कलेक्टर के पास पुलिस को जांच दोबारा शुरू करने या क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने स्पष्ट किया है कि जिला कलेक्टर के पास दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत पुलिस को किसी मामले की जांच फिर से शुरू करने या अदालत में पेश की जा चुकी क्लोजर रिपोर्ट को वापस लेने का निर्देश देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने दीपक मणिलाल गर्ग द्वारा दायर एक रिट याचिका को स्वीकार करते हुए जिला कलेक्टर के आदेशों को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि वैधानिक आपराधिक जांच में कार्यपालिका का इस तरह का हस्तक्षेप पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर और कानून के शासन को नुकसान पहुंचाने वाला है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दीपक मणिलाल गर्ग द्वारा दायर एक रिट याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने इंदौर के जिला कलेक्टर (प्रतिवादी संख्या 2) द्वारा 8 सितंबर 2025 को जारी किए गए एक आदेश/ज्ञापन और उसके बाद जारी किए गए अन्य ज्ञापनों की वैधता और अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी थी।

मामले के तथ्यों के अनुसार, पुलिस स्टेशन कोतवाली में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत अपराध दर्ज कर एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की गई थी, जिसकी अपराध संख्या 96/2020 थी। जांच पूरी होने के बाद, जांच अधिकारी को आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले। इसके बाद, कोतवाली थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) ने 7 मई 2024 और 21 मई 2024 को सक्षम अदालत में अपनी क्लोजर रिपोर्ट भेज दी।

इसके बाद, जिला कलेक्टर ने विवादित आदेश जारी कर पुलिस अधिकारियों को उक्त क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने और मामले की जांच को फिर से शुरू करने का निर्देश दिया था।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील (एक वरिष्ठ अधिवक्ता, जिनके साथ श्री अर्जुन अग्रवाल और श्री अमित अग्रवाल उपस्थित हुए) ने पुरजोर दलील दी कि कलेक्टर द्वारा जारी किए गए निर्देश पूरी तरह से बिना किसी अधिकार क्षेत्र के थे। उन्होंने कहा कि सीआरपीसी का वैधानिक ढांचा जिला कलेक्टर को किसी चल रही या समाप्त हो चुकी पुलिस जांच में हस्तक्षेप करने, उसे दोबारा शुरू करने का आदेश देने, या अदालत में भेजी जा चुकी क्लोजर रिपोर्ट को वापस लेने का कोई अधिकार नहीं देता है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आपराधिक मामलों में कार्यपालिका का ऐसा हस्तक्षेप मनमाना है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित सरकारी वकील (जिनके साथ श्री गौरव रावत उपस्थित हुए) ने कलेक्टर के आदेशों का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि इस निर्देश के पीछे का उद्देश्य निष्पक्ष और पूरी जांच सुनिश्चित करना था। राज्य के वकील ने यह भी कहा कि इन निर्देशों को सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत देखा जाना चाहिए, जिसमें “आगे की जांच” (further investigation) का स्पष्ट प्रावधान है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या जिला कलेक्टर के पास सीआरपीसी के तहत पुलिस को क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने और जांच को दोबारा शुरू करने का निर्देश देने का कोई वैधानिक अधिकार क्षेत्र है।

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सीआरपीसी की वैधानिक योजना का विश्लेषण करते हुए अदालत ने कहा कि कानून में जांच एजेंसी और न्यायपालिका की स्वतंत्र सीमाओं को स्पष्ट रूप से तय किया गया है। एक बार एफआईआर दर्ज होने के बाद, मामले की जांच करने का वैधानिक अधिकार पूरी तरह से पुलिस के पास होता है। यदि जांच के बाद कोई मामला नहीं बनता है, तो सीआरपीसी की धारा 173(2) के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट को क्लोजर रिपोर्ट भेजी जाती है।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस द्वारा यह रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद, पूरा अधिकार क्षेत्र संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास चला जाता है। मजिस्ट्रेट पुलिस के निष्कर्षों से बंधा नहीं होता और उसके पास यह न्यायिक विवेक होता है कि वह या तो रिपोर्ट को स्वीकार कर कार्यवाही बंद कर दे, या रिपोर्ट को खारिज कर सीआरपीसी की धारा 190(1)(b) के तहत खुद संज्ञान ले ले, या फिर धारा 156(3) के तहत आगे की जांच का आदेश दे।

कार्यपालिका की शक्तियों की सीमा स्पष्ट करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

“कलेक्टर के पास सीआरपीसी के तहत वैधानिक जांच प्रक्रिया पर कोई पर्यवेक्षी, अपीलीय या न्यायिक अधिकार नहीं है जिससे वह एसएचओ को उस रिपोर्ट को ‘वापस लेने’ के लिए मजबूर करे जो पहले ही भेजी जा चुकी है। इस तरह की कार्रवाई की अनुमति देने का अर्थ कार्यपालिका को मजिस्ट्रेट के न्यायिक कार्यों को हथियाने की अनुमति देना होगा, जो कि कानून के शासन के लिए मौलिक रूप से विनाशकारी है।”

अदालत ने आगे स्पष्ट किया:

“इसलिए, कलेक्टर द्वारा जारी किया गया विवादित निर्देश सीआरपीसी की व्यवस्था से पूरी तरह से अलग है। बिना अधिकार क्षेत्र के पारित किया गया आदेश शून्य होता है। कलेक्टर ने जांच को फिर से शुरू करने और क्लोजर रिपोर्ट वापस लेने का निर्देश देकर अपने वैधानिक अधिकार की सीमा को पार किया है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

इन निष्कर्षों के आधार पर, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार कर लिया और अपराध संख्या 96/2020 में जांच दोबारा शुरू करने से संबंधित कलेक्टर के 8 सितंबर 2025 के आदेश और उसके बाद के सभी ज्ञापनों को रद्द कर दिया।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट को क्लोजर रिपोर्ट पर अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करने से नहीं रोका जाएगा। इसके साथ ही, यह आदेश पुलिस को कानून के दायरे में रहते हुए और रद्द किए गए कार्यकारी निर्देशों से प्रभावित हुए बिना, सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच करने के उनके स्वतंत्र वैधानिक अधिकारों का उपयोग करने से भी नहीं रोकता है। मामले में मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: दीपक मणिलाल गर्ग बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 48444/2025 पी
ठ: जस्टिस जय कुमार पिल्लई
निर्णय की तिथि: 14/07/2026

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