एक ही आधार पर बार-बार अंतरिम जमानत की अर्जी देना “प्रक्रिया का दुरुपयोग”: दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषी पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया

दिल्ली हाईकोर्ट ने सामूहिक बलात्कार के एक दोषी की सजा के अंतरिम निलंबन (Interim Suspension of Sentence) की अर्जी को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि समय पर आत्मसमर्पण न करना और फिर उन्हीं आधारों पर बार-बार अर्जी दाखिल करना “अदालत की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग” है। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने याचिकाकर्ता द्वारा बार-बार कानूनी प्रक्रिया के साथ “अपनी किस्मत आजमाने” की कोशिश के लिए उस पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता राजन (अभियुक्त नंबर 1) को जून 2010 में एक 14 वर्षीय लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले में 2019 में दोषी ठहराया गया था। उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(g), 342 और 506 के साथ धारा 34 के तहत 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।

मौजूदा आवेदन दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.PC) की धारा 389 के तहत दाखिल किया गया था। इसमें अपीलकर्ता ने अपनी मां के गॉल ब्लैडर की सर्जरी (जो 9 मई, 2026 को निर्धारित बताई गई थी) के दौरान उनकी देखभाल करने के लिए आठ सप्ताह के अंतरिम निलंबन की मांग की थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि राजन परिवार का इकलौता बेटा है और उसकी मां पित्त की पथरी (Cholelithiasis) से पीड़ित हैं। सर्जरी से पहले और बाद की देखभाल के लिए उसकी उपस्थिति अनिवार्य है।

वहीं, राज्य की ओर से उपस्थित अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि अपीलकर्ता इसी तरह के आधारों पर बार-बार राहत मांग रहा है। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि यह याचिका नेक नीयत (Bona fides) से नहीं दी गई है, बल्कि सजा से बचने की एक रणनीति मात्र है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने 2019 से अपीलकर्ता द्वारा दाखिल किए गए आवेदनों के इतिहास की विस्तृत समीक्षा की, जिसमें नियमों के उल्लंघन और बार-बार एक ही आधार पर अर्जी देने का पैटर्न सामने आया:

  • चिकित्सा आधार: अदालत ने गौर किया कि नवंबर 2019 में भी अपीलकर्ता ने मां की सर्जरी के नाम पर अंतरिम जमानत ली थी। अगस्त 2020 में भी उसे इसी कारण से 20 दिन की राहत मिली, लेकिन उसने समय पर सरेंडर नहीं किया।
  • सरेंडर न करना: मई 2021 में पत्नी की गर्भावस्था के आधार पर जमानत मांगते समय भी यह देखा गया कि उसने पिछली बार रिहाई के बाद आत्मसमर्पण नहीं किया था। इसके बाद गैर-जमानती वारंट जारी किए गए और मार्च 2022 में उसे गिरफ्तार किया गया।
  • अन्य आधार: बेटी के पहले जन्मदिन और स्कूल में दाखिले की औपचारिकताओं के नाम पर भी कई बार अर्जियां दी गईं, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया जब अदालत राहत देने के पक्ष में नहीं दिखी।
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जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने पाया कि मौजूदा मेडिकल रिपोर्ट में भी विसंगतियां हैं। अस्पताल की रिपोर्ट के अनुसार सर्जरी की संभावित तिथि जून 2026 थी, जबकि अपीलकर्ता इसे 9 मई बता रहा था।

अदालत ने अपीलकर्ता की रणनीति पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा:

“इसलिए, ऐसा लगता है कि रणनीति किसी तरह निलंबन का अंतरिम आदेश प्राप्त करना है और उसके बाद सर्जरी न होने का आधार बनाकर विस्तार (Extension) मांगते रहना है… ऐसा प्रतीत होता है कि आवेदक/अपीलकर्ता लगातार आवेदन दाखिल करके अपनी किस्मत आजमा रहा है। जब उसे लगता है कि अदालत अर्जी मंजूर करने के पक्ष में नहीं है, तो वह उसे वापस ले लेता है और थोड़े अंतराल के बाद दूसरा आवेदन लेकर आ जाता है।”

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अदालत ने आगे कहा:

“यह भी देखा गया है कि पिछले मौकों पर उसने कभी भी समय पर आत्मसमर्पण नहीं किया। यह अदालत की प्रक्रिया के स्पष्ट दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं है।”

अदालत का निर्णय

सामूहिक बलात्कार जैसे अपराध की गंभीरता और अपीलकर्ता के पिछले आचरण को देखते हुए, हाईकोर्ट ने इस याचिका में कोई सच्चाई नहीं पाई। अदालत ने अर्जी को खारिज करते हुए अपीलकर्ता को आदेश दिया कि वह एक महीने के भीतर ‘दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी’ (Delhi High Court Legal Services Committee) में 25,000 रुपये जमा कराए।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: राजन बनाम राज्य
  • केस नंबर: CRL.A. 1195/2019 [CRL.M.(BAIL) 920/2026]
  • बेंच: जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा
  • दिनांक: 12 मई, 2026

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