नोटिस के चरण में कोर्ट केवल ‘प्राइमा फेसी’ केस देखता है; दिल्ली हाईकोर्ट ने जानलेवा कार दुर्घटना मामले में नाबालिग पर धारा 304 पार्ट II के तहत आरोप बरकरार रखे

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक नाबालिग (जिसे मास्टर एम के रूप में संदर्भित किया गया है) द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज कर दिया है। याचिका में गैर-इरादतन हत्या (IPC की धारा 304 पार्ट-II) के तहत आरोप तय किए जाने को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया (Prima Facie) किसी गंभीर अपराध के तत्वों को प्रकट करती है, तो वही आरोप तय करना अधिक तर्कसंगत है, ताकि मुकदमे के दौरान आरोपी की मानसिक स्थिति का सही निर्धारण किया जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 4 अप्रैल 2016 को दिल्ली के श्याम नाथ मार्ग, सिविल लाइंस के पास हुई एक दुखद दुर्घटना से संबंधित है। आरोप है कि याचिकाकर्ता (जो उस समय 18 वर्ष की आयु से केवल 4 दिन कम था) द्वारा चलाई जा रही मर्सिडीज बेंज कार ने सड़क पार कर रहे सिद्धार्थ शर्मा को जोरदार टक्कर मारी। अगले दिन घायल की अस्पताल में मृत्यु हो गई।

जांच के दौरान यह सामने आया कि याचिकाकर्ता के नाम पर पहले भी ओवर-स्पीडिंग सहित कई ट्रैफिक चालान हो चुके थे। चश्मदीदों और कार में मौजूद अन्य साथियों के बयानों के अनुसार, कार 80-100 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलाई जा रही थी, जबकि वहां गति सीमा केवल 50 किमी प्रति घंटा थी। एफएसएल रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि टायर के घिसने के निशान (Skid marks) नहीं थे, जिससे संकेत मिला कि ब्रेक नहीं लगाए गए थे। पुलिस ने शुरू में लापरवाही से मौत (धारा 304A IPC) का मामला दर्ज किया था, लेकिन बाद में याचिकाकर्ता की “जानकारी” (Knowledge) और गंभीर परिस्थितियों के आधार पर धारा 304 IPC जोड़ दी गई।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से: नाबालिग के वकील ने तर्क दिया कि धारा 304 पार्ट-II के लिए आवश्यक “जानकारी” का तत्व इस मामले में मौजूद नहीं था। उनकी दलीलें थीं कि:

  • केवल तेज रफ्तार को धारा 304A (लापरवाही) के तहत रखा जाना चाहिए, न कि गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में।
  • सड़क लगभग खाली थी, ट्रैफिक लाइट हरी थी और मृतक ने अचानक अपनी दिशा बदल दी थी, जिससे दुर्घटना हुई।
  • याचिकाकर्ता बालिग होने के बहुत करीब था और उसे कार चलाने की समझ थी।
  • एमवी एक्ट की धारा 134/187 के आरोप भी गलत हैं क्योंकि याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर मृतक को ऑटो में बिठाने में मदद की थी।
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राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से: अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि “मौत की संभावना की जानकारी” परिस्थितियों से स्पष्ट थी:

  • याचिकाकर्ता बिना लाइसेंस के एक शक्तिशाली वाहन को भीड़भाड़ वाली सड़क पर गति सीमा से लगभग दुगनी रफ्तार पर चला रहा था।
  • उसने कार में बैठे अपने दोस्तों की रफ्तार कम करने की चेतावनियों को नजरअंदाज किया।
  • वह एक “अभ्यस्त अपराधी” था जिसका पिछला रिकॉर्ड भी खराब रहा था।
  • घटनास्थल से भागना और पीड़ित को उसी हाल में छोड़ देना सामान्य लापरवाही से परे की मानसिक स्थिति को दर्शाता है।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

जस्टिस अमित महाजन ने धारा 304 पार्ट-II और धारा 304A IPC के बीच के अंतर पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि धारा 304A वहां लागू होती है जहां मौत बिना किसी इरादे या जानकारी के हुई हो, जबकि धारा 304 पार्ट-II वहां लगती है जहां कार्य इस “जानकारी के साथ किया गया हो कि इससे मौत होने की संभावना है।”

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस संदर्भ में ‘जानकारी’ का अर्थ उस जागरूकता से है कि किए गए कार्य से घातक परिणाम होने की संभावना है। ऐसी जानकारी सामान्यतः कार्य की प्रकृति, आसपास की परिस्थितियों और उस आचरण में निहित जोखिम की डिग्री से आंकी जाती है।”

सुप्रीम कोर्ट के एलिस्टर एंथनी पारेरा बनाम महाराष्ट्र राज्य और राज्य बनाम संजीव नंदा जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं को गैर-इरादतन हत्या के रूप में तब देखा जा सकता है जब सबूत यह दर्शाएं कि चालक जानता था कि उसका कार्य इतना खतरनाक है कि इससे मौत होने की संभावना है।

नोटिस तय करने के चरण (धारा 251 CrPC) के संबंध में कोर्ट ने रेखांकित किया:

  • जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) को केवल प्रथम दृष्टया मामले की एक “संभावित राय” बनानी होती है।
  • इस चरण में सबूतों का विस्तृत मूल्यांकन या सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जांच (Mini Trial) करना कानूनन सही नहीं है।
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कोर्ट ने आगे कहा:

“इरादे या जानकारी जैसे मानसिक तत्वों का अस्तित्व पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित होता है और इसका अंतिम निर्णय केवल पक्षों द्वारा पेश किए गए सबूतों के आधार पर ही किया जा सकता है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने 18 मार्च 2023 के जेजेबी के आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई। जस्टिस महाजन ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि सामग्री प्रथम दृष्टया धारा 304 पार्ट-II के तत्वों को प्रकट करती है, इसलिए गंभीर अपराध के लिए नोटिस जारी करना उचित था।

हाईकोर्ट ने गुलाम हसन बेग बनाम मोहम्मद मकबूल माग्रे के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि शुरुआत में उच्च धारा के तहत आरोप तय करना प्रक्रियात्मक जटिलताओं को रोकता है। यदि बाद में मुकदमे के दौरान यह पाया जाता है कि मामला कम गंभीर अपराध का है, तो आरोपों को कम करने की शक्ति सुरक्षित रहती है।

नतीजतन, पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जेजेबी इस फैसले में की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना, जांच के दौरान सबूतों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करेगा।

केस विवरण

  • केस शीर्षक: मास्टर एम बनाम दिल्ली राज्य (NCT)
  • केस संख्या: CRL.REV.P. 564/2023 एवं CRL.M.A. 13482/2023
  • बेंच: जस्टिस अमित महाजन
  • दिनांक: 17 अप्रैल, 2026

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