दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 102 के तहत पुलिस द्वारा की गई संपत्ति की जब्ती केवल इसलिए अवैध नहीं हो जाती कि इसकी सूचना मजिस्ट्रेट को देने में देरी हुई है। धारा 482 CrPC के तहत एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सौरभ बनर्जी ने निचली अदालतों के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें केवल रिपोर्टिंग में देरी के आधार पर एक बैंक खाते को डी-फ्रीज करने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने जोर दिया कि कानून में प्रयुक्त शब्द “forthwith” (तत्काल) की व्याख्या तार्किक और परिस्थितियों के आधार पर की जानी चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला साल 2013 की एक एफआईआर (FIR No. 236/2013) से जुड़ा है, जिसमें धोखाधड़ी और जालसाजी (धारा 420/467/468/471/120B IPC) के आरोप लगाए गए थे। याचिकाकर्ता नरिंदर कुमार नांगिया का आरोप था कि प्रतिवादी नंबर 2 ने एक कृषि भूमि के मूल मालिकाना हक के दस्तावेज सुरक्षा के तौर पर याचिकाकर्ता के पास होने के बावजूद, धोखाधड़ी से उस जमीन को किसी तीसरे पक्ष को बेच दिया।
इस कथित धोखाधड़ी से प्राप्त राशि का एक हिस्सा प्रतिवादी नंबर 2 के आईसीआईसीआई बैंक खाते में जमा किया गया था। जांच अधिकारी ने 27 अगस्त 2014 को धारा 102(1) CrPC के तहत इस खाते को फ्रीज कर दिया और 23 सितंबर 2014 को इसकी सूचना ट्रायल कोर्ट को दी। प्रतिवादी नंबर 2 ने इस देरी को आधार बनाकर खाता खोलने की अर्जी दी, जिसे ट्रायल कोर्ट और बाद में रिविजनल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के लिए: याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Shento Varghese vs. Julfikar Husen (2024) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 102(3) CrPC के तहत “तत्काल” सूचना देने का प्रावधान केवल निर्देश मात्र (directory) है, अनिवार्य (mandatory) नहीं। देरी एक प्रशासनिक अनियमितता हो सकती है, लेकिन इसके कारण पूरी जब्ती की प्रक्रिया को शून्य नहीं किया जा सकता।
राज्य के लिए: राज्य की ओर से पेश एपीपी (APP) ने याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि जांच में फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल की पुष्टि हुई है, इसलिए अपराध की कमाई को सुरक्षित रखने के लिए खाते को फ्रीज करना सही कदम था।
प्रतिवादी नंबर 2 के लिए: प्रतिवादी के वकील ने भी Shento Varghese मामले का उल्लेख किया, लेकिन उनका तर्क था कि इस फैसले के अनुसार देरी का “उचित कारण” बताया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि देरी काफी अधिक थी और जांच एजेंसी ने इसका कोई ठोस कारण नहीं दिया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया कि क्या धारा 102(3) CrPC के तहत ‘तत्काल’ शब्द का पालन न होने पर पूरी जब्ती रद्द हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ देते हुए जस्टिस बनर्जी ने कहा:
“‘forthwith’ शब्द का अर्थ है ‘जितनी जल्दी हो सके’, ‘तार्किक गति और तत्परता के साथ’ और ‘बिना किसी अनावश्यक देरी के’।”
कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि कानून में कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं है, इसलिए इसे परिस्थितियों के आधार पर “उचित समय” के रूप में समझा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा:
“…जब्ती की कार्रवाई केवल इस तरह की देरी के आधार पर दूषित (vitiated) नहीं होगी।”
अदालत ने समझाया कि यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि देरी जानबूझकर की गई है या लापरवाही बरती गई है, तो वह संबंधित अधिकारी के खिलाफ “विभागीय कार्रवाई” का निर्देश दे सकते हैं, लेकिन इसके आधार पर जब्ती को रद्द नहीं किया जा सकता। देरी का प्रभाव ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के मूल्यांकन के समय देखा जा सकता है।
कोर्ट का निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट और रिविजनल कोर्ट ने कानून की व्याख्या करने में गलती की है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“विद्वान ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश के माध्यम से धारा 102 Cr.P.C. के तहत की गई जब्ती को रद्द नहीं किया जा सकता था।”
हाईकोर्ट ने धारा 482 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए 20 अगस्त 2022 और 5 अप्रैल 2022 के आदेशों को रद्द कर दिया। इसके साथ ही याचिका स्वीकार कर ली गई और बैंक खाते पर लगा फ्रीज बरकरार रहा।
मामले का विवरण
केस टाइटल: नरिंदर कुमार नांगिया बनाम राज्य एवं अन्य
केस नंबर: CRL.M.C. 4599/2022
पीठ: जस्टिस सौरभ बनर्जी
दिनांक: 17 अप्रैल, 2026

