छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में राज्य सरकार द्वारा रेलवे के जरिए लौह अयस्क (Iron Ore) के परिवहन पर लगाई गई ‘ट्रांजिट फीस’ को अवैध घोषित कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारतीय वन अधिनियम के तहत राज्य सरकार को रेलवे परिवहन को विनियमित करने या उस पर शुल्क वसूलने का कोई अधिकार नहीं है।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की युगल पीठ (Division Bench) ने 6 जनवरी 2026 को सुनाया। कोर्ट ने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार की उन अधिसूचनाओं को खारिज कर दिया, जिनके जरिए यह शुल्क वसूला जा रहा था।
क्या था पूरा मामला?
विवाद की जड़ राज्य सरकार द्वारा जारी दो अधिसूचनाएं थीं। सरकार ने छत्तीसगढ़ ट्रांजिट (वन उपज) नियम, 2001 का हवाला देते हुए खनिजों के परिवहन पर शुल्क लगा दिया था:
- 30 जून 2015: ₹15 प्रति टन की दर से शुल्क लागू किया गया।
- 27 जुलाई 2022: इस दर को बढ़ाकर ₹57 प्रति टन कर दिया गया।
भिलाई स्टील प्लांट (BSP) का संचालन करने वाली सेल (SAIL) ने इन नियमों को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि वे लौह अयस्क को वन क्षेत्र से सीधे रेलवे वैगन में लोड करके गैर-वन क्षेत्रों में भेजते हैं। चूंकि रेलवे का संचालन केंद्र सरकार के अधीन है, इसलिए राज्य सरकार इस पर अपनी ‘ट्रांजिट फीस’ नहीं थोप सकती।
कोर्ट में किसने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता (SAIL) का तर्क: सेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शकधर ने दलील दी कि संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत ‘रेलवे’ संघ सूची (Union List) का विषय है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जिस वन अधिनियम (1927) की धारा 41 का सहारा ले रही है, वह केवल “भूमि या जल” मार्ग से होने वाले परिवहन पर लागू होती है, न कि रेलवे पर। इसके अलावा, यह शुल्क एक तरह का ‘टैक्स’ है जो बिना किसी सेवा (Service) के वसूला जा रहा है, जो कि असंवैधानिक है।
राज्य सरकार का पक्ष: राज्य के उप-महाधिवक्ता प्रवीण दास ने बचाव में कहा कि वन अधिनियम में खनिज भी “वन उपज” की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि कानून में लिखे “भूमि द्वारा” (By Land) शब्द का दायरा बहुत बड़ा है और इसमें रेलवे भी शामिल माना जाना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए फीस को सही ठहराने की कोशिश की।
हाईकोर्ट का निर्णय और टिप्पणी
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद राज्य सरकार की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।
- रेलवे राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर: कोर्ट ने कहा कि वन अधिनियम की धारा 41 में “भूमि या जल” शब्द का प्रयोग किया गया है। इसकी व्याख्या करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे केवल सड़क मार्ग (जैसे ट्रक, बैलगाड़ी) या जल मार्ग तक सीमित रखा जाना चाहिए। यदि रेलवे को इसमें शामिल किया गया, तो यह संविधान के खिलाफ होगा क्योंकि रेलवे पूरी तरह से केंद्र सरकार का विषय है।
- फीस नहीं, यह टैक्स है: पीठ ने पाया कि राज्य सरकार ₹57 प्रति टन की दर से जो वसूली कर रही है, वह किसी विनियमन (Regulation) के बदले नहीं है, बल्कि यह एक प्रकार का टैक्स है। कोर्ट ने कहा कि बिना ‘क्विड प्रो क्वो’ (Quid Pro Quo – यानी शुल्क के बदले सेवा) के इस तरह की वसूली कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर: अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के हिंडाल्को इंडस्ट्रीज मामले के फैसले का समर्थन किया, जिसमें यह माना गया था कि ट्रांजिट नियम रेलवे परिवहन पर लागू नहीं हो सकते।
फैसले का असर
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- 2015 और 2022 की उन अधिसूचनाओं को निरस्त (Quash) कर दिया गया है जो रेलवे परिवहन पर शुल्क लगाती थीं।
- अगस्त और सितंबर 2022 में जारी किए गए वसूली के नोटिसों को भी रद्द कर दिया गया है।
- कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि राज्य सरकार के पास रेलवे के जरिए लौह अयस्क ले जाने पर ट्रांजिट फीस मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
यह फैसला खनन कंपनियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि इससे उन पर पड़ने वाला अतिरिक्त वित्तीय बोझ समाप्त हो गया है।

