‘बहुत कम किया जा रहा है’: आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण से मौतों पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकारा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र सरकार को आदिवासी बहुल मेलघाट क्षेत्र में बच्चों, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं की कुपोषण के कारण हो रही मौतों को लेकर कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि सरकार इस गंभीर मसले पर “बहुत कम” काम कर रही है और इसमें “इच्छाशक्ति” की कमी दिख रही है।

न्यायमूर्ति रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति अभय मंत्रि की खंडपीठ ने जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा:

“बहुत कम किया जा रहा है। सरकार को शून्य सहनशीलता (zero tolerance) के साथ काम करना होगा ताकि ऐसी आम वजहों से हो रही मौतें, जो पिछले दो-तीन दशकों से हो रही हैं, आगे न हों।”

अदालत को बताया गया कि मेलघाट क्षेत्र में अब तक 115 से अधिक नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की मौतें कुपोषण के कारण हुई हैं।

हालांकि सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि सभी मौतें कुपोषण के कारण नहीं हुईं और इसके पीछे कई अन्य कारण भी हैं।

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राज्य की ओर से अतिरिक्त सरकारी वकील पी.बी. सामंत ने बताया कि इन क्षेत्रों में अधिकांश लड़कियों की शादी 13-14 साल की उम्र में हो जाती है, जल्दी गर्भधारण होता है और कई बार समय से पहले प्रसव भी हो जाता है, जिससे जटिलताएं बढ़ती हैं।

अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह सिर्फ सतही आंकड़ों से संतुष्ट न हो, बल्कि मूल कारणों की गहराई से जांच करे और इस पर प्रभावी कदम उठाए। इसके साथ ही, समस्या से निपटने के लिए एक रोडमैप (कार्ययोजना) तैयार करने को भी कहा गया है।

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“समस्याएं कई हैं। सरकार के पास उन्हें दूर करने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए,” अदालत ने कहा।

अदालत ने राज्य सरकार को सुझाव दिया कि वह निम्नलिखित कदम उठाए:

  • आदिवासी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) को मजबूत किया जाए
  • नए डॉक्टरों के साथ-साथ अनुभवी स्त्रीरोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ की भी नियुक्ति की जाए
  • स्थानीय लोगों में स्वास्थ्य, पोषण और कम उम्र में गर्भधारण के खतरों को लेकर जागरूकता फैलाई जाए
  • जरूरतमंद समुदायों के लिए विशेष योजनाएं शुरू की जाएं
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अब यह मामला 27 फरवरी को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। अदालत ने तब तक राज्य सरकार से विस्तृत कार्ययोजना पेश करने को कहा है।

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