जिले की सीमा से बाहर के अपराधों पर प्रिवेंटिव डिटेंशन तभी वैध, जब स्थानीय पब्लिक ऑर्डर पर असर का लिखित निष्कर्ष हो: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि डिटेनिंग अथॉरिटी के प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र से बाहर दर्ज आपराधिक मामले केवल तभी डिटेंशन का आधार बन सकते हैं, जब संबंधित अथॉरिटी इस बात पर अपनी स्पष्ट संतुष्टि दर्ज करे कि उन बाहरी गतिविधियों का उसके अपने स्थानीय क्षेत्र के पब्लिक ऑर्डर (लोक व्यवस्था) पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी की खंडपीठ ने एक हैबियस कॉर्पस याचिका स्वीकार करते हुए निर्णय दिया कि बिना किसी ठोस आधार के की गई सामान्य टिप्पणियां और आरोपी को मिली जमानत की शर्तों पर विचार न करना, प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश को पूरी तरह दूषित करता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता देवाल्ला दिव्या ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बंदी देवाल्ला जयप्रकाश उर्फ जया के खिलाफ जारी प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश को चुनौती दी थी। यह डिटेंशन आदेश 2 दिसंबर 2025 को एसपीएसआर नेल्लोर जिले के कलेक्टर और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा ‘आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज ऑफ बूटलेगर्स, डकैत, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडाज, इम्मोरल ट्रैफिक ऑफेंडर्स एंड लैंड ग्रैबर्स एक्ट, 1986’ की धारा 3(1) और 3(2) के तहत जारी किया गया था। इसमें बंदी को उक्त अधिनियम की धारा 2(g) के तहत “गुंडा” करार दिया गया था। इसके बाद एडवाइजरी बोर्ड की मंजूरी मिलने पर राज्य सरकार ने 2 फरवरी 2026 को जी.ओ.आर.टी. सं. 202 के जरिए इस आदेश की पुष्टि की थी।

डिटेंशन आदेश में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) के तहत दर्ज तीन आपराधिक मामलों को आधार बनाया गया था:

  1. चिल्लाकूर पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 137/2024, धारा 118(1) सहपठित धारा 3(5) बीएनएस (दिनांक 13 अगस्त 2024), जिसमें सीआरपीसी की धारा 41-ए का नोटिस दिया गया था और चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी।
  2. गूदूर रूरल पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 138/2024, धारा 333, 109 सहपठित धारा 3(5) बीएनएस (दिनांक 13 अगस्त 2024), जिसमें बंदी आरोपी नंबर 1 (A-1) था और उसे 23 जनवरी 2025 को सातवें अतिरिक्त सत्र न्यायालय, गूदूर द्वारा जमानत दी गई थी।
  3. वेदयापालेम पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 149/2025, धारा 103(1), 58, 61(2)(A) सहपठित धारा 3(5) बीएनएस (दिनांक 14 मार्च 2025), जिसमें बंदी आरोपी नंबर 7 था और उसे 28 जुलाई 2025 को चौथे अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, नेल्लोर द्वारा जमानत दी गई थी।

जब पहले दो मामलों (क्राइम नंबर 137 और 138 ऑफ 2024) में अपराध हुए और केस दर्ज किए गए, तब चिल्लाकूर और गूदूर रूरल पुलिस स्टेशन एसपीएसआर नेल्लोर जिले के क्षेत्राधिकार में नहीं आते थे। 11 अप्रैल 2022 के सरकारी आदेश जी.ओ.एमएस. सं. 52 के तहत जिला पुनर्गठन के कारण ये दोनों पुलिस थाने तिरुपति जिले का हिस्सा थे। हालांकि, बाद में 21 जनवरी 2026 को जारी आदेश जी.ओ.एमएस. सं. 15 के माध्यम से इन्हें दोबारा नेल्लोर जिले में शामिल किया गया था।

दोनों पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील एस. राम लक्ष्मण रेड्डी ने दलील दी कि अपराध के समय क्राइम नंबर 137 और 138 ऑफ 2024 डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, नेल्लोर की सीमा से बाहर थे। इसलिए इन्हें विचार में लेना अप्रासंगिक सामग्री पर आधारित होना है, जिससे डिटेनिंग अथॉरिटी की संतुष्टि कानूनी रूप से अमान्य हो जाती है। उन्होंने आगे कहा कि यद्यपि डिटेनिंग अथॉरिटी ने यह दर्ज किया कि बंदी को दूसरे और तीसरे मामले में जमानत मिल चुकी है, लेकिन उसने जमानत की शर्तों और इस बात पर कतई विचार नहीं किया कि क्या वे शर्तें भविष्य में अपराध रोकने के लिए पर्याप्त थीं। याचिकाकर्ता ने मद्रास हाईकोर्ट के सुमन बनाम तमिलनाडु राज्य फैसले के साथ-साथ सैयद मोहियुद्दीन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और सुप्रीम कोर्ट के नेनावथ बुज्जी बनाम तेलंगाना राज्य के निर्णयों का हवाला दिया।

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दूसरी तरफ, सरकार की ओर से पेश वकील कीर्ति तेजा कोंडावीटी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कथित अपराध 1986 के अधिनियम के तहत “गुंडा” की परिभाषा में आते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि कानून में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है जो किसी अथॉरिटी को क्षेत्राधिकार से बाहर के मामलों पर विचार करने से रोकता हो, खासकर जब आरोपी के लगातार आपराधिक आचरण का आकलन किया जा रहा हो। उन्होंने बताया कि वेदयापालेम पुलिस स्टेशन और अन्य दो थानों के बीच की दूरी केवल लगभग 30 किलोमीटर है। एक अतिरिक्त हलफनामे के माध्यम से अथॉरिटी ने दावा किया कि बंदी की बाहरी गतिविधियों का नेल्लोर के पब्लिक ऑर्डर पर सीधा प्रभाव पड़ा था और जमानत आदेशों की जानकारी होने के बाद ही डिटेंशन का निर्णय लिया गया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत

जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी की पीठ ने 1986 के अधिनियम की धारा 3 का विश्लेषण करते हुए माना कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि अपराध कहां दर्ज हुआ, बल्कि यह देखना आवश्यक है कि डिटेनिंग अथॉरिटी के अपने क्षेत्र में क्या परिस्थितियां हैं या हो सकती हैं:

“हमारे विचार से जो प्रासंगिक है, वह यह नहीं है कि अपराध किस स्थान पर दर्ज किया गया है—भले ही वह डिटेनिंग अथॉरिटी के प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र से बाहर पड़ता हो—बल्कि डिटेनिंग अथॉरिटी के अधिकार क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर प्रचलित या संभावित परिस्थितियां प्रासंगिक हैं, जिनके आधार पर उप-धारा (1) के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश पारित करना आवश्यक हो जाता है।”

मद्रास हाईकोर्ट के सुमन बनाम तमिलनाडु राज्य निर्णय पर चर्चा करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि सभी घटनाओं का उसी जिले में होना अनिवार्य नहीं है, बशर्ते एक उचित प्रादेशिक संबंध मौजूद हो। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के नेनावथ बुज्जी बनाम तेलंगाना राज्य फैसले (जिसमें अमीना बेगम, खुदीराम दास, ख्वाजा बिलाल अहमद और शिब्बन लाल सक्सेना मामलों पर चर्चा की गई थी) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“दूसरी बात, यदि डिटेनिंग अथॉरिटी अपने प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र से बाहर के पुलिस थानों में दर्ज दो एफआईआर पर विचार करना ही चाहती थी, तो उसे यह व्यक्तिपरक संतुष्टि दर्ज करनी चाहिए थी कि उन दोनों एफआईआर की घटनाओं ने ‘पब्लिक डिसऑर्डर’ (लोक अव्यवस्था) पैदा किया था।”

डिटेंशन आदेश की समीक्षा करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि उसमें इस बात का कोई उल्लेख या निष्कर्ष नहीं था कि चिल्लाकूर और गूदूर रूरल की घटनाओं ने नेल्लोर जिले के पब्लिक ऑर्डर को कैसे प्रभावित किया। पीठ ने टिप्पणी की:

“‘पब्लिक ऑर्डर के रखरखाव पर प्रतिकूल प्रभाव’ या ‘पब्लिक ऑर्डर पर विपरीत असर’ का डिटेनिंग अथॉरिटी के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार से बाहर की गई गतिविधियों से सीधा संबंध होना चाहिए। डिटेनिंग अथॉरिटी के क्षेत्राधिकार के भीतर पब्लिक ऑर्डर पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाया जाना चाहिए। डिटेनिंग अथॉरिटी को इस बिंदु पर संतुष्ट होना चाहिए था। ऐसी संतुष्टि का कोई निष्कर्ष दर्ज न होने की स्थिति में, डिटेनिंग अथॉरिटी के क्षेत्राधिकार से बाहर के क्षेत्र से संबंधित दो आपराधिक मामलों के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश टिक नहीं सकता।”

अतिरिक्त हलफनामे के जरिए इस कमी को पूरा करने की सरकार की कोशिश को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक मामलों—मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त और कमिश्नर ऑफ पुलिस, बॉम्बे बनाम गोवर्धनदास भानजी (जिन्हें सैयद मोहियुद्दीन में भी दोहराया गया)—का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया:

“किसी वैधानिक अधिकार के प्रयोग में सार्वजनिक रूप से जारी किए गए लोक आदेशों की व्याख्या बाद में उस अधिकारी द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों के आधार पर नहीं की जा सकती कि उसका क्या आशय था, उसके मन में क्या चल रहा था, या वह क्या करना चाहता था। सार्वजनिक प्राधिकारियों द्वारा जारी किए गए लोक आदेश सार्वजनिक प्रभाव के लिए होते हैं और उनका उद्देश्य उन लोगों के आचरण को प्रभावित करना होता है जिनके खिलाफ वे जारी किए गए हैं; इसलिए आदेश की भाषा के संदर्भ में ही उनका वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जाना चाहिए।”

दूसरे मुद्दे यानी जमानत की शर्तों पर विचार न किए जाने को लेकर अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ऋषिकेश तानाजी भोईटे बनाम महाराष्ट्र राज्य और रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य, तथा हाईकोर्ट के बुद्दिगा धना लक्ष्मी, पोन्नाडा गीता और वसंतू सुमलता मामलों से कानून स्पष्ट है। जमानत आदेश और उसमें लगाई गई शर्तें बेहद महत्वपूर्ण सामग्री हैं। भले ही डिटेनिंग अथॉरिटी को जमानत मिलने की जानकारी थी, लेकिन उसने जमानत की शर्तों और इस पहलू पर विचार नहीं किया कि क्या वे शर्तें बंदी को दोबारा अपराध करने से रोकने के लिए पर्याप्त थीं।

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शिव प्रसाद भटनागर बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया:

“एक ही दूषित आधार पूरे डिटेंशन आदेश को अमान्य करने के लिए पर्याप्त है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश दो मुख्य कारणों से निरस्त किए जाने योग्य है:

  1. डिटेनिंग अथॉरिटी यह दर्शाने वाली संतुष्टि दर्ज करने में विफल रही कि उसके प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र से बाहर दर्ज दो आपराधिक मामलों ने उसके अपने स्थानीय क्षेत्र के पब्लिक ऑर्डर पर क्या प्रतिकूल असर डाला था।
  2. अथॉरिटी ने यह परखने में दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया कि क्या क्राइम नंबर 138/2024 और 149/2025 में दी गई जमानत की शर्तें बंदी को प्रिवेंटिव डिटेंशन के बिना आपराधिक गतिविधियों से दूर रखने के लिए पर्याप्त थीं या नहीं।

इन निष्कर्षों के साथ हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए 2 दिसंबर 2025 के डिटेंशन आदेश और 2 फरवरी 2026 के पुष्टिकरण आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि बंदी किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। साथ ही, अदालत ने डिटेनिंग अथॉरिटी को कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने की छूट दी, बशर्ते कुल डिटेंशन अवधि कानून द्वारा तय सीमा से अधिक न हो।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: देवाल्ला दिव्या बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और 3 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 35016 / 2025
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी

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