‘अपरिपक्व दिमाग की आशंकाएं’: सॉलिसिटर जनरल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ रिक्यूजल याचिकाओं पर अवमानना कार्यवाही की मांग की

दिल्ली हाईकोर्ट में शराब नीति मामले की सुनवाई के दौरान सोमवार को उस समय तीखी बहस देखने को मिली, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और अन्य आप नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आग्रह किया। वरिष्ठ कानून अधिकारी ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को इस मामले से हटने (रिक्यूजल) के लिए दी गई याचिकाओं को “अपरिपक्व दिमाग की आशंकाएं” करार दिया और कहा कि यह न्यायपालिका में डर पैदा करने की एक कोशिश है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस शर्मा ने सोमवार देर शाम अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

यह विवाद अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, दुर्गेश पाठक और अन्य द्वारा दायर उन आवेदनों से उपजा है, जिनमें जस्टिस शर्मा से सीबीआई की उस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग करने का अनुरोध किया गया है, जो उनके डिस्चार्ज के खिलाफ दायर की गई है। उल्लेखनीय है कि 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को यह कहते हुए आरोपमुक्त कर दिया था कि सीबीआई का मामला “न्यायिक जांच में टिकने में पूरी तरह असमर्थ” है।

हालांकि, 9 मार्च को जस्टिस शर्मा ने सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी किया था और कहा था कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष “प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण” प्रतीत होते हैं। उन्होंने जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश पर भी रोक लगा दी थी।

सोमवार को व्यक्तिगत रूप से पेश होते हुए केजरीवाल ने तर्क दिया कि इस बात की “गंभीर और वास्तविक आशंका” है कि सुनवाई निष्पक्ष नहीं होगी। उन्होंने अदालत की “गति” पर सवाल उठाते हुए कहा कि अन्य मामलों की तुलना में इस केस को जिस तेजी से सुना जा रहा है और अदालत जिस तरह से जांच एजेंसियों की दलीलों का “समर्थन” कर रही है, वह एक चिंताजनक रुझान है।

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केजरीवाल ने अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में जस्टिस शर्मा की उपस्थिति पर भी आपत्ति जताई और इसे निष्पक्षता के खिलाफ बताया।

सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दावों का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि जज के हटने की सीमा बहुत ऊंची होती है और यह एक “दुर्लभ” उपाय होना चाहिए।

मेहता ने तर्क दिया, “यह संस्थागत सम्मान का मामला है। यदि यही मानक रहा, तो क्या अदालत जनता की भावनाओं के आधार पर फैसले करेगी?” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जज इन “निराधार आरोपों” के दबाव में आकर खुद को अलग करती हैं, तो यह पूरी न्यायिक प्रणाली के लिए एक “गलत मिसाल” कायम करेगा।

विशिष्ट आरोपों का जवाब देते हुए मेहता ने कहा:

  • राजनीतिक झुकाव पर: उन्होंने अधिवक्ता परिषद का बचाव करते हुए इसे एक “बार एसोसिएशन” बताया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई जज इसके कानूनी कार्यक्रमों में शामिल होते रहे हैं।
  • पिछले आदेशों पर: उन्होंने स्पष्ट किया कि जस्टिस शर्मा की पिछली टिप्पणियाँ केवल “अनंतिम” (Tentative) थीं, जो उस समय की परिस्थितियों पर आधारित थीं।
  • सुनवाई की गति पर: उन्होंने बताया कि सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों को तेजी से निपटाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत छोटी तारीखें दी गई थीं।
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सॉलिसिटर जनरल ने अंत में अदालत से इन याचिकाओं को भारी जुर्माने के साथ खारिज करने और अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की।

यह मामला जस्टिस शर्मा के पास तब पहुंचा जब दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय ने केजरीवाल के उस अनुरोध को खारिज कर दिया था, जिसमें सीबीआई की याचिका को किसी अन्य बेंच में स्थानांतरित करने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया था कि रिक्यूजल का निर्णय संबंधित जज को ही लेना होता है।

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