इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (पॉश अधिनियम) से संबंधित बेहद गंभीर आरोपों को सिर्फ इसलिए शुरुआती स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हें दर्ज करने में देरी हुई है। हाईकोर्ट ने देरी के पीछे की खास वजहों पर विचार करना जरूरी माना है। जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने साल 2017 में पारित उस सजा के आदेश को रद्द कर दिया है जिसके तहत एस्ट्रोफिजिक्स के एक एसोसिएट प्रोफेसर पर ‘परिनिंदा’ (सेंसर) और शैक्षणिक प्रतिबंध लगाए गए थे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) द्वारा की गई जांच प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण थी, लेकिन केवल समय सीमा के आधार पर गंभीर शिकायतों को बिना किसी तार्किक मूल्यांकन के सीधे खारिज नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, जो कि एक प्रतिष्ठित अनुसंधान संस्थान में एस्ट्रोफिजिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं, के खिलाफ संस्थान की आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) ने यौन उत्पीड़न (पॉश) कानून के तहत जांच शुरू की थी। यह जांच उनके अधीन पीएचडी कर रही कई छात्राओं द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों के बाद शुरू की गई थी।
शिकायतों में शारीरिक संपर्क, अवांछित व्यवहार और यौन रूप से अमर्यादित टिप्पणियां करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। आईसीसी ने 17 अगस्त 2016 को अपनी जांच पूरी की और प्रोफेसर को दोषी पाया। समिति के सारांश में उन्हें एक “आदतन उत्पीड़क” बताया गया, जिन्होंने संस्थान में अपने रसूख और पद का इस्तेमाल कर लंबे समय (2013 से 2016 के बीच) तक युवा छात्राओं का उत्पीड़न किया। समिति ने यह भी दर्ज किया कि प्रोफेसर ने शुरुआत में एक शिकायतकर्ता को अश्लील लिंक भेजने की बात स्वीकार की थी, जिससे उन्होंने बाद में अपने लिखित जवाब में इनकार कर दिया था।
समिति ने वेतन वृद्धि और पदोन्नति रोकने, छह महीने के निलंबन और सुरक्षा व पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें कांच की दीवारों वाले केबिन में स्थानांतरित करने जैसी सिफारिशें की थीं। इसके बाद, संस्थान की गवर्निंग काउंसिल ने 9 जुलाई 2017 को एक आदेश पारित कर प्रोफेसर को ‘परिनिंदा’ (सेंसर) की सजा सुनाई और उनके अधीन किसी भी छात्रा, पोस्ट-डॉक्टरल फेलो या रिसर्च असिस्टेंट को काम करने देने पर रोक लगा दी। प्रोफेसर ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता (प्रोफेसर) के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि पॉश कानून एक विशेष अधिनियम है, इसलिए इसके प्रावधानों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। अधिनियम की धारा 9 के तहत, शिकायत घटना के तीन महीने के भीतर, या लगातार घटनाओं के मामले में आखिरी घटना के तीन महीने के भीतर दर्ज की जानी चाहिए। यदि उचित कारण हो, तो अधिकतम तीन महीने की अतिरिक्त छूट मिल सकती है। उन्होंने दलील दी कि प्रोफेसर के खिलाफ की गई शिकायतें बिना तारीख की थीं, अस्पष्ट थीं और 2013 से 2016 के बीच की घटनाओं से संबंधित थीं, जो कानूनन पूरी तरह से समय-बाधित थीं।
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले एक्स बनाम निर्मल कांति चक्रवर्ती और अन्य (2025) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जो शिकायतें स्पष्ट रूप से समय-बाधित हों, उन्हें शुरुआत में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, यह भी दलील दी गई कि आईसीसी ने पीड़ितों के बयान दर्ज नहीं किए, बयानों की प्रतियां याचिकाकर्ता को नहीं दीं, न ही उन्हें जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) या मौखिक सुनवाई का अवसर दिया, जो कि पॉश कानून की धारा 11 और नियमों के नियम 7 का सीधा उल्लंघन है।
दूसरी ओर, संस्थान के वरिष्ठ वकील ने रिकॉर्ड के आधार पर यह स्वीकार किया कि आईसीसी के सामने पीड़ितों के बयान दर्ज नहीं किए गए थे और न ही याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर मिला था। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि प्रक्रिया में कोई त्रुटि थी, तो मामले को दोबारा आईसीसी के पास उसी स्तर से भेजा जाना चाहिए जहां गलती हुई थी।
हालांकि, देरी के मुद्दे पर संस्थान के वकील ने तर्क दिया कि पॉश कानून का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित माहौल देना है, इसलिए धारा 9 के तहत समय सीमा के नियम में ढील दी जानी चाहिए। उन्होंने शारीरिक शोषण और देर रात के दबाव जैसे गंभीर आरोपों का हवाला देते हुए कहा कि देरी का उपयोग तकनीकी सुरक्षा कवच के रूप में नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने सबसे पहले पॉश अधिनियम के मूल उद्देश्य को रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) मामले में जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर महिलाओं के मौलिक अधिकारों (संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21) की रक्षा के लिए बनाया गया था।
जांच प्रक्रिया का मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि आईसीसी ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और धारा 11 तथा नियम 7 के नियमों का पूरी तरह उल्लंघन किया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“कोर्ट पाता है कि आईसीसी द्वारा जांच की उक्त निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।”
कोर्ट ने पाया कि पीड़ितों के बयान आईसीसी के सामने दर्ज होने का कोई रिकॉर्ड नहीं था और न ही उनकी प्रतियां याचिकाकर्ता को दी गई थीं। जिरह या मौखिक सुनवाई का भी कोई अवसर नहीं दिया गया था। इसके मद्देनजर कोर्ट ने माना:
“इसलिए, कोर्ट का मानना है कि आईसीसी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी। परिणामस्वरूप, उसकी रिपोर्ट और काउंसिल व संस्थान द्वारा पारित किया गया आदेश कानूनन टिकने योग्य नहीं है।”
हालांकि, जब बात शिकायतें दर्ज करने में हुई देरी की आई, तो हाईकोर्ट ने सुरक्षात्मक रुख अपनाया। शारीरिक उत्पीड़न और देर रात के दबाव जैसे बेहद गंभीर आरोपों को देखते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये कृत्य पॉश कानून की धारा 2(n) के तहत यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं।
कोर्ट ने माना कि शैक्षणिक या पेशेवर क्षेत्रों में यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाएं अक्सर करियर खराब होने के डर और अपनी लाचारी के कारण तुरंत शिकायत नहीं कर पाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक्स बनाम निर्मल कांति चक्रवर्ती मामले के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“…विशेष परिस्थितियों में शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को इस हद तक प्रतिकूल नहीं माना जा सकता कि शिकायत को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया जाए। यह पॉश अधिनियम के उद्देश्यों के अनुकूल नहीं होगा। आमतौर पर ऐसी शिकायतें तुरंत दर्ज नहीं की जाती हैं, खासकर तब जब शिकायतकर्ता आरोपी के अधीन काम कर रहे हों, क्योंकि इससे उनके भविष्य पर असर पड़ सकता है।”
इस प्रकार, हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि तकनीकी समय सीमा का हवाला देकर बिना किसी तर्कसंगत जांच के शिकायतों को खारिज नहीं किया जा सकता:
“इन परिस्थितियों में, कोर्ट का मानना है कि विशेष विचार किए बिना शिकायतों को शुरुआती स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 9 जुलाई 2017 के सजा के आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने आईसीसी को निर्देश दिया कि वह सभी शिकायतों पर नए सिरे से विचार करे। इस दौरान समिति को शिकायतों की समय-सीमा, स्पष्ट तारीखों और देरी के कारणों पर विशेष ध्यान देना होगा। आईसीसी को आठ सप्ताह के भीतर एक तर्कसंगत निर्णय पारित करना होगा कि शिकायतों को समय-बाधित मानकर शुरुआती स्तर पर खारिज किया जाए या जांच को आगे बढ़ाया जाए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को जांच प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार तभी मिलेगा जब आईसीसी आगे बढ़ने का फैसला करेगी और पॉश कानून के नियमों के तहत औपचारिक जांच शुरू करेगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: डॉ. तपस कुमार दास बनाम हरीश चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट और 3 अन्य
वाद संख्या: रिट – ए संख्या 12736/2018
पीठ: जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी
निर्णय की तिथि: 07 मई, 2026

