क्या बालिग महिलाओं के अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करने पर पारिवारिक असहमति या लंबित आपराधिक जांच के आधार पर उन्हें घर में कैद करके रखा जा सकता है? इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर निर्णय देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने दो बालिग बहनों की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने दोनों बहनों को अपनी मर्जी से किसी भी स्थान पर रहने और अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र घोषित किया है। बालिग बेटियों को अवैध रूप से कैद में रखने और उनके मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन करने के लिए हाईकोर्ट ने उनके पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये का संवैधानिक मुआवजा देने का आदेश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कुंवर सुल्तान अली और अन्य द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है, जिसमें दोनों बहनों को अदालत के सामने पेश करने और उनकी स्वतंत्रता की मांग की गई थी। हाईकोर्ट के 30 जुलाई 2026 के आदेश के अनुपालन में साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन, आगरा के अधिकारियों द्वारा दोनों महिलाओं को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
अदालत ने दोनों बहनों से व्यक्तिगत रूप से बातचीत कर उनके विचार जाने। बड़ी बहन (उम्र लगभग 35 वर्ष), जो प्राणीशास्त्र (जूलॉजी) में एम.एससी. और एम.फिल. के साथ बी.एड. डिग्री धारक हैं और प्रवक्ता (लेक्चरर) के रूप में कार्य कर चुकी हैं, ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने वर्ष 2020 में मानसिक शांति, आध्यात्मिक संतोष और आत्मिक सुकून के लिए अपनी स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका यह फैसला किसी दबाव, प्रलोभन या अनुचित प्रभाव में नहीं लिया गया था। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने उनके इस फैसले का कड़ा विरोध किया और उन्हें घर में जबरन कैद कर दिया, जहां उन पर हिंदू धर्म में वापस लौटने के लिए शारीरिक व मानसिक दबाव बनाया गया। इसके अलावा, उनके पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाण पत्र, पहचान पत्र, बैंक पासबुक और धर्म परिवर्तन से संबंधित दस्तावेज भी उनके पिता ने अपने कब्जे में रख लिए।
वहीं, लगभग 20 वर्ष की छोटी बहन, जो इंटरमीडिएट तक शिक्षित हैं, ने भी बताया कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत आस्था और अंतरात्मा की आवाज पर वर्ष 2021 में स्वेच्छा से इस्लाम अपनाया था। पिता के विरोध के कारण उन्हें भी घर के भीतर अवैध रूप से बंद कर दिया गया और स्वतंत्रता से वंचित रखा गया। दोनों बहनों ने अदालत के समक्ष कहा कि अपनी पसंद का धर्म चुनना संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 के तहत उनका मौलिक अधिकार है और वे तुरंत अपनी आजादी चाहती हैं।
पक्षों की दलीलें
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल और अपर शासकीय अधिवक्ता पंकज सक्सेना ने याचिका की ग्राह्यता (मेंटेनेबिलिटी) पर कड़ा एतराज जताया। राज्य सरकार की दलील थी कि लड़कियों के पिता ने आगरा के सदर बाजार थाने में केस क्राइम संख्या 228/2025 दर्ज कराया था, जिसमें धोखे और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया गया था। शुरुआत में यह मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 87 के तहत दर्ज हुआ था, लेकिन जांच के दौरान इसमें बीएनएस की अन्य गंभीर धाराएं और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धाराएं भी जोड़ दी गईं।
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह धर्म परिवर्तन केवल व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता, अखंडता और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने की एक संगठित साजिश का हिस्सा है, जिसमें विदेशी संस्थाओं की संलिप्तता का भी संदेह है। सरकार का कहना था कि अनुच्छेद 21 और 25 के तहत मिलने वाले अधिकार असीमित नहीं हैं और यदि महिलाओं को रिहा किया गया तो जारी आपराधिक जांच प्रभावित हो सकती है।
इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं के वकील अली बिन सैफ और उनके सहयोगियों ने तर्क दिया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र केवल हिरासत की वैधता की जांच करने तक सीमित है। दोनों बहनें बालिग हैं और अपने जीवन, धर्म और निवास का फैसला लेने के लिए कानूनन पूरी तरह सक्षम हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे का दावा केवल आशंकाओं पर आधारित है और किसी तीसरे पक्ष के खिलाफ लंबित आपराधिक जांच के आधार पर पीड़ितों को ही अवैध हिरासत में नहीं रखा जा सकता। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मामलों राजेंद्र बिहारी लाल एवं अन्य बनाम यूपी राज्य (2025) और शफीन जहां बनाम असोकन के.एम. (2018) का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें
अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दायरे को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट के होम सेक्रेटरी (प्रिजन) बनाम एच. निलोफर निशा (2020) फैसले का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि यह रिट किसी नागरिक को राज्य या निजी पक्षकार द्वारा की गई अवैध हिरासत से मुक्ति दिलाने का एक संवैधानिक माध्यम है।
बालिग व्यक्ति की स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर जोर देते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ द्वारा दिए गए निर्णय सोनी गेरी बनाम गेरी डगलस (2018) को उद्धृत किया, जिसे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उर्मिला झारिया बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) में भी दोहराया था। अदालत ने इस सिद्धांत पर बल दिया:
“यह बताने के लिए किसी विशेष जोर की आवश्यकता नहीं है कि किसी व्यक्ति के जीवन में बालिग होने की आयु प्राप्त करने का अपना महत्व होता है। उसे अपनी पसंद का चयन करने का पूरा अधिकार है। जब तक यह पसंद बनी रहती है, अदालतें ‘पैरेंस पैट्री’ (अभिभावक) की भूमिका नहीं निभा सकतीं। बेटी कानून के अनुसार अपनी स्वतंत्रता का आनंद लेने की हकदार है और अदालत को माता की किसी भी भावना या पिता के अहंकार से संचालित होकर ‘सुपर गार्जियन’ की भूमिका नहीं अपनानी चाहिए। हम यह बिना किसी हिचकिचाहट के कहते हैं।”
अदालत ने केरल हाईकोर्ट के राजामोहन एम.एस. बनाम केरल राज्य (2009) फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि बालिग बेटी पर पितृसत्तात्मक अधिकार के नाम पर जबरन नियंत्रण नहीं रखा जा सकता:
“किसी बालिग महिला को उसकी इच्छा, आकांक्षा और मर्जी के खिलाफ किसी अन्य की ‘हिरासत’ में रखे जाने का सवाल ही नहीं उठता। भले ही वे माता-पिता हों, लेकिन बेहतर कारणों के अभाव में ऐसी हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता… एक बालिग महिला कोई वस्तु (चैटल) नहीं है। यह सिद्धांत कि विवाह होने तक महिला को अपने पिता की हिरासत और कैद में रहना चाहिए और उसके बाद पति की हिरासत में, इस दौर में स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
इसके अलावा, कोर्ट ने जोजू जॉर्ज बनाम केरल राज्य (2026) मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कानू सान्याल, सोमप्रभा राणा, नवतेज सिंह जोहर, के.एस. पुट्टास्वामी और कॉमन कॉज जैसे सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों के हवाले से कहा गया कि निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही मानव गरिमा का मूल आधार है।
जस्टिस संदीप जैन ने टिप्पणी की कि धर्म परिवर्तन अधिनियम, 2021 के प्रावधानों का पालन हुआ है या नहीं, यह विषय अलग कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है और इसके आधार पर किसी बालिग महिला को घर में कैद करके रखने को सही नहीं ठहराया जा सकता। राज्य सरकार के संप्रभुता संबंधी तर्कों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ठोस साक्ष्यों के बिना केवल आशंकाओं के आधार पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
माता-पिता के अधिकारों की सीमा तय करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“संवैधानिक अधिकारों को माता-पिता के अधिकार, सामाजिक नैतिकता या बहुसंख्यकवादी भावनाओं के नाम पर दबाया नहीं जा सकता। किसी बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता अनुल्लंघनीय है, और बल या दबाव के माध्यम से उस स्वतंत्रता को दबाने का कोई भी प्रयास इस अदालत की संवैधानिक जांच के दायरे में आता है तथा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए वित्तीय मुआवजे सहित उचित सार्वजनिक कानून परिणाम आकर्षित करता है।”
सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजा देने के अधिकार पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसलों रुदुल साह बनाम बिहार राज्य (1983) और नीलाबती बहेरा बनाम उड़ीसा राज्य (1993) पर भरोसा जताया। कोर्ट ने माना कि बेटियों को अवैध हिरासत में रखने के लिए पिता और इस पर आंखें मूंदने व मूकदर्शक बने रहने के लिए राज्य तंत्र, दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं।
कोर्ट का निर्णय और जारी निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित प्रमुख निर्देश जारी किए:
- दोनों बहनों को उनकी इच्छा के अनुसार किसी भी स्थान पर रहने और किसी भी व्यक्ति के साथ निवास करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र घोषित किया गया। उनके इस अधिकार में पिता, राज्य या पुलिस प्रशासन द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
- दोनों बहनों के मौलिक अधिकारों का हनन करने के लिए पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25,00,000 रुपये (पच्चीस लाख रुपये) का मुआवजा देने का आदेश दिया गया, जिसे आठ सप्ताह के भीतर दोनों बहनों में बराबर-बराबर बांटा जाएगा। राज्य सरकार को यह छूट दी गई कि वह इस राशि का भुगतान करने के बाद 50% राशि पिता से और शेष 50% राशि दोषी अधिकारियों से वसूल कर सकती है।
- पिता को निर्देश दिया गया कि वे बेटियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आवाजाही, निवास, पेशे या धार्मिक विकल्पों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई बाधा न डालें।
- पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे दोनों बहनों के शांतिपूर्ण जीवन में कोई बाधा न आने दें और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करें।
- पिता को सात दिनों के भीतर दोनों बहनों के मूल दस्तावेज (जैसे पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाण पत्र, पहचान पत्र, बैंक पासबुक और धर्म परिवर्तन संबंधी दस्तावेज) उन्हें लौटाने का आदेश दिया गया।
हाईकोर्ट ने अंत में यह स्पष्ट किया कि इस निर्णय में दी गई टिप्पणियां केवल अवैध हिरासत के मुद्दे तक सीमित हैं और इनका लंबित आपराधिक मामले की जांच या धर्म परिवर्तन की वैधानिकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कुंवर सुल्तान अली और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य
वाद संख्या: बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 1079 / 2026
पीठ: जस्टिस संदीप जैन
निर्णय की तिथि: 6 अगस्त 2026

