कर्नाटक हाईकोर्ट ने तलाक की मांग करने वाले एक पति की अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू कानून के तहत शादी एक जन्म-जन्मांतर का संस्कार है, न कि कोई व्यावसायिक अनुबंध। जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ की खंडपीठ ने मैसूर की एक पारिवारिक अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जिसने पति की तलाक याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी जीवनसाथी सिर्फ यह कहकर शादी से पीछे नहीं हट सकता कि अब उसकी रिश्ते में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता-पति और प्रतिवादी-पत्नी का विवाह 15 दिसंबर, 2003 को हुआ था। यह एक अंतर-जातीय प्रेम विवाह था। इस शादी से उनकी एक बेटी है, जो अब लगभग बालिग होने वाली है। शादी के 21 साल बाद दोनों के बीच यह कानूनी विवाद शुरू हुआ।
दोनों पक्षों के बीच अदालती इतिहास पर नजर डालें तो पति ने पहले तलाक के लिए एक याचिका (एम.सी. नंबर 381/2019) दायर की थी, जबकि पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की बहाली के लिए याचिका (एम.सी. नंबर 857/2019) दायर की थी। इन दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ की गई थी, जिसके बाद अदालत ने एक संयुक्त फैसला सुनाते हुए पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी और पत्नी की दाम्पत्य अधिकारों की बहाली की याचिका को स्वीकार कर लिया था।
इसके बाद, पति ने मैसूर की पारिवारिक अदालत के समक्ष एक नई याचिका (एम.सी. नंबर 404/2024) दायर कर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A) के तहत शादी को खत्म करने की मांग की। इस धारा के तहत यदि दाम्पत्य अधिकारों की बहाली की डिक्री पारित होने के बाद एक साल या उससे अधिक समय तक दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक जीवन फिर से शुरू नहीं होता है, तो तलाक की मांग की जा सकती है।
दोनों पक्षों की दलीलें
पति ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि पिछली अदालत के फैसले के बाद दोनों पक्षों की ओर से वैवाहिक जीवन को फिर से शुरू करने का कोई प्रयास नहीं किया गया और वे मैसूर में अपने-अपने स्थानों पर अलग-अलग रहते रहे। उसने दावा किया कि उसने अपनी पत्नी से वापस आने और वैवाहिक जीवन बिताने के लिए कई बार अनुरोध किया और गंभीर प्रयास किए, लेकिन पत्नी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। पति का तर्क था कि उनकी शादी अब पूरी तरह से टूट चुकी है।
इसके जवाब में, पत्नी ने एक विस्तृत आपत्ति पत्र दाखिल किया। उसने कहा कि उसने अपने पति और सास-ससुर की पूरी श्रद्धा और स्नेह से देखभाल की है। पत्नी ने बताया कि चूंकि वह ब्राह्मण जाति से संबंध रखती है, इसलिए उसके ससुर ने उन्हें घर की पहली मंजिल पर रहने की सलाह दी थी ताकि वे पूजा-पाठ और भोजन की तैयारी कर सकें। उसने इस व्यवस्था को स्वीकार किया और कभी भी अलग घर में रहने की जिद नहीं की। उसने पति या उसके परिवार के सदस्यों के साथ किसी भी तरह के झगड़े या तालमेल की कमी के आरोपों से पूरी तरह इनकार किया।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
पारिवारिक अदालत ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों और बयानों का मूल्यांकन करने के बाद यह निर्धारित करने के लिए बिंदु तय किए कि क्या पति दाम्पत्य अधिकारों की बहाली के बाद साथ न रहने के आधार पर तलाक पाने का हकदार है या नहीं। अदालत ने पाया कि पति पत्नी के खिलाफ क्रूरता के आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिरह के दौरान पति ने खुद स्वीकार किया कि उसने पत्नी के साथ रहना इसलिए शुरू नहीं किया क्योंकि उसकी अब इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी।
हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान पति के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि पति की अब इस वैवाहिक रिश्ते में कोई दिलचस्पी नहीं बची है, इसलिए व्यावहारिक रूप से यह शादी खत्म हो चुकी है और ऐसी स्थिति में तलाक की डिक्री दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए माना कि पति अपनी ही गलती का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। पीठ ने कहा:
“अपीलकर्ता अपनी ही गलती का फायदा उठाना चाहता है।”
व्यक्तिगत कानून के तहत वैवाहिक संबंधों की पवित्रता पर चर्चा करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“हिंदू कानून के तहत विवाह एक संस्कार है और यह कोई अनुबंध नहीं है। एक बार जब शादी हो जाती है, तो वह जीवनभर के लिए होती है और कोई भी व्यक्ति केवल इस आधार पर विवाह से पीछे नहीं हट सकता कि अब उसे अपने जीवनसाथी के साथ इस रिश्ते में कोई रुचि नहीं बची है।”
कोर्ट का निर्णय
कर्नाटक हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत के फैसले और डिक्री में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया। इसी के साथ पीठ ने पति की इस अपील (विविध प्रथम अपील संख्या 4343/2026) को खारिज कर दिया और लंबित सभी अंतरिम आवेदनों का भी निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्री मंजूकिरण बनाम श्रीमती बिंदु एम. बी.
वाद संख्या: विविध प्रथम अपील संख्या 4343/2026 (पारिवारिक न्यायालय)
पीठ: जस्टिस डी.के. सिंह और जस्टिस टी.एम. नदाफ
निर्णय की तिथि: 15 जुलाई, 2026

