यूपी में ‘गन कल्चर’ पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: हथियारों के लाइसेंस का मांगा पूरा डेटा, सोशल मीडिया पर प्रदर्शन की भी आलोचना

उत्तर प्रदेश में बढ़ते “गन कल्चर” (बंदूक संस्कृति) पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश भर में जारी किए गए हथियारों के सभी लाइसेंसों का व्यापक डेटा मांगते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह उन मामलों का विस्तृत रिकॉर्ड पेश करे जहां एक ही परिवार के कई सदस्यों के पास व्यक्तिगत लाइसेंस हैं। साथ ही, लाइसेंस धारकों के आपराधिक इतिहास का ब्योरा भी मांगा गया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने भदोही के एक जौहरी जय शंकर उर्फ बैरिस्टर द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने शस्त्र लाइसेंस के आवेदन को खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। 2018 में अनुकूल पुलिस रिपोर्ट मिलने के बावजूद, उनके आवेदन को लगभग चार साल की लंबी देरी के बाद नवंबर 2022 में बिना किसी स्पष्ट कारण के खारिज कर दिया गया था।

अपनी टिप्पणियों के दौरान, न्यायमूर्ति दिवाकर ने उस चिंताजनक प्रवृत्ति को रेखांकित किया जहां लाइसेंसशुदा हथियारों का उपयोग सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और डराने-धमकाने के लिए किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हथियारों के महिमामंडन की कड़ी निंदा की।

कोर्ट ने कहा, “अदालत ने इंस्टाग्राम रील्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हथियारों के प्रदर्शन की आलोचना की है। इस तरह का व्यवहार केवल चर्चा में रहने और सामाजिक पहचान बनाने के लिए किया जाता है, जो गन कल्चर को बढ़ावा देता है।”

हाईकोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि इस तरह का दुरुपयोग “सामंती सत्ता संरचनाओं की निरंतरता, हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन को रोकने वाले नियमों के कमजोर प्रवर्तन और सोशल मीडिया की ‘पीयर-वैलिडेशन’ संस्कृति के प्रभाव को दर्शाता है।” न्यायमूर्ति दिवाकर ने चेतावनी दी कि शक्ति, धारणा और सोशल मीडिया का यह मेल कानूनी संस्थानों में जनता के विश्वास को कम करता है और समाज में हिंसा को सामान्य बनाता है।

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इन चिंताओं को दूर करने के लिए, हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को कई निर्देश जारी किए हैं:

  • नीति और डेटाबेस: अपर मुख्य सचिव को स्पष्ट करना होगा कि क्या शस्त्र लाइसेंसों के लिए कोई केंद्रीकृत डेटाबेस मौजूद है और क्या जिला मजिस्ट्रेटों (डीएम) के लिए लाइसेंस देने या नवीनीकरण करने हेतु कोई औपचारिक नीति निर्धारित है।
  • पारिवारिक लाइसेंस: सभी 75 जिलों के डीएम को थाना-वार उन हथियारों का विवरण देना होगा जो व्यक्तियों के पास हैं। इसमें उन मामलों को विशेष रूप से चिह्नित करना होगा जहां परिवार के कई सदस्यों (पति, पत्नी, बच्चे) के पास अलग-अलग लाइसेंस हैं।
  • अपराधिक इतिहास: कोर्ट ने उन लाइसेंस धारकों के लिए एक अलग श्रेणी बनाने का आदेश दिया है जिनका दो या अधिक मामलों का आपराधिक इतिहास है। सभी जिलों के पुलिस कप्तानों (एसपी/एसएसपी) और पुलिस कमिश्नरों को व्यक्तिगत हलफनामे के माध्यम से यह डेटा प्रस्तुत करना होगा।
  • नियमों का अनुपालन: राज्य को यह पुष्टि करनी होगी कि क्या आर्म्स रूल्स, 2016 के नियम 16 के तहत स्वीकृत लेनदेन को ‘नेशनल डेटाबेस ऑफ आर्म्स लाइसेंस’ (NDAL) सिस्टम पर अपडेट किया जा रहा है।
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हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के आवेदन के निपटारे में हुई “अस्पष्ट देरी” और उसके बाद अपीलीय प्राधिकारी द्वारा बिना किसी ठोस निष्कर्ष के आवेदन को सरसरी तौर पर खारिज करने पर असंतोष व्यक्त किया।

हाईकोर्ट ने जोर देते हुए कहा, “यह ध्यान देना उचित है कि अनियंत्रित विवेकाधिकार भ्रष्टाचार और अधिकार के दुरुपयोग की गुंजाइश पैदा करता है। संसदीय लोकतंत्र में, संस्थानों के भीतर अनियंत्रित विवेकाधीन शक्ति कानून के शासन के लिए खतरा पैदा करती है।”

भदोही के जिला मजिस्ट्रेट को चार साल की देरी और आर्म्स रूल्स, 2016 के नियम 13 के अनुपालन में विफलता के कारणों को स्पष्ट करते हुए जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को होगी।

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