सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने एक मोटर दुर्घटना मामले में मुआवजा बढ़ाते हुए कहा कि कृत्रिम (प्रोस्थेटिक) अंग के लिए मुआवजा तय करते समय restitutio in integrum के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए, ताकि पीड़ित को यथासंभव उसकी पूर्व स्थिति में लाया जा सके। कोर्ट ने कुल ₹36.20 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसमें ₹26 लाख प्रोस्थेटिक अंग और उसके रखरखाव के लिए शामिल हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2 मई 2007 को जयपुर में हुई सड़क दुर्घटना से संबंधित है। प्रहलाद साहई मोटरसाइकिल से जा रहे थे, जब हरियाणा रोडवेज की बस ने पीछे से टक्कर मार दी। हादसे में उनका दाहिना पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने ₹8.73 लाख और राजस्थान हाई कोर्ट ने ₹13.02 लाख मुआवजा दिया था। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता ने कहा कि कृत्रिम पैर के लिए कोई मुआवजा नहीं दिया गया, जबकि यह जीवनभर की जरूरत है और समय-समय पर इसे बदलना पड़ता है। उन्होंने ₹6,000 मासिक आय और 100% कार्यात्मक विकलांगता को स्वीकार करने की मांग की।
वहीं, प्रतिवादियों ने कहा कि मुआवजा संतुलित होना चाहिए और इसे अत्यधिक नहीं बढ़ाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
कोर्ट ने कहा कि मुआवजा “न्यायसंगत” होना चाहिए—न बहुत अधिक, न बहुत कम।
कोर्ट ने माना कि प्रोस्थेटिक अंग एक विकलांग व्यक्ति के लिए गरिमा और आत्मनिर्भरता से जुड़ा आवश्यक साधन है।
“मुआवजा ऐसा होना चाहिए जो न तो लाभ का स्रोत बने और न ही इतना कम हो कि न्याय से वंचित कर दे।”
कोर्ट ने मुआवजा तय करने के लिए मानक तय किए:
- जीवन प्रत्याशा 70 वर्ष
- हर 5 साल में कृत्रिम अंग बदलना
- पूरे जीवन के लिए लागत का आकलन
सरकारी दरों को कोर्ट ने “बहुत कम” मानते हुए खारिज कर दिया।
आय और विकलांगता
कोर्ट ने ₹6,000 मासिक आय को उचित माना और कहा कि याचिकाकर्ता की कार्यात्मक विकलांगता 100% है, क्योंकि वह अब ड्राइविंग का काम नहीं कर सकता।
अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा बढ़ाते हुए:
- ₹21 लाख सात कृत्रिम अंगों के लिए
- ₹5 लाख रखरखाव के लिए
- आय हानि और अन्य मदों में वृद्धि
- ₹2 लाख मुकदमे के खर्च के लिए
कुल ₹36,20,350 मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसे चार सप्ताह में भुगतान करना होगा, अन्यथा 9% ब्याज देना होगा।
इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दुर्घटना पीड़ितों के मुआवजे में उनकी गरिमा, जरूरतों और भविष्य की वास्तविकताओं को केंद्र में रखना जरूरी है।

