‘पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा…’ वकीलों की पहचान न बन जाए यह कहावत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए जारी की गाइडलाइंस

उत्तर प्रदेश में सरकारी वकीलों की नियुक्ति और उनके नियमन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि स्टेट ऑफ पंजाब बनाम बृजेश्वर सिंह चहल मामले में सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी दिशानिर्देशों को उत्तर प्रदेश पर हूबहू लागू नहीं किया जा सकता। पीठ ने रेखांकित किया कि उत्तर प्रदेश में लीगल रिमेंबरेंसर (एलआर) मैनुअल की मौजूदगी, वकीलों के अलग फीस ढांचे और ठोस तथ्यात्मक भिन्नताओं के चलते यह अंतर मौजूद है। हालांकि, मौजूदा नियुक्तियों को रद्द करने से इनकार करते हुए हाईकोर्ट ने सरकारी वकीलों के चयन में पारदर्शिता और शुचिता सुनिश्चित करने के लिए आठ सूत्रीय बाध्यकारी दिशानिर्देश जारी किए हैं। इनमें आवश्यकता-आधारित आकलन, आपराधिक इतिहास वाले व्यक्तियों की नियुक्ति पर रोक, राज्य के खिलाफ केस लड़ने पर पूर्व अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) और महिला वकीलों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना शामिल है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2017 से 2022 के बीच दाखिल तीन जुड़ी याचिकाओं से सामने आया, जिनमें राज्य विधि अधिकारियों (स्टेट लॉ ऑफिसर्स) के चयन और पैनल तैयार करने की प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। इनमें गवर्नमेंट एडवोकेट, एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल, एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल, स्टैंडिंग काउंसिल और सिविल व क्रिमिनल ब्रीफ होल्डर्स के पद शामिल हैं।

प्रमुख जनहित याचिका (पीआईएल संख्या 16009/2017) में आरोप लगाया गया कि नियुक्तियों की प्रक्रिया अपारदर्शी है और यह सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम बृजेश्वर सिंह चहल (2016) तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट की समन्वय पीठ के अहमद हुसैन खान बनाम यूपी राज्य (2016) के फैसलों का उल्लंघन करती है। इसी याचिका में दो हस्तक्षेप आवेदन भी दाखिल हुए। अधिवक्ता मनीषा श्रीवास्तव ने महिला वकीलों को उचित प्रतिनिधित्व देने की मांग करते हुए एलआर मैनुअल को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के विरुद्ध बताया। वहीं, दूसरे हस्तक्षेपकर्ता अधिवक्ता अरुण कुमार तिवारी ने वकीलों की नियुक्ति के बाद निगरानी की कमी, निजी प्रैक्टिस से हितों के टकराव, सार्वजनिक शिकायत निवारण तंत्र के अभाव और सरकारी वकीलों के बार एसोसिएशन चुनाव लड़ने का मुद्दा उठाया।

दूसरी याचिका (रिट-सी संख्या 31400/2017) अधिवक्ता महेंद्र नाथ राय ने व्यक्तिगत रूप से दायर की थी, जिन्होंने 2017 में नियुक्ति के लिए आवेदन किया था लेकिन उनका चयन नहीं हुआ था। उन्होंने 2023 में जारी लगभग 2,100 सरकारी वकीलों की सूची को यह कहते हुए चुनौती दी कि इसमें कोई सार्वजनिक विज्ञापन नहीं निकाला गया, मुकदमों के बोझ का कोई वास्तविक आकलन नहीं हुआ और आपराधिक इतिहास की जांच नहीं की गई। तीसरी याचिका (पीआईएल संख्या 527/2022) रमा शंकर तिवारी व अन्य ने दाखिल की, जिसमें 2022 की सूची में ब्रीफ होल्डर्स के लिए एलआर मैनुअल के अनुसार न्यूनतम पांच साल की वकालत की शर्त पूरी न होने और छह चीफ स्टैंडिंग काउंसिल नियुक्त किए जाने पर सवाल उठाए गए।

पक्षों की दलीलें और पेश हुए वकील

मुख्य जनहित याचिका में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता चंद्र भूषण पांडे पेश हुए, जिनका सहयोग अधिवक्ता तृप्ति, मोहित अशोक, अरुंधति ठाकुर और असीम कुमार सिंह ने किया (रिकॉर्ड पर अधिवक्ता मनोज कुमार तिवारी और अशोक पांडे भी मौजूद थे)। उन्होंने दलील दी कि राज्य सरकार ने तय प्रक्रिया और राज्य मुकदमा नीति (स्टेट लिटिगेशन पॉलिसी) को दरकिनार कर सुप्रीम कोर्ट के चहल फैसले की अनदेखी करते हुए नियुक्तियां की हैं।

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हस्तक्षेपकर्ता अरुण कुमार तिवारी ने व्यक्तिगत रूप से बहस करते हुए कहा कि एलआर मैनुअल में सरकारी वकीलों की जवाबदेही और सतत निगरानी का अभाव है। उन्होंने कहा कि सरकारी वकीलों की निजी वकालत से हितों का टकराव होता है और पद पर रहते हुए उन्हें बार चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। महिला वकीलों के प्रतिनिधित्व पर हस्तक्षेपकर्ता मनीषा श्रीवास्तव ने दलील दी कि एलआर मैनुअल के दिशा-निर्देशों में पारदर्शिता न होने से लैंगिक असमानता बढ़ती है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के योगमाया एमजी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2025) के निर्णय का हवाला देते हुए पैनल में महिला वकीलों के लिए 30 प्रतिशत का मानक तय करने का अनुरोध किया।

रिट-सी संख्या 31400/2017 में याचिकाकर्ता महेंद्र नाथ राय ने व्यक्तिगत रूप से पेश होकर कहा कि हाईकोर्ट में लगभग 111 कार्यरत जजों के मुकाबले करीब 2,100 सरकारी वकील नियुक्त कर दिए गए, जो जरूरत से करीब 1,000 अधिक हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इससे सरकारी खजाने पर हर महीने लगभग 5 करोड़ रुपये का अनावश्यक बोझ पड़ता है। उन्होंने बृजेश्वर सिंह चहल मामले के विभिन्न अंशों का हवाला दिया और बताया कि जब उन्होंने आरटीआई लगाकर पूछा कि क्या नियुक्त वकीलों पर आपराधिक मुकदमे लंबित हैं, तो विभाग ने इस सवाल को ही “भ्रामक” बताकर टाल दिया।

पीआईएल संख्या 527/2022 में अधिवक्ता आलोक कीर्ति मिश्रा, याचिकाकर्ता रमा शंकर तिवारी (व्यक्तिगत रूप से) और अधिवक्ता धर्मेश कुमार द्विवेदी (रिकॉर्ड पर अधिवक्ता दिनेश कुमार त्रिपाठी सहित) ने दलील दी कि 2022 के पैनल में कई ब्रीफ होल्डर्स पांच साल के न्यूनतम अनुभव की अनिवार्यता पूरी नहीं करते थे और बिना किसी आवश्यकता के छह चीफ स्टैंडिंग काउंसिल नियुक्त कर दिए गए।

इन याचिकाओं का विरोध करते हुए उत्तर प्रदेश के एडवोकेट जनरल अजय कुमार मिश्रा ने, एडिशनल एडवोकेट जनरल डी.वी. सिंह व कुलदीप पति त्रिपाठी, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल शैलेंद्र कुमार सिंह, एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल विवेक शुक्ला व ईशान मेहता तथा स्टैंडिंग काउंसिल योगेश कुमार अवस्थी के साथ, सबसे पहले जनहित याचिकाओं की विचारणीयता पर सवाल उठाया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विंग कमांडर जी.बी. अत्री बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2021) का हवाला देते हुए कहा कि व्यक्तिगत हित रखने वाला व्यक्ति जनहित याचिका दायर नहीं कर सकता।

मेरिट पर एडवोकेट जनरल ने दलील दी कि क्विन बनाम लीथम (1901) के कानूनी सिद्धांत के अनुसार बृजेश्वर सिंह चहल का फैसला इस मामले पर सीधे लागू नहीं होता। चहल का मामला हरियाणा में सीएजी (कैग) की प्रतिकूल रिपोर्ट और पंजाब व हरियाणा में नियमों की पूर्ण अनुपस्थिति पर आधारित था। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में एलआर मैनुअल का सुस्थापित ढांचा मौजूद है और यहाँ निश्चित मासिक वेतन के बजाय रिटेनरशिप व प्रति-सुनवाई के आधार पर हाइब्रिड मानदेय दिया जाता है। हालांकि, राज्य सरकार ने व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए हाईकोर्ट के रचनात्मक सुझावों का स्वागत किया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

बृजेश्वर सिंह चहल मामले की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को स्वीकार किया कि किसी भी अदालती नजीर को तथ्यों से अलग रखकर लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ एमपी बनाम नर्मदा बचाओ आंदोलन (2011) के फैसले को उद्धृत किया:

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“अदालत को किसी फैसले पर यह विचार किए बिना भरोसा नहीं करना चाहिए कि उस फैसले की तथ्यात्मक स्थिति वर्तमान मामले के तथ्यों से कैसे मेल खाती है, क्योंकि इसका निर्धारण दोनों पक्षों द्वारा उठाए गए मुद्दों और मामले के सभी भौतिक तथ्यों का विश्लेषण करके किया जाना चाहिए। किसी फैसले का पालन किसी विशिष्ट मामले में नहीं किया जा सकता यदि उसमें कुछ विशिष्ट भिन्नताएं हों।”

हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश के मामले में कैग की कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं है, यहाँ एलआर मैनुअल लागू है और मानदेय का ढांचा पूरी तरह भिन्न है। इसलिए चहल मामले के निर्देश यहाँ स्वतः लागू नहीं होते। फिर भी, सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम यूपी स्टेट लॉ ऑफिसर्स एसोसिएशन (1994) के निर्णय का हवाला देते हुए पीठ ने रेखांकित किया:

“चाहे कोई भी तरीका अपनाया जाए, यह प्रदर्शित होना चाहिए कि योग्यतम व्यक्तियों की तलाश की गई थी और नियुक्तियां केवल योग्यता के आधार पर की गईं, किसी अन्य विचार के आधार पर नहीं।”

महिला आरक्षण और एलआर मैनुअल की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले हस्तक्षेप आवेदन पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक हस्तक्षेपकर्ता मुख्य याचिका के दायरे से बाहर जाकर नई स्वतंत्र राहत की मांग नहीं कर सकता। हालांकि, अदालत ने माना कि सरकार को पैनल में महिलाओं के उचित प्रतिनिधित्व का प्रयास करना चाहिए।

सरकारी वकीलों की निगरानी और निजी प्रैक्टिस के मुद्दे पर पीठ ने एलआर मैनुअल के पैरा 4.07 और 4.19 का संज्ञान लिया। अदालत ने कोई अलग शिकायत समिति बनाने से इनकार करते हुए कहा कि इससे दुर्भावनापूर्ण शिकायतों का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि एलआर मैनुअल के पैरा 4.19 के तहत सरकारी वकीलों द्वारा दिया जाने वाला वार्षिक विवरण केवल आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसमें उनके द्वारा संभाले गए सभी प्रकार के मुकदमों का ब्यौरा शामिल होना चाहिए।

आपराधिक इतिहास से जुड़ी आरटीआई पर राज्य के जवाब पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“इस अदालत का दृढ़ विश्वास है कि एक वकील का चोगा आपराधिक आचरण के दाग को नहीं छिपा सकता, न ही कानून की डिग्री कानून से कोई छूट प्रदान कर सकती है। वकालत का पेशा अपने मूल स्वभाव से ही शुचिता, निष्ठा और उच्च पेशेवर आचरण के उच्चतम मानकों की मांग करता है। इसी संदर्भ में अदालत यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि अक्सर दोहराई जाने वाली यह कहावत: ‘पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा, लो आज हम भी साहब-ए-औलाद हो गए!’ न्याय की अदालतों में वकालत करने वाले किसी भी वकील की पहचान या उसका ट्रेडमार्क न बनने पाए।”

अदालत ने मोहम्मद कफील बनाम यूपी राज्य (2025) का संदर्भ देते हुए कहा कि जब सामान्य वकीलों के आपराधिक इतिहास की जांच हो सकती है, तो राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकारी वकीलों की जांच के मानक और भी अधिक कड़े होने चाहिए।

मुकदमों के बोझ के आकलन और छह चीफ स्टैंडिंग काउंसिल की नियुक्ति पर हाईकोर्ट ने पाया कि बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद राज्य सरकार यह साबित करने वाला कोई वस्तुनिष्ठ डेटा या पैमाना पेश नहीं कर सकी कि इतने वकीलों की आवश्यकता क्यों थी। सुप्रीम कोर्ट के रतन चंद हीरा चंद बनाम असकर नवाज जंग (1991) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जब जनहित का विषय हो, तो प्रशासनिक या विधायी शून्यता को भरना अदालतों का दायित्व बन जाता है। जनता की गाढ़ी कमाई के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक प्राथमिक आवश्यकता आकलन (नीड्स असेसमेंट) अनिवार्य है।

पीठ ने यह भी दर्ज किया कि राज्य सरकार ने 4 अक्टूबर 2023 के अपने हलफनामे में यह जानकारी दी है कि एडवोकेट जनरल की अध्यक्षता में एक स्क्रीनिंग कमेटी गठित की जा चुकी है, जिसमें मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव, गृह विभाग के प्रमुख सचिव सदस्य हैं और प्रमुख सचिव (विधि)/लीगल रिमेंबरेंसर सदस्य सचिव हैं।

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हाईकोर्ट का निर्णय एवं आठ दिशानिर्देश

सभी याचिकाओं का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूर्व में हो चुकी नियुक्तियों को रद्द नहीं किया जा रहा है, लेकिन भविष्य में होने वाली सभी नियुक्तियों के लिए राज्य सरकार को निम्नलिखित आठ दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया:

  1. आवश्यकता का आकलन: मुकदमों के सुचारू संचालन के लिए राज्य सरकार सबसे पहले सरकारी वकीलों की वास्तविक आवश्यकता का वस्तुनिष्ठ और उचित आकलन करेगी।
  2. योग्यता और आपराधिक इतिहास पर रोक: राज्य सरकार अनुभव, दक्षता, आचरण और शुचिता को ध्यान में रखते हुए पारदर्शी चयन मानदंड तय करेगी। किसी भी आपराधिक इतिहास या अवांछनीय आचरण वाले व्यक्ति को स्टेट लॉ ऑफिसर नियुक्त नहीं किया जाएगा।
  3. व्यापक कार्य विवरण: एलआर मैनुअल के पैरा 4.19 के तहत वार्षिक कार्य विवरण केवल आपराधिक मुकदमों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें सभी श्रेणियों के मुकदमों का विवरण दर्ज होगा।
  4. पारदर्शिता और सार्वजनिक दायरा: पात्रता और चयन प्रक्रिया से जुड़ी जानकारियों को नियमानुसार सार्वजनिक दायरे में रखा जाएगा।
  5. महिलाओं का प्रतिनिधित्व: उपलब्धता के आधार पर सरकारी वकीलों के पैनल में महिला अधिवक्ताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाएगा।
  6. दर्ज मुकदमों की सूचना: उत्तर प्रदेश में किसी भी स्टेट लॉ ऑफिसर के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने पर उसकी प्रति बिना किसी विलंब के एडवोकेट जनरल को भेजी जाएगी, ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके।
  7. राज्य के विरुद्ध पैरवी पर रोक: कोई भी सरकारी वकील राज्य के खिलाफ किसी निजी पक्षकार की ओर से तभी पेश हो सकेगा, जब उसके पास सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनापत्ति (एनओसी) हो और वह वकालतनामे के साथ संलग्न हो। यह प्रतिबंध एलआर मैनुअल के पैरा 6.11 की शर्तों के अधीन ब्रीफ होल्डर्स पर लागू नहीं होगा।
  8. बार चुनावों में भागीदारी की समीक्षा: राज्य सरकार सभी हितधारकों, बार काउंसिल और बार एसोसिएशनों से परामर्श करके यह तय करेगी कि क्या पद पर रहते हुए कोई सरकारी वकील बार के चुनावों में भाग ले सकता है या नहीं, और इसके लिए आवश्यक नियम बनाएगी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: महेंद्र सिंह पवार बनाम यूपी राज्य, प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री व अन्य के माध्यम से (संबद्ध याचिकाओं सहित) 

वाद संख्या: पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) संख्या 16009/2017, रिट-सी संख्या 31400/2017 और पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) संख्या 527/2022 

पीठ: जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती 

निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर 2026

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