कालेश्वरम परियोजना: हाईकोर्ट से केसीआर और हरीश राव को बड़ी राहत, जांच आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई पर रोक

तेलंगाना हाईकोर्ट ने बुधवार को भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव (केसीआर), पूर्व मंत्री टी. हरीश राव और अन्य को एक बड़ी कानूनी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कालेश्वरम सिंचाई परियोजना में कथित अनियमितताओं की जांच करने वाले पीसी घोष आयोग के निष्कर्षों के आधार पर इन नेताओं के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।

चीफ जस्टिस अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस जी. एम. मोहीउद्दीन की खंडपीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आयोग के गठन को तो वैध माना, लेकिन याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध दिए गए उसके निष्कर्षों को ‘अप्रभावी’ (Inoperative) करार दिया।

बीआरएस शासन के दौरान कालेश्वरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना (KLIP) के निर्माण में कथित वित्तीय और तकनीकी अनियमितताओं की जांच के लिए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस पी.सी. घोष की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया था।

आयोग ने पिछले साल अगस्त में अपनी रिपोर्ट राज्य विधानसभा में पेश की थी, जिसमें केसीआर और तत्कालीन सिंचाई मंत्री हरीश राव को परियोजना के निर्माण और अन्य पहलुओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। इस रिपोर्ट के आधार पर मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का निर्णय लिया था। इसी रिपोर्ट और कार्रवाई को केसीआर और अन्य ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

बुधवार को अपना फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जांच की प्रक्रियात्मक खामियों पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने पाया कि आयोग के निष्कर्ष याचिकाकर्ताओं की प्रतिष्ठा और आचरण के लिए हानिकारक थे, लेकिन उन्हें अपनी बात रखने का उचित अवसर नहीं दिया गया।

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हाईकोर्ट ने कहा कि आयोग ने ‘जांच आयोग अधिनियम, 1952’ की धारा 8B के तहत प्रदान किए गए वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया। यह धारा अनिवार्य करती है कि यदि किसी जांच से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित होने की संभावना है, तो उसे अपना पक्ष रखने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा मौका मिलना चाहिए।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “…आयोग द्वारा दिए गए निष्कर्ष जो याचिकाकर्ताओं के आचरण और प्रतिष्ठा के लिए प्रतिकूल हैं, वे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और जांच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 8B के तहत प्रदान किए गए वैधानिक सुरक्षा उपायों के उल्लंघन में दिए गए हैं। अतः ये निष्कर्ष अप्रभावी रहेंगे और इनके आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।”

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हालांकि, व्यक्तिगत राहत प्रदान करने के बावजूद, हाईकोर्ट ने पीसी घोष आयोग के गठन की वैधानिकता को सही ठहराया। कोर्ट ने उन तर्कों को खारिज कर दिया जिनमें आयोग के गठन को मनमाना या असंवैधानिक बताया गया था। पीठ ने पुष्टि की कि राज्य सरकार के पास ऐसी जांच बिठाने का पूर्ण अधिकार है।

कालेश्वरम परियोजना को दुनिया की सबसे बड़ी मल्टी-स्टेज लिफ्ट सिंचाई योजनाओं में से एक माना जाता है। सत्ता परिवर्तन के बाद से ही यह परियोजना राजनीतिक और कानूनी विवादों के केंद्र में रही है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद, राज्य सरकार अब केवल जस्टिस घोष आयोग की रिपोर्ट के आधार पर केसीआर या हरीश राव के खिलाफ कोई भी प्रशासनिक या आपराधिक कदम नहीं उठा सकेगी।

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