धार भोजशाला विवाद: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ASI को दिया आदेश, 96 दिनों की सर्वे वीडियोग्राफी पोर्टल पर करनी होगी अपलोड

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला परिसर को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में एक अहम मोड़ आया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को निर्देश दिया है कि वह अपने हालिया वैज्ञानिक सर्वे की पूरी वीडियोग्राफी रिकॉर्डिंग याचिकाकर्ताओं और संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराए।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने धार के इस विवादित स्थल की धार्मिक प्रकृति से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने एएसआई को निर्देश दिया है कि 27 अप्रैल तक इस पूरी रिकॉर्डिंग को गूगल ड्राइव या किसी सुरक्षित क्लाउड प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर इसकी पहुंच (एक्सेस) दोनों पक्षों के वकीलों और कोर्ट को दी जाए।

यह मामला तब गरमाया जब मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी दलीलें रखीं। खुर्शीद ने तर्क दिया कि एएसआई की अंतिम सर्वे रिपोर्ट पर कोई भी आपत्ति दर्ज कराने के लिए वीडियोग्राफी रिकॉर्ड को देखना बेहद जरूरी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि हाईकोर्ट को वीडियोग्राफी से उत्पन्न होने वाली आपत्तियों पर विचार करना चाहिए।

दूसरी ओर, एएसआई के वकील ने इस मांग का विरोध किया। उन्होंने कहा कि सर्वे पूरे 96 दिनों तक चला है और इतनी लंबी फुटेज को साझा करना या प्रदर्शित करना काफी समय लेने वाला काम होगा। एएसआई का यह भी तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अर्थ यह था कि केवल हाईकोर्ट ही इन सामग्रियों का अवलोकन करे। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत डेटा साझा करने का आदेश दिया।

सुनवाई के दौरान केवल वीडियोग्राफी ही नहीं, बल्कि याचिका की पोषणीयता (मेंटेनेबिलिटी) पर भी बहस हुई। एक हस्तक्षेपकर्ता (इंटरवेनर) की ओर से पेश वकील अज़हर वारसी ने तर्क दिया कि ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ द्वारा दायर याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। वारसी के अनुसार, यह मामला स्वामित्व विवाद और जटिल साक्ष्यों से जुड़ा है, इसलिए इसकी सुनवाई किसी रिट कोर्ट के बजाय सिविल कोर्ट या वक्फ ट्रिब्यूनल में होनी चाहिए।

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वारसी ने कोर्ट के सामने 1925-26 के लैंड रेवेन्यू रिकॉर्ड पेश किए, जिनमें इस संपत्ति को मस्जिद के रूप में दर्ज बताया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ अधिनियम, 1996 के तहत आपत्तियां दर्ज कराने की समय सीमा काफी समय पहले ही समाप्त हो चुकी है।

कोर्ट इस मामले में वास्तुकला और इतिहास की दो अलग-अलग व्याख्याओं को सुन रहा है:

  • हिंदू पक्ष: उनका अटूट विश्वास है कि यह ढांचा वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर है। एएसआई की हालिया रिपोर्ट में भी यह उल्लेख है कि वर्तमान ढांचे का निर्माण परमार काल के एक हिंदू मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके किया गया था।
  • मुस्लिम पक्ष: प्रतिवादी इसे कमाल मौला मस्जिद बताते हैं। उनके वकील ने दलील दी कि मंदिर की अनिवार्य विशेषताएं जैसे ‘गर्भ गृह’, ‘शिखर’ और ‘गोपुरम’ यहां अनुपस्थित हैं, जबकि मस्जिद के तत्व जैसे ‘मिहराब’, ‘किबला’ और ‘सहन’ स्पष्ट रूप से मौजूद हैं।
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इसके अलावा, ब्रिटिश म्यूजियम के दस्तावेजों का हवाला देते हुए यह भी तर्क दिया गया कि वहां रखी वाग्देवी की मूर्ति भोजशाला से नहीं बल्कि परमार काल के सिटी पैलेस के खंडहरों से मिली थी।

इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई आगामी मंगलवार को निर्धारित की गई है।

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