केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल पितृत्व पर सवाल उठाने भर से किसी नाबालिग बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने का निर्देश रूटीन तौर पर नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक इस बात का प्राथमिक प्रमाण न पेश किया जाए कि गर्भधारण के संभावित समय के दौरान पति-पत्नी के बीच एक-दूसरे तक पहुंच या शारीरिक संपर्क (नॉन-एक्सेस) बिल्कुल नहीं था, तब तक ऐसी जांच की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने 26 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए एक पति की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने निचली अदालत (मजिस्ट्रेट कोर्ट) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की अर्जी नामंजूर कर दी गई थी।
घरेलू हिंसा कानून पितृत्व निर्धारण का मंच नहीं
यह पूरा विवाद घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा है। एक महिला और उसके नाबालिग बच्चे ने मजिस्ट्रेट अदालत में याचिका दायर कर गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) और महिला के सोने के आभूषण वापस दिलाने की मांग की थी।
इस मामले के लंबित रहने के दौरान पति ने दावा किया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है। उसने अदालत में अर्जी दाखिल कर बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की, ताकि यह साबित हो सके कि उसका बच्चे से जैविक संबंध नहीं है। पति का यह भी कहना था कि मध्यस्थता (मीडिएशन) के दौरान महिला इस जांच के लिए राजी हो गई थी। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने अर्जी खारिज कर दी, जिसके बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि घरेलू हिंसा कानून के तहत चलने वाली कार्यवाही का प्राथमिक उद्देश्य घरेलू हिंसा के आरोपों की पड़ताल करना और पीड़ितों को विधिक राहत पहुंचाना है। अदालत ने कहा कि यह मंच किसी बच्चे के जैविक पितृत्व का निर्धारण करने के लिए नहीं है।
बच्चे की वैधता को कानून का पुख्ता संरक्षण
हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध पूरी तरह निर्विवाद है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत, एक वैध विवाह के कायम रहने के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता को लेकर कानून में स्पष्ट और मजबूत उपधारणा (प्रिजम्प्शन) मौजूद है।
अदालत ने समझाया कि धारा 112 का यह प्रावधान एक अहम लोक नीति पर आधारित है, जिसका मुख्य मकसद बच्चे के सामाजिक और कानूनी दर्जे की रक्षा करना है। जब तक यह प्राथमिक तौर पर साबित न कर दिया जाए कि गर्भधारण की अवधि में पति-पत्नी की एक-दूसरे तक पहुंच नहीं थी, तब तक विवाह के दौरान जन्मे बच्चे के पितृत्व को झुठलाने के लिए कोई साक्ष्य पेश करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
मध्यस्थता की सहमति अदालत पर बाध्यकारी नहीं
हाईकोर्ट ने मध्यस्थता समझौते से जुड़ी पति की दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मध्यस्थता के दौरान बनी कोई अनौपचारिक सहमति या आपसी समझ अदालत को चिकित्सकीय परीक्षण का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि डीएनए जांच का आदेश केवल बेहद उपयुक्त और वाजिब मामलों में ही दिया जा सकता है, जहां यह कानूनी रूप से स्वीकार्य, तथ्यों के आधार पर जायज और विवाद के अंतिम निपटारे के लिए अपरिहार्य हो। कोई भी पक्षकार आपसी सहमति से अदालत को कानून या स्थापित लोक नीति के विपरीत आदेश देने के लिए विवश नहीं कर सकता।
चूंकि पति अपनी पत्नी के साथ संपर्क न होने का कोई प्राथमिक साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा, इसलिए कानूनन बच्चे की वैधता की मान्यता पूरी तरह प्रभावी रही। इसके चलते हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

