समन केस में डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करना स्वीकार्य नहीं, जब तक उसे वारंट केस में न बदला जाए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि समन केस (summons case) के आरोपी को डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने का अधिकार तब तक नहीं है, जब तक कि मजिस्ट्रेट अपने विवेक का प्रयोग कर मामले को वारंट केस (warrant case) में परिवर्तित न कर दे। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एन.आई. एक्ट (N.I. Act) के एक मामले में डिस्चार्ज अर्जी खारिज होने के खिलाफ दायर याचिका को निरस्त करते हुए की।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता चेतन कुमार, महोबा जिले के थाना महोबा में अरिमर्दन सिंह द्वारा दायर शिकायत संख्या 1049/2022 (धारा 138, एन.आई. एक्ट) के तहत मुकदमे का सामना कर रहे थे।

याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक डिस्चार्ज अर्जी दाखिल की थी। उनका तर्क था कि शिकायत में संबंधित कंपनी को पक्षकार (party) नहीं बनाया गया है, जो कि एक “गंभीर अवैधता” है। ट्रायल कोर्ट ने 5 अगस्त 2023 को इस अर्जी को खारिज कर दिया। इसके बाद, याचिकाकर्ता ने संबंधित कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन संख्या 84/2023 दाखिल की, जिसे भी 24 सितंबर 2024 को खारिज कर दिया गया। इन दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट और रिवीजनल कोर्ट, दोनों ने ही डिस्चार्ज अर्जी और रिवीजन को खारिज करने में “स्पष्ट अवैधता” (patent illegality) बरती है। उनका मुख्य आधार कंपनी को शिकायत में शामिल न करना था।

वहीं, राज्य की ओर से उपस्थित अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) श्री आर.के. सिंह ने दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि निचली अदालतों द्वारा पारित आदेशों में कोई अवैधता नहीं है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X की पीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने और दोनों पक्षों को सुनने के बाद समन केस की प्रक्रियात्मक स्थिति पर ध्यान केंद्रित किया।

हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“यह सर्वविदित (trite) है कि समन केस में आरोपी द्वारा कोई डिस्चार्ज अर्जी दाखिल नहीं की जा सकती है। वह केवल उन मामलों में डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने का हकदार है जहां मजिस्ट्रेट अपने विवेक का प्रयोग करता है और समन केस को वारंट केस में बदल देता है।”

कानून के इस सिद्धांत को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए, हाईकोर्ट ने पाया कि याचिका में कोई ठोस आधार (merit) नहीं है। इसी के साथ अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया और निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखा।

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केस विवरण

  • केस टाइटल: चेतन कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस नंबर: अनुच्छेद 227 के तहत मामला संख्या 12152/2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X
  • तारीख: 25 मार्च, 2026

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