दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली पुलिस की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पूर्व कांग्रेस पार्षद इशरत जहां को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की “बड़ी साजिश” के मामले में दी गई जमानत को चुनौती दी गई थी। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के 2022 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जहां पिछले चार वर्षों से जमानत पर हैं और उनके द्वारा जमानत की शर्तों के उल्लंघन का कोई आरोप नहीं है।
दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट का रुख कर 14 मार्च, 2022 को ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को रद्द करने की मांग की थी, जिसके तहत इशरत जहां को जमानत मिली थी। पुलिस ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला “अनुचित” (perverse) था और इसमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत अपराधों की गंभीरता पर विचार नहीं किया गया।
अधिकारियों का आरोप था कि जहां फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा की “मास्टरमाइंड” थीं। इन दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। अभियोजन पक्ष ने यह भी दावा किया कि आरोपियों द्वारा किया गया “चक्का-जाम” एक “आतंकवादी कृत्य” था और जहां अन्य साजिशकर्ताओं के साथ “नजदीकी रूप से जुड़ी” थीं।
पुलिस की अपील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने जमानत मिलने के बाद से बीते समय को महत्वपूर्ण माना। बेंच ने कहा कि जमानत दिए जाने के बाद चार साल से अधिक का समय बीत चुका है और राज्य की ओर से ऐसा कोई सबूत या आरोप नहीं लगाया गया है जिससे पता चले कि प्रतिवादी ने अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है।
बेंच ने अपने आदेश में कहा, “चुनौती दिए गए आदेश के बाद चार साल से अधिक की लंबी अवधि बीत चुकी है और ऐसा कोई आरोप नहीं है कि प्रतिवादी ने किसी भी तरह से जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है। हम इस आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं।”
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने सुझाव दिया कि कोर्ट को इसी मामले के एक अन्य आरोपी के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में लंबित फैसले का इंतजार करना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट की बेंच ने टिप्पणी की कि जमानत के दौरान जहां के आचरण और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए “अपील में अब कुछ शेष नहीं रह गया है।”
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद ट्रायल कोर्ट के मार्च 2022 के निष्कर्ष प्रभावी रहेंगे। ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि हालांकि UAPA के तहत जमानत मिलना कठिन है, लेकिन जहां की विशिष्ट भूमिका को देखते हुए उन्हें राहत दी गई थी।
ट्रायल कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित थे:
- शारीरिक अनुपस्थिति: दंगे के समय इशरत जहां उत्तर-पूर्वी दिल्ली में शारीरिक रूप से मौजूद नहीं थीं।
- विरोध स्थल: वह खुरेजी में चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल थीं, जो उन इलाकों में नहीं आता जहां दंगे हुए थे।
- साक्ष्यों का अभाव: उनका नाम किसी भी सीसीटीवी फुटेज, साजिश वाली बैठकों या हिंसा के समय हुई कॉल्स की लिस्ट में नहीं था।
- व्हाट्सएप ग्रुप: वह उन व्हाट्सएप ग्रुपों या संगठनों की सदस्य नहीं थीं, जिन्होंने “चक्का-जाम” की योजना बनाने का आरोप झेला है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस की अपील खारिज करने का अर्थ मामले के गुणों (merits) पर कोई राय व्यक्त करना नहीं है।
यह मामला उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों से जुड़ा है, जो वर्तमान में हिरासत में हैं। गौरतलब है कि 2 सितंबर, 2025 को हाईकोर्ट की एक अन्य बेंच ने इमाम, खालिद और मीरान हैदर की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इस “बड़ी साजिश” की एफआईआर में इशरत जहां उन गिने-चुने आरोपियों में से हैं जो जमानत पर बाहर हैं।

