संतान न होना तलाक का आधार नहीं: पटना हाईकोर्ट ने मानसिक क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद को रखी बरकरार

पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सालों तक इलाज कराने के बावजूद बच्चा न होना किसी शादी को खत्म करने की कानूनी वजह नहीं बन सकता। हालांकि, लंबे समय से चले आ रहे विवाद, गंभीर आपराधिक मुकदमों और आपसी विश्वास पूरी तरह खत्म होने के कारण अदालत ने मानसिक क्रूरता के आधार पर दंपती के तलाक को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही कोर्ट ने पति को अपनी पूर्व पत्नी को 34.76 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश भी जारी किया है।

संतानहीनता पर हाईकोर्ट का रुख

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस चंद्र शेखर झा की खंडपीठ ने यह फैसला 10 जुलाई को सुनाया। कोर्ट एक महिला की ओर से दायर उस अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसने उसकी 2010 में हुई शादी को भंग कर दिया था। खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि केवल बच्चे न होना या पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना ही तलाक की वजह नहीं बन सकता।

अदालत ने कहा कि इलाज के दस्तावेजों से साफ है कि 12 जून 2010 को हुई शादी के बाद दोनों पक्षों ने संतान प्राप्ति के लिए आईवीएफ (IVF) सहित कई चिकित्सा प्रक्रियाओं का सहारा लिया था। मेडिकल रिकॉर्ड में किसी भी पक्ष को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था। कोर्ट ने स्वीकार किया कि संतान न होने का मानसिक तनाव रिश्ते के बिगड़ने की पृष्ठभूमि जरूर बना, लेकिन इसे विवाह विच्छेद का स्वतंत्र आधार नहीं माना जा सकता।

आपराधिक मुकदमे और क्रूरता का आधार

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हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(इए) के तहत माना कि दोनों के बीच का रिश्ता इस हद तक टूट चुका है कि उसे अब जोड़ना संभव नहीं है। साल 2018 में पत्नी ने पति और उसके परिजनों पर दहेज उत्पीड़न, जानलेवा हमला और दूसरी शादी का दबाव बनाने जैसे संगीन आरोपों में आपराधिक केस दर्ज कराया था। हालांकि, सुनवाई के बाद कोर्ट ने पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया था।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में बरी होने का मतलब यह नहीं कि सारे आरोप जानबूझकर झूठे लगाए गए थे, क्योंकि आपराधिक मामलों में ‘संदेह से परे’ सबूतों की आवश्यकता होती है। फिर भी, वैवाहिक मामलों में ‘संभावनाओं के संतुलन’ के आधार पर यह साफ है कि वर्षों चले मुकदमों और आरोपों से आपसी भरोसा खत्म हो गया था, जो मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। चूंकि क्रूरता का आधार साबित हो गया था, इसलिए कोर्ट ने परित्याग (डिसर्शन) के दूसरे आधार पर विचार करना जरूरी नहीं समझा।

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तलाक को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने पति को 34.76 लाख रुपये का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। पति एक सहायक शिक्षक के रूप में कार्यरत है और उसकी मासिक सैलरी 86,900 रुपये है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थायी गुजारा भत्ता तय करते समय होम लोन या पर्सनल लोन की ईएमआई (EMI) को कुल आय से घटाया नहीं जा सकता। यह राशि पति को दो समान किस्तों में देनी होगी—पहली किस्त आदेश मिलने के 15 दिनों के भीतर और दूसरी अगले 60 दिनों के भीतर।

मामले की सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि फैमिली कोर्ट से तलाक मिलने के बाद, हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान ही पति ने दूसरी शादी कर ली थी। इस पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दूसरी शादी कर लेने से पहली पत्नी की अपील अमान्य नहीं होती और उसे गुण-दोष के आधार पर ही परखा जाएगा।

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