लंबे समय के लिव-इन रिलेशनशिप में सहमति का अनुमान, बाद में शादी से इनकार बलात्कार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक चले लिव-इन रिलेशनशिप में आपसी सहमति का कानूनी अनुमान लगाया जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे संबंधों के बाद शादी से इनकार करने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की डिविजन बेंच ने एक 40 वर्षीय महिला द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अपीलकर्ता ने निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376(2)(के)(एन) और 377 के आरोपों से बरी कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, जो भिलाई नगर निगम में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत है, अप्रैल 2019 में रायपुर स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) में एमबीए कोर्स में प्रवेश के दौरान आरोपी के संपर्क में आई थी। पीड़िता की शिकायत के अनुसार, 5 जुलाई 2019 को आरोपी ने पढ़ाई के बहाने उसे अपने घर बुलाया। वहां कोई और छात्र मौजूद नहीं था। पीड़िता का आरोप है कि आरोपी ने शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जताई और जब उसने आपत्ति की, तो आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया। इस वादे के भरोसे आकर उसने आरोपी के साथ शारीरिक संबंध बनाए।

इसके बाद दोनों लगभग दो साल तक लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे। पीड़िता के अनुसार, आरोपी लगातार शादी की बात टालता रहा। 29 अगस्त 2021 को आरोपी ने फोन पर बताया कि उसके माता-पिता इस शादी के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि पीड़िता की उम्र अधिक है, वह तलाकशुदा है और ईसाई धर्म से है। इसके बाद 28 नवंबर 2021 को जब पीड़िता शादी का अनुरोध करने आरोपी के घर गई, तो आरोप है कि आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ अप्राकृतिक शारीरिक संबंध बनाए।

यह मामला बाद में महिला आयोग पहुंचा, जहां दोनों के बीच 30 लाख रुपये का वित्तीय समझौता प्रस्तावित किया गया था। हालांकि आरोपी ने 15 लाख रुपये का चेक सौंप दिया था, लेकिन पीड़िता द्वारा समझौते पर हस्ताक्षर न करने के कारण चेक का भुगतान रुकवा दिया गया। पीड़िता ने बाद में चेक आयोग को वापस कर दिया और 20 दिसंबर 2022 को एफआईआर दर्ज कराई। रायपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफटीसी) ने 24 जून 2025 को आरोपी को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ पीड़िता ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों की अनदेखी की है। उन्होंने दलील दी कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह सफल रहा है कि शादी के झूठे वादे के झांसे में रखकर आरोपी ने बार-बार शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी से मुकर गया, जो बलात्कार की श्रेणी में आता है।

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दूसरी ओर, आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि पीड़िता एक उच्च शिक्षित महिला है जो तीन साल से अधिक समय तक इस रिश्ते में थी और उसने कभी किसी को इसके बारे में नहीं बताया। उन्होंने कहा कि यह रिश्ता पूरी तरह से आपसी सहमति पर आधारित था और लंबे समय के लिव-इन संबंधों में सहमति का स्वतः ही कानूनी अनुमान लगाया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि बरी किए जाने का आदेश आरोपी की बेगुनाही को और मजबूत करता है, जिसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि वह पूरी तरह से अवैध न साबित हो। वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश डिप्टी एडवोकेट जनरल ने अपीलकर्ता की दलीलों का समर्थन किया।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए रेखांकित किया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र लगभग 40 वर्ष थी और वह अपने निर्णयों तथा शारीरिक संबंधों के परिणामों को अच्छी तरह समझती थी। बेंच ने पाया कि दोनों पक्ष करीब दो साल तक लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे, जो यह दर्शाता है कि यह रिश्ता आपसी सहमति से बना एक लंबा संबंध था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि महिला आयोग में समझौता टूटने के बाद इस विवाद ने एक तरह से वित्तीय विवाद का रूप ले लिया था।

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इसके अलावा, अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों को भी मेडिकल साक्ष्यों से समर्थन नहीं मिला। मेडिकल जांच करने वाली डॉक्टर ने अपनी गवाही में स्वीकार किया कि पीड़िता ने जांच के दौरान जबरन या अप्राकृतिक शारीरिक संबंध की कोई शिकायत नहीं की थी और न ही शरीर पर चोट के कोई निशान पाए गए थे।

हाईकोर्ट ने अपनी कानूनी व्याख्या को सुदृढ़ करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले रविश सिंह राणा बनाम उत्तराखंड राज्य एवं अन्य का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उद्धृत करते हुए बेंच ने कहा:

“वर्तमान मामले में भी, हम पाते हैं कि अपीलकर्ता और प्रतिवादी (शिकायतकर्ता) के बीच का रिश्ता दो साल से अधिक समय तक रहा। इसके अलावा, वे न केवल आपस में शारीरिक संबंध होने की बात स्वीकार करते हैं, बल्कि किराए के मकान में लिव-इन पार्टनर के रूप में साथ रहने की बात भी मानते हैं। हमारा मानना है कि यदि दो मानसिक रूप से सक्षम वयस्क दो साल से अधिक समय तक लिव-इन कपल के रूप में साथ रहते हैं और सहवास करते हैं, तो यह कानूनी अनुमान पैदा होता है कि उन्होंने परिणामों को पूरी तरह समझते हुए स्वेच्छा से इस रिश्ते को चुना था। इसलिए, यह आरोप कि ऐसा रिश्ता केवल शादी के वादे के कारण शुरू हुआ था, इन परिस्थितियों में स्वीकार करने योग्य नहीं है, विशेषकर तब जब ऐसा कोई आरोप न हो कि यदि शादी का वादा न होता तो यह शारीरिक संबंध स्थापित नहीं होते।”

सुप्रीम कोर्ट की आधुनिक लिव-इन रिलेशनशिप और मौन सहमति से जुड़ी टिप्पणियों को आगे उद्धृत करते हुए कोर्ट ने कहा:

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“इसके अलावा, लंबे समय तक चलने वाले लिव-इन रिलेशनशिप में ऐसे अवसर आ सकते हैं जहां दोनों पक्ष शादी के जरिए अपने रिश्ते को औपचारिक रूप देने की इच्छा व्यक्त करें, लेकिन केवल शादी की इच्छा व्यक्त करना ही यह साबित नहीं करता कि पूरा रिश्ता उसी इच्छा का परिणाम था… इसलिए, जब इस तरह का कोई मामला कोर्ट के सामने आता है, तो कोर्ट को संकीर्ण या रूढ़िवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। इसके विपरीत, कोर्ट को रिश्ते की अवधि और पक्षों के आचरण के आधार पर उनकी मौन सहमति मान लेनी चाहिए, चाहे वे उसे वैवाहिक बंधन में बदलना चाहते हों या नहीं।”

इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता और आरोपी के बीच लंबे समय तक चले लिव-इन संबंध के कारण आपसी सहमति का कानूनी अनुमान लागू होता है।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने अपने फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या विसंगति नहीं की है। चूंकि शारीरिक संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने थे, इसलिए केवल शादी से बाद में इनकार करने के आधार पर आरोपी को बलात्कार के अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के बरी करने के फैसले को बरकरार रखा और अपील को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एक्सवाईजेड बनाम सिद्धार्थ सारंगी और अन्य
वाद संख्या: एसीक्यूए संख्या 380/2025
पीठ: जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास
निर्णय की तिथि: 29.06.2026

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