दिल्ली हाईकोर्ट का सवाल: 5 साल बाद आसिफ इकबाल तन्हा की ‘मीडिया लीक’ याचिका में अब क्या बचा है?

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली दंगों के आरोपी आसिफ इकबाल तन्हा की उस याचिका पर कड़ी टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने मीडिया में अपने “खुलासा बयान” के कथित लीक होने का मुद्दा उठाया था। जस्टिस सौरभ बनर्जी ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि 2020 में दायर की गई इस याचिका का अब कोई खास मतलब नहीं रह गया है और यह “निरर्थक होने की कगार” पर है।

यह मामला एक याचिका से जुड़ा है जिसमें उन पुलिस अधिकारियों और मीडिया घरानों के खिलाफ जांच और कार्रवाई की मांग की गई है, जिन्होंने कथित तौर पर एक “गोपनीय” खुलासा बयान लीक किया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि ट्रायल कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने से पहले मीडिया संगठनों द्वारा उनके कथित अपराध स्वीकार करने की बातों को प्रसारित करना “प्रोग्राम कोड” का उल्लंघन है और यह निष्पक्ष सुनवाई के उनके अधिकार को प्रभावित करता है।

आसिफ इकबाल तन्हा को मई 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़े “बड़ी साजिश” के मामले में गिरफ्तार किया गया था। बाद में जून 2021 में हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी थी। अगस्त 2020 में, तन्हा ने कुछ मीडिया संस्थानों की उन खबरों के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया था, जिनमें दावा किया गया था कि उन्होंने दंगों की साजिश रचने की बात कबूल कर ली है। तन्हा ने आरोप लगाया कि पुलिस हिरासत में उनसे जबरन कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे और उन्होंने सार्वजनिक मंचों से इस संवेदनशील जानकारी को हटाने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता की ओर से: वकील सौजन्या शंकरन ने तर्क दिया कि पांच साल का समय बीत जाने मात्र से याचिका निरर्थक नहीं हो जाती, क्योंकि इस देरी के लिए कोई भी पक्ष जिम्मेदार नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि याचिकाकर्ता अभी भी इससे प्रभावित हैं क्योंकि मुख्य साजिश मामले में अभी तक आरोप (charges) तय नहीं किए गए हैं। शंकरन ने यह भी कहा कि दिल्ली पुलिस द्वारा इस लीक मामले में की गई आंतरिक जांच केवल एक “दिखावा” थी और जिम्मेदार अधिकारियों के आचरण की औपचारिक जांच जरूरी है।

राज्य (पुलिस) की ओर से: दिल्ली पुलिस ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट में कहा कि हालांकि आंतरिक जांच में यह निश्चित रूप से पता नहीं चल पाया कि जांच का विवरण मीडिया तक कैसे पहुंचा, लेकिन इस लीक से तन्हा के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है।

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जस्टिस सौरभ बनर्जी ने प्रथम दृष्टया विचार व्यक्त किया कि याचिका अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। कोर्ट ने कहा:

“यह मामला अपनी उम्र पूरी कर चुका है। यह निष्पक्ष रूप से निरर्थक होने की कगार पर है। इसमें अब कुछ भी शेष नहीं है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि 2020 में याचिका दायर होने के बाद से “काफी समय बीत चुका है” (much water has flown)। याचिकाकर्ता द्वारा अन्य कानूनी उपायों का सहारा न लेने पर पीठ ने टिप्पणी की:

“मैं उनकी इस दलील से सहमत हूं कि हाईकोर्ट आने का इरादा सही हो सकता है, लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद क्या बचता है? याचिकाकर्ता ने कानून के उचित प्रावधानों का सहारा लेने के अपने मौलिक अधिकार का प्रयोग नहीं किया है।”

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जस्टिस बनर्जी ने हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह कोई “आरटीआई फोरम या तथ्य खोजने वाली अथॉरिटी” नहीं है। कोर्ट ने विशेष रूप से याचिकाकर्ता से पूछा कि यदि उन्हें लगता था कि कोई आपराधिक कृत्य हुआ है, तो उन्होंने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए।

हाईकोर्ट ने मंगलवार को याचिका को खारिज नहीं किया, लेकिन मामले को अप्रैल में अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया ताकि समय बीतने के आलोक में याचिका की कानूनी स्थिति पर आगे विचार किया जा सके।

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