उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन और बीसीसीआई विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच और प्रतिबंध की मांग खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए) के 20 साल पुराने पुनर्गठन और बीसीसीआई से मिले वित्तीय अनुदान की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दो दशक से भी अधिक पुराने इस मामले में वह कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी, क्योंकि यह मूल रूप से एक भंग हो चुकी सोसाइटी के संपत्ति उत्तराधिकार से जुड़ा निजी विवाद है।

अदालत ने खारिज की याचिकाकर्ता की मांगें

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने 3 अगस्त को फैसला सुनाते हुए ‘द क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तर प्रदेश’ द्वारा दायर रिट याचिका को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता ने यूपीसीए की क्रिकेट गतिविधियों पर रोक लगाने, पूर्व सोसाइटी की परिसंपत्तियों के कथित दुरुपयोग की सीबीआई जांच कराने और बीसीसीआई से मिली मान्यता व वित्तीय मदद की पड़ताल के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित करने की मांग की थी।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, “अदालत का मानना है कि यूपीसीए पर प्रतिबंध लगाने या सीबीआई से जांच कराने की याचिकाकर्ता की मांग पूरी तरह निराधार है। यह अनिवार्य रूप से एक भंग सोसाइटी की संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित निजी विवाद है।” कोर्ट ने सीबीआई जांच, प्रतिबंध या बीसीसीआई के अनुदान की जांच के लिए समिति बनाने का निर्देश देने से साफ इनकार कर दिया।

दो दशक पुराने पुनर्गठन का मामला

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यह विवाद वर्ष 2005 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के पुनर्गठन से शुरू हुआ था। सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत मूल संस्था ने अपनी संपत्तियों, देनदारियों और कार्यों को कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 (अब धारा 8) के तहत गठित एक नई कंपनी में स्थानांतरित कर दिया था।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि 3 सितंबर 2005 को हुआ यह पुनर्गठन कानूनी रूप से अवैध था और सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम की धारा 13 का उल्लंघन करता था। उसका कहना था कि चूंकि राज्य सरकार ने सोसाइटी को वित्तीय सहायता दी थी, इसलिए पुनर्गठन से पहले सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य था। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने सभी परिसंपत्तियां खुद को सौंपने और सुप्रीम कोर्ट के खेल प्रशासनिक सुधारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए वर्तमान पदाधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग भी की थी।

बीसीसीआई और यूपीसीए का पक्ष

दूसरी ओर, बीसीसीआई और यूपीसीए ने दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि सोसाइटी का विघटन पूर्णतः वैध प्रक्रिया से हुआ था। सितंबर 2005 में सोसाइटी के तीन-पांचवें से अधिक सदस्यों ने इसके पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था। तब से यूपीसीए ही राज्य में क्रिकेट की आधिकारिक नियामक संस्था के रूप में कार्य कर रही है, जिसने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जस्टिस आर. एम. लोढ़ा समिति के सभी सुधारों को लागू किया है और बीसीसीआई में इसे पूर्ण वोटिंग अधिकार प्राप्त हैं।

प्रतिवादियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में हुई पूर्व की अदालती कार्यवाहियों का भी हवाला दिया, जिनमें यूपीसीए के कॉर्पोरेट संस्था के रूप में गठन पर कोई सवाल नहीं उठाया गया था।

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

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हाईकोर्ट ने माना कि सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम की धारा 13 किसी सोसाइटी की परिसंपत्तियों को कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत कंपनी में स्थानांतरित करने से नहीं रोकती। इसके अलावा, राज्य सरकार अदालत के समक्ष यह साबित करने में विफल रही कि उसने मूल सोसाइटी को कोई वित्तीय योगदान दिया था, जिससे उसकी अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं बनती।

पीठ ने ध्यान दिलाया कि 2005 में डिप्टी रजिस्ट्रार को विघटन की सूचना दिए जाने के बाद से लेकर पिछले 21 वर्षों में किसी सक्षम दीवानी (सिविल) अदालत में इस स्थानांतरण या प्रस्ताव को चुनौती नहीं दी गई थी। अदालत ने टिप्पणी की कि “पिछले दो दशकों में बहुत पानी बह चुका है, जो हमारे द्वारा हस्तक्षेप न करने का एक और बड़ा कारण है।”

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मामले का पटाक्षेप करते हुए पीठ ने कहा, “इस विवाद को अब अंतिम रूप से शांत किया जाना आवश्यक है।” अदालत ने बीसीसीआई को याचिकाकर्ता के नाम देनदारियां स्थानांतरित करने का आदेश (रिट ऑफ मंडामस) देने से भी इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता को कंपनी के आंतरिक कामकाज से कोई शिकायत है, तो वह राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) का दरवाजा खटखटा सकता है। इसके अलावा, वह बीसीसीआई के नियमों के तहत मान्यता प्राप्त करने या राज्य में क्रिकेट विकास के लिए शासन से संपर्क करने के लिए स्वतंत्र है।

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