चंडीगढ़ जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक बीमा कंपनी और बैंक को चंडीगढ़ पुलिस के एक दिवंगत हेड कांस्टेबल की पत्नी को ₹60 लाख देने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि अस्पताल के रिकॉर्ड में शराब सेवन का इतिहास दर्ज होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि दुर्घटना के समय व्यक्ति नशे में था।
आयोग के अध्यक्ष पवनजीत सिंह और सदस्य मोहन शर्मा की बेंच ने माना कि बीमा कंपनी ने दुर्घटना मृत्यु बीमा दावा गलत तरीके से खारिज किया था। आयोग ने महिला को मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए तथा मुकदमे के खर्च के रूप में ₹20,000 अतिरिक्त देने का भी आदेश दिया।
यह आदेश 22 सितंबर को पारित किया गया।
अस्पताल रिकॉर्ड से नशे की स्थिति साबित नहीं हुई
आयोग ने पाया कि अस्पताल की समरी में मृतक के शराब सेवन के इतिहास का उल्लेख था, लेकिन इसमें यह नहीं कहा गया था कि दुर्घटना के समय वह शराब के प्रभाव में था।
आयोग ने स्पष्ट किया कि शराब सेवन का इतिहास और किसी खास समय शराब के नशे में होना दो अलग बातें हैं।
राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए आयोग ने कहा कि केवल मेडिकल रिकॉर्ड में शराब सेवन दर्ज होने से नशे की स्थिति साबित नहीं होती। इसके लिए ब्लड अल्कोहल टेस्ट, ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट या अन्य विश्वसनीय मेडिकल अथवा वैज्ञानिक साक्ष्य होना जरूरी है।
आयोग ने इसी आधार पर बीमा कंपनी द्वारा पॉलिसी की अपवाद शर्त लागू करने को अनुचित माना।
दुर्घटना मृत्यु बीमा पॉलिसी के तहत थे कवर
मृतक चंडीगढ़ पुलिस में हेड कांस्टेबल थे और उनका वेतन खाता एक निजी बैंक में था।
30 अक्टूबर 2021 को हुए एक समझौता ज्ञापन के तहत बैंक में वेतन खाता रखने वाले चंडीगढ़ पुलिसकर्मियों को व्यक्तिगत दुर्घटना मृत्यु बीमा पॉलिसी का लाभ दिया गया था।
2 जुलाई 2022 को हेड कांस्टेबल स्कूटर से जा रहे थे, तभी उनका सड़क हादसा हो गया और उन्हें गंभीर चोटें आईं। पहले उन्हें लुधियाना के एसपीएस अस्पताल में भर्ती कराया गया और बाद में जीएमसीएच-32, चंडीगढ़ रेफर किया गया।
18 जुलाई 2022 को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
इसके बाद उनकी पत्नी ने समझौता ज्ञापन के तहत मिलने वाली दुर्घटना मृत्यु बीमा राशि का दावा किया।
बीमा कंपनी ने शराब सेवन का हवाला देकर दावा खारिज किया
अक्टूबर 2022 में बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार दुर्घटना के समय मृतक शराब के प्रभाव में था।
इसके बाद महिला ने जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया और सेवा में कमी तथा अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाया।
बीमा कंपनी ने शिकायत का विरोध करते हुए इसकी सुनवाई योग्य होने, शिकायतकर्ता के अधिकार, तथ्यों को छिपाने और कार्रवाई के आधार से जुड़े कई सवाल उठाए।
कंपनी ने यह स्वीकार किया कि हेड कांस्टेबल बीमित थे, लेकिन कहा कि पॉलिसी उसके नियम और शर्तों के अधीन थी। उसका यह भी कहना था कि दुर्घटना के समय वह ड्यूटी पर नहीं थे और कथित रूप से नशे में होने के कारण दावा पॉलिसी की अपवाद शर्त के तहत आता था।
वहीं, बैंक ने कहा कि उसकी भूमिका केवल संबंधित दस्तावेज बीमा कंपनी तक पहुंचाने की थी और दावे पर अंतिम फैसला बीमा कंपनी को ही लेना था।
दावा खारिज करना सेवा में कमी
आयोग ने पाया कि मृतक समझौता ज्ञापन के तहत व्यक्तिगत दुर्घटना मृत्यु बीमा पॉलिसी में कवर थे और 2 जुलाई की दुर्घटना के बाद उनकी मौत होने का तथ्य विवादित नहीं था।
आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी ऐसा कोई विश्वसनीय मेडिकल या वैज्ञानिक साक्ष्य पेश नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि दुर्घटना के समय मृतक नशे में थे।
इन परिस्थितियों में आयोग ने बीमा दावा खारिज किए जाने को अनुचित मानते हुए इसे सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार करार दिया।
आयोग ने बीमा कंपनी और बैंक को महिला को ₹60 लाख के साथ मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और मुकदमे के खर्च के लिए ₹20,000 देने का आदेश दिया।

