने सच छुपाया था, जिसके बाद मामले की विस्तृत जांच के आदेश देते हुए पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था।

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