प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) कानूनों के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों पर एक महत्वपूर्ण फैसले में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक कथित आरोपी के खिलाफ जारी डिटेंशन आदेश और उसकी पुष्टि को रद्द कर दिया है। जस्टिस रवि नाथ तिल्हरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी की खंडपीठ ने हेबियस कॉर्पस याचिका स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि डिटेन्यू को पूर्व में दी गई जमानत के आदेशों पर विचार करने में डिटेनिंग अथॉरिटी (नजरबंदी प्राधिकारी) की विफलता उसके व्यक्तिगत समाधान (सब्जेक्टिव सेटिस्फैक्शन) को दूषित करती है। हाईकोर्ट ने माना कि जमानत आदेश और उनमें लगाई गई शर्तें अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री हैं, जिन्हें प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश पारित करने से पहले सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना और उन पर विचार किया जाना अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता कोम्मा शिवा हरिता ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर कर डिटेन्यू यालापाला मारुति प्रसाद रेड्डी उर्फ तालमरला मारुति रेड्डी उर्फ मारुति के प्रिवेंटिव डिटेंशन को चुनौती दी थी।
डिटेन्यू के खिलाफ श्री सत्य साई जिले के कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट द्वारा आंध्र प्रदेश प्रिवेंशन ऑफ डेंजरस एक्टिविटीज ऑफ बूटलेगर्स, डकैट्स, ड्रग ऑफेंडर्स, गुंडास, इम्मोरल ट्रैफिक ऑफेंडर्स एंड लैंड ग्रैबर्स एक्ट, 1986 की धारा 3 के तहत 2 अप्रैल 2026 को डिटेंशन आदेश जारी किया गया था। बाद में सामान्य प्रशासन (एससी-I) विभाग ने 18 मई 2026 को सरकारी आदेश जारी कर इस डिटेंशन की पुष्टि कर दी थी।
डिटेनिंग अथॉरिटी ने इस आदेश का आधार डिटेन्यू के खिलाफ दर्ज नौ आपराधिक मामलों को बनाया था:
- कोथाचेरुवु पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 143, 147, 341, 447, 506 सपठित धारा 149 के तहत दर्ज अपराध संख्या 232/2020।
- कोथाचेरुवु पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 79, 118(1), 329(3), 351(2) सपठित धारा 3(5) के तहत दर्ज अपराध संख्या 116/2025।
- कोथाचेरुवु अर्बन पुलिस स्टेशन में बीएनएस, 2023 की धारा 79, 129(3), 329(3), 351(2) सपठित धारा 3(5) के तहत दर्ज अपराध संख्या 14/2026।
- कोथाचेरुवु अर्बन पुलिस स्टेशन में बीएनएस की धारा 111, 132, 351(2) के तहत दर्ज अपराध संख्या 15/2026।
- पुट्टपर्थी अर्बन पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 447, 353, 506 सपठित धारा 34 और आंध्र प्रदेश लैंड ग्रैबिंग (निषेध) अधिनियम, 1982 की धारा 3 और 4 के तहत दर्ज अपराध संख्या 45/2022।
- पुट्टपर्थी अर्बन पुलिस स्टेशन में बीएनएस की धारा 115(2), 351(2), 126(1) के तहत दर्ज अपराध संख्या 70/2025।
- पुट्टपर्थी अर्बन पुलिस स्टेशन में बीएनएस की धारा 103(2), 238 सपठित धारा 3(5) के तहत दर्ज अपराध संख्या 01/2026।
- पुट्टपर्थी रूरल पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 324, 354, 506 सपठित धारा 34 के तहत दर्ज अपराध संख्या 94/2022।
- गोरंटला पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 323, 506 सपठित धारा 34 के तहत दर्ज अपराध संख्या 159/2019।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील दुष्यंत रेड्डी (अधिवक्ता के.वी. आदित्य चौधरी का प्रतिनिधित्व करते हुए) ने दलील दी कि जिन नौ मामलों को डिटेंशन का आधार बनाया गया है, उनमें से दो मामलों (आधार संख्या 5 और 7) में डिटेन्यू को पहले ही नियमित जमानत मिल चुकी थी। इसके बावजूद इन जमानत आदेशों को डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष नहीं रखा गया। नतीजतन, डिटेंशन आदेश और उसकी पुष्टि महत्वपूर्ण सामग्री पर विचार न किए जाने के दोष से ग्रस्त है, जिससे प्राधिकारी का व्यक्तिगत समाधान पूरी तरह दूषित हो गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी इंगित किया कि आधार संख्या 7 में अभियोजन पक्ष ने 3 मार्च 2026 को जमानत रद्द करने का आवेदन दिया था और जमानत 9 अप्रैल 2026 को यानी डिटेंशन आदेश पारित होने के बाद रद्द हुई थी, लेकिन स्पॉन्सरिंग अथॉरिटी ने जमानत रद्दीकरण की अर्जी को भी डिटेनिंग अथॉरिटी के सामने पेश नहीं किया। इसके अलावा, पांच मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41ए के तहत नोटिस दिए गए थे और शेष दो मामलों में डिटेन्यू को गिरफ्तार ही नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इन कथित अपराधों से सामान्य कानून के तहत निपटा जा सकता था और लोक व्यवस्था (पब्लिक ऑर्डर) को कोई खतरा नहीं था।
राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील कीर्ति तेजा कोंडावेती ने इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं किया कि आधार संख्या 5 और 7 के जमानत आदेशों पर डिटेनिंग अथॉरिटी द्वारा विचार नहीं किया गया था। हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि डिटेन्यू की गतिविधियां लोक व्यवस्था बनाए रखने के प्रतिकूल थीं, जिसके चलते व्यक्तिगत समाधान दर्ज करते हुए एहतियाती उपाय के रूप में प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश पारित किया गया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
कानूनी स्थिति का विश्लेषण करते हुए खंडपीठ ने दोहराया कि जमानत आदेश एक अत्यंत प्रासंगिक और अनिवार्य सामग्री हैं, जिन पर विचार किए बिना वैध व्यक्तिगत समाधान पर नहीं पहुंचा जा सकता।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऋषिकेश तानाजी भोईटे बनाम महाराष्ट्र राज्य निर्णय का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था:
“ऐसे मामले में जहां निरूद्ध व्यक्ति (डिटेन्यू) जमानत पर रिहा हो चुका है और डिटेंशन आदेश पारित होने के समय अदालत के आदेश के तहत अपनी स्वतंत्रता का उपभोग कर रहा है, तो हमारी राय में, डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष ऐसा जमानत आदेश अवश्य पेश किया जाना चाहिए ताकि वह उचित समाधान तक पहुंच सके।”
पीठ ने ऋषिकेश तानाजी भोईटे मामले से आगे उद्धृत करते हुए कहा:
“…यह कहना पर्याप्त होगा कि जमानत आदेश जैसी महत्वपूर्ण सामग्री को पेश न करने और उस पर विचार न करने से डिटेनिंग अथॉरिटी का व्यक्तिगत निर्णय दूषित हो गया है।”
अदालत ने जोयी किट्टी जोसेफ बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जहां यह स्पष्ट किया गया था कि जब अधिकार क्षेत्र वाली अदालत द्वारा शर्तों के साथ जमानत दी गई हो, तो डिटेनिंग अथॉरिटी को यह देखना चाहिए कि क्या वे शर्तें आरोपी को दोबारा ऐसे अपराध करने से रोकने के लिए पर्याप्त थीं:
“हम इस पहलू से अधिक चिंतित हैं कि डिटेनिंग अथॉरिटी ने शर्तों की प्रभावशीलता पर विचार नहीं किया और न ही इस बारे में कोई समाधान दर्ज किया, चाहे वह कितना भी व्यक्तिपरक क्यों न हो, कि वे शर्तें डिटेन्यू को ऐसी गतिविधियों में लिप्त होने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं थीं।”
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के अपने पूर्ववर्ती फैसले बुद्दिगा धना लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (जिसमें पोन्नाडा गीता और वसंतू सुमलता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य पर चर्चा की गई थी) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि यदि किसी मामले में डिटेन्यू जमानत पर रिहा है और उसी अपराध को नजरबंदी का आधार बनाया गया है, तो जमानत आदेश पेश न करना और उस पर विचार न करना डिटेंशन आदेश को अमान्य बना देता है।
वर्तमान मामले में पीठ ने पाया कि डिटेनिंग अथॉरिटी को इस बात की जानकारी तक नहीं थी कि आधार संख्या 5 और 7 के मामलों में डिटेन्यू जमानत पर बाहर था, क्योंकि ये आदेश उसके सामने रखे ही नहीं गए थे।
याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए “लोक व्यवस्था” (पब्लिक ऑर्डर) बनाम “कानून और व्यवस्था” (लॉ एंड ऑर्डर) के बिंदु और अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य (जिसमें राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य, अरुण घोष बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, कुसो साह बनाम बिहार राज्य और रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य का संदर्भ था) पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब आदेश जमानत पर विचार न करने के आधार पर ही टिक नहीं सकता, तो अन्य पहलुओं पर जाने की आवश्यकता नहीं है:
“याचिकाकर्ता के विद्वान वकील की इस दलील के संबंध में कि यह कानून और व्यवस्था के उल्लंघन का मामला है जो लोक व्यवस्था को प्रभावित नहीं करता है, हमारा यह मानना है कि चूंकि हम इस बात से संतुष्ट हैं कि डिटेनिंग अथॉरिटी द्वारा जमानत आदेशों पर विचार नहीं किया गया था, इसलिए प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश बरकरार नहीं रखा जा सकता, भले ही यह लोक व्यवस्था के लिए खतरे का मामला हो, हालांकि हम इसे केवल लोक व्यवस्था या कानून और व्यवस्था की स्थिति का मामला होने के संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दे रहे हैं।”
पीठ ने शिव प्रसाद भटनागर बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का स्मरण करते हुए उल्लेख किया कि “एक अकेला दूषित आधार ही प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को अमान्य करने के लिए पर्याप्त है।” साथ ही प्रमोद सिंगला बनाम भारत संघ मामले के आधार पर यह भी रेखांकित किया कि प्रिवेंटिव डिटेंशन के मामलों में संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22(5) के सिद्धांतों के तहत हर प्रक्रियात्मक खामी का लाभ डिटेन्यू को मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 2 अप्रैल 2026 के प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश और 18 मई 2026 के पुष्टि आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि डिटेन्यू किसी अन्य लंबित मामले में हिरासत में नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। हालांकि, खंडपीठ ने डिटेनिंग अथॉरिटी को कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने की छूट दी और स्पष्ट किया कि यदि कोई नया आदेश पारित किया जाता है, तो कुल डिटेंशन अवधि वैधानिक अधिकतम सीमा से अधिक नहीं होगी, जिसमें रद्द किए गए आदेश के तहत पहले काटी जा चुकी अवधि भी शामिल होगी। मामले में कोई खर्च अधिरोपित नहीं किया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कोम्मा शिवा हरिता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी), प्रधान सचिव द्वारा प्रतिनिधित्व, एवं 3 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 13273/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिल्हरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी

