सैन्य प्रशिक्षण में दिव्यांग हुए कैडेटों को पूर्व सैनिक दर्जा दिए बिना कल्याणकारी लाभ देने पर सुप्रीम कोर्ट का विचार

सैन्य प्रशिक्षण के दौरान चोट लगने या दिव्यांग होने के कारण बाहर (बोर्ड आउट) किए गए ऑफिसर कैडेटों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भले ही केंद्र सरकार तकनीकी और व्यावहारिक कारणों से इन कैडेटों को ‘पूर्व सैनिक’ (एक्स-सर्विसमैन) का आधिकारिक दर्जा न दे सके, लेकिन उनके जीवन को आसान बनाने के लिए वैकल्पिक कल्याणकारी योजनाओं और सुविधाओं पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।

सभरवाल समिति की सिफारिशों पर पुनर्विचार का निर्देश

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार से जुलाई 2015 की सभरवाल समिति की रिपोर्ट पर नए सिरे से विचार करने को कहा। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) मुकेश सभरवाल की अध्यक्षता वाली इस समिति ने दिव्यांग कैडेटों को पूर्व सैनिक का दर्जा देने और उन्हें विकलांगता पेंशन मुहैया कराने की सिफारिश की थी।

मामले पर विचार करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि इन कैडेटों को पूर्ण रूप से पूर्व सैनिक नहीं माना जा सकता, तो उन्हें ‘पूर्व सैन्य कर्मी’ की एक अलग श्रेणी में शामिल किया जा सकता है। ऐसा करने से राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश इन प्रभावित युवाओं को सरकारी नौकरियों में आरक्षण व अन्य सहायता दे सकेंगे।

40 प्रतिशत से कम दिव्यांगता वाले कैडेटों के लिए योजना का सुझाव

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अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि ‘दिव्यांग जन अधिकार अधिनियम, 2016’ के प्रावधान केवल 40 प्रतिशत से अधिक विकलांगता वाले व्यक्तियों पर लागू होते हैं। इस स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या 40 प्रतिशत से कम दिव्यांगता के कारण बाहर किए गए कैडेटों के लिए कोई विशेष कल्याणकारी योजना बनाई जा सकती है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कैडेटों और उनके परिवारों की पीड़ा का जिक्र करते हुए कहा कि प्रशिक्षण के लिए चुने गए ये युवा आम छात्रों से अलग थे और उनके साथ उच्च उम्मीदें जुड़ी हुई थीं, इसलिए उनके लिए यह निराशा बेहद गहरी है। उन्होंने कहा कि कोई अंग गंवा चुका है तो कोई व्हीलचेयर पर है; माता-पिता के न रहने के बाद इनकी देखभाल कौन करेगा। हालांकि, उन्होंने कैडेटों के वकील को यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें नियमित सेवा पूरी करने वाले कमीशन अधिकारियों के साथ पूरी तरह समानता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दोनों श्रेणियों के बीच एक अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

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500 से अधिक कैडेट और आर्थिक संकट

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 11 अगस्त को प्रकाशित ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के आधार पर इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया था। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 1985 से अब तक नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) जैसे देश के शीर्ष सैन्य संस्थानों से लगभग 500 कैडेटों को प्रशिक्षण के दौरान लगी गंभीर चोटों के कारण चिकित्सीय रूप से बाहर कर दिया गया है।

चूंकि ये दुर्घटनाएं औपचारिक कमीशन मिलने से पहले प्रशिक्षण के दौरान होती हैं, इसलिए इन कैडेटों को पूर्व सैनिक का दर्जा नहीं मिलता। इसके परिणामस्वरूप वे ‘पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना’ (ईसीएचएस) से बाहर हो जाते हैं और उन्हें सैन्य अस्पतालों या सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की सुविधा नहीं मिल पाती।

वर्तमान में, बोर्ड आउट किए गए इन कैडेटों को दिव्यांगता के प्रतिशत के आधार पर अधिकतम 40,000 रुपये प्रति माह तक का अनुग्रह भुगतान (एक्स-ग्रेशिया) दिया जाता है। हालांकि, प्रभावित कैडेटों का कहना है कि गंभीर इलाज, थेरेपी और दवाओं के चलते उनका औसतन मासिक चिकित्सा खर्च ही 50,000 रुपये या उससे अधिक बैठता है।

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अगली सुनवाई 8 सितंबर को

अदालत ने कहा कि इस स्वतः संज्ञान याचिका का मुख्य उद्देश्य इन युवाओं के जीवन को सम्मानजनक बनाना और उनके परिवारों पर पड़े आर्थिक बोझ को कम करना है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 8 सितंबर को अगली सुनवाई करेगा।

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