“आप वकील बन सकते हैं”: केजरीवाल की दलीलों से प्रभावित जज की टिप्पणी, सुनवाई से हटने की याचिका पर फैसला सुरक्षित

दिल्ली आबकारी नीति मामले में सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट में एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने खुद पैरवी करते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से इस मामले की सुनवाई से हटने (recusal) की गुहार लगाई। करीब एक घंटे तक केजरीवाल की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस शर्मा ने उनकी सराहना करते हुए कहा, “आपने बहुत अच्छी दलीलें पेश कीं। आप वकील बन सकते हैं।”

इस पर केजरीवाल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि वह अपने मौजूदा पेशे से खुश हैं। लगभग पांच घंटे तक चली इस मैराथन सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है कि क्या जस्टिस शर्मा को इस मामले की सुनवाई जारी रखनी चाहिए या नहीं।

सुनवाई से हटने की मांग क्यों?

पूरा मामला सीबीआई की उस याचिका से जुड़ा है जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को दी गई क्लीन चिट (डिस्चार्ज) को चुनौती दी गई है। केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच से इस मामले को हटाने के लिए आवेदन दिया था। उन्होंने निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूर्व में जज ने उनके खिलाफ कई कड़े फैसले दिए हैं।

अदालत में अपनी बात रखते हुए केजरीवाल ने निम्नलिखित आपत्तियां उठाईं:

  • राहत देने से इनकार: केजरीवाल ने कहा कि इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर इसी जज ने उन्हें राहत देने से मना कर दिया था।
  • सख्त टिप्पणियाँ: उन्होंने तर्क दिया कि मनीष सिसोदिया और के कविता की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान जज ने ऐसी “ठोस और निर्णायक” टिप्पणियाँ कीं, जिनसे उनके मामले पर असर पड़ सकता है।
  • पूर्वाग्रह की आशंका: अपनी चिंता जताते हुए केजरीवाल ने कहा, “मुझे लगभग दोषी घोषित कर दिया गया था। मुझे लगभग भ्रष्ट करार दिया गया था। केवल सजा सुनानी बाकी रह गई थी।”
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खुद पैरवी करने का इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक ने अदालत में खुद अपनी बात रखी हो। इससे पहले 28 मार्च 2024 को भी उन्होंने ट्रायल कोर्ट में अपनी कस्टडी बढ़ाने की सुनवाई के दौरान जज को सीधे संबोधित किया था। सोमवार को भी, वरिष्ठ वकीलों की मौजूदगी के बावजूद, उन्होंने खुद मोर्चा संभाला।

सुनवाई के दौरान जब जज ने केजरीवाल के कानूनी कौशल की तारीफ की, तो मनीष सिसोदिया की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने मजाक में कहा कि मुख्यमंत्री को वकालत में आकर “प्रतिस्पर्धा नहीं बढ़ानी चाहिए।”

क्या है पूरा मामला?

विवाद की जड़ 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया वह आदेश है, जिसमें केजरीवाल और सिसोदिया सहित 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया गया था। ट्रायल कोर्ट ने सीबीआई की जांच की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था कि एजेंसी का मामला न्यायिक जांच में टिकने लायक नहीं है।

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हालांकि, 9 मार्च को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सीबीआई की अपील पर सभी आरोपियों को नोटिस जारी किया था। उन्होंने कहा था कि प्रथम दृष्टया ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में कुछ कमियां नजर आती हैं जिन पर विचार करने की जरूरत है।

अब हाईकोर्ट को यह तय करना है कि क्या जस्टिस शर्मा इस याचिका पर आगे सुनवाई करेंगी या इसे किसी अन्य बेंच को सौंपा जाएगा।

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