राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी बीमारी या कैंसर का देर से पता चलना अपने आप में चिकित्सीय लापरवाही (मेडिकल नेगलिजेंस) का आधार नहीं बन सकता। आयोग ने 54 वर्षीय कैंसर पीड़ित की मृत्यु के मामले में निजी अस्पताल और उसके डॉक्टर के खिलाफ लापरवाही के पूर्व आदेश को खारिज कर दिया है। हालांकि, राष्ट्रीय आयोग ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए निर्देश दिया कि अस्पताल द्वारा पूर्व में जमा कराई गई 5 लाख रुपये की राशि पीड़ित परिवार को इलाज के खर्च की भरपाई हेतु अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया) के रूप में ब्याज सहित प्रदान की जाए।
राज्य आयोग का फैसला निरस्त, डॉक्टर की पेनल्टी होगी वापस
पीठासीन सदस्य एवीएम जे. राजेंद्र और सदस्य जस्टिस अनूप कुमार मेंदीरत्ता की पीठ दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के 16 फरवरी 2018 के आदेश के खिलाफ अस्पताल और चिकित्सक द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। राज्य आयोग ने अस्पताल और डॉक्टर दोनों को लापरवाही का दोषी ठहराया था। पूर्व आदेश में अस्पताल को 20 लाख रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया था (जिसमें से 5 लाख रुपये शिकायतकर्ता परिवार को दिए जाने थे) और डॉक्टर पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
राष्ट्रीय आयोग ने लापरवाही का निष्कर्ष रद्द करते हुए निर्देश दिया कि डॉक्टर द्वारा जमा की गई 2 लाख रुपये की राशि 30 दिनों के भीतर उन्हें वापस लौटा दी जाए।
लापरवाही तय करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी: आयोग
पीठ ने 21 सितंबर को जारी अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए चिकित्सकीय लापरवाही नहीं मानी जा सकती क्योंकि मरीज में बाद में कैंसर का पता चला। आयोग ने कहा कि लापरवाही साबित करने के लिए यह स्थापित करना अनिवार्य है कि दिया गया उपचार स्थापित मेडिकल मानकों के अनुरूप नहीं था, या डॉक्टर ने उस स्थिति में अपेक्षित सामान्य सतर्कता और कौशल का इस्तेमाल नहीं किया।
पीठ दर्द से शुरू हुआ इलाज और बायोप्सी का विवाद
यह विवाद सितंबर 2005 में शुरू हुआ था, जब जसवानी नामक 54 वर्षीय व्यक्ति ने गंभीर पीठ दर्द की शिकायत की। 9 सितंबर 2005 को एक अन्य निजी अस्पताल में हुए एमआरआई में टीबी के लक्षण दिखाई दिए। इसके बाद संबंधित डॉक्टर ने रीढ़ की हड्डी के एल2-एल3 हिस्से में ट्यूबरकुलोसिस (टीबी), लेफ्ट सोआस एब्सेस और डायबिटीज की पहचान की।
मरीज को 11 सितंबर 2005 को अस्पताल में भर्ती कर अगले दिन 12 सितंबर को डीब्राइडमेंट सर्जरी की गई और ऊतक (टिशू) जांच के लिए बाहरी लैब भेजे गए। 16 सितंबर को मरीज को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। परिजनों का आरोप था कि इसके बाद मरीज की स्थिति लगातार खराब होती गई।
27 दिसंबर को, जब मुख्य उपचार करने वाले डॉक्टर मौजूद नहीं थे, अस्पताल के अन्य चिकित्सक डॉ. कपूर ने मरीज की जांच की और लंबित हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट मंगवाई। रिपोर्ट में अनडिफरेंशिएटेड मैलिग्नेंट ट्यूमर की पुष्टि हुई, जिसमें मैलिग्नेंट फाइब्रस हिस्टियोसाइटोमा, लिपोसारकोमा और लिम्फोमा की संभावना जताई गई थी। इसके बाद मरीज को ऑन्कोलॉजिस्ट के पास भेजा गया और 3 जनवरी 2006 को दिल्ली एम्स में भी दिखाया गया। 23 जून 2006 को मरीज की मृत्यु हो गई।
समन्वय की कमी को लापरवाही नहीं माना जा सकता
मृतक के परिजनों ने आरोप लगाया कि अस्पताल और डॉक्टर ने समय रहते बायोप्सी रिपोर्ट की समीक्षा नहीं की, जिससे कैंसर के इलाज में जानलेवा देरी हुई। दूसरी ओर, अस्पताल और डॉक्टर का पक्ष था कि बाहरी डायग्नोस्टिक सेंटर से आई रिपोर्ट को पूर्व के फॉलो-अप चेकअप के दौरान डॉक्टरों के सामने पेश ही नहीं किया गया था।
आयोग ने पाया कि इस बात का कोई रिकॉर्ड या प्रमाण नहीं है कि यह रिपोर्ट मरीज या परिजनों ने कब प्राप्त की और क्या 27 दिसंबर से पहले इसे डॉक्टर को दिखाया गया था। राष्ट्रीय आयोग ने प्रारंभिक टीबी उपचार को चिकित्सकीय रूप से सही ठहराया क्योंकि एमआरआई में टीबी के लक्षण थे और पुष्टि के लिए बायोप्सी भी कराई गई थी। इसके अतिरिक्त, दिल्ली मेडिकल काउंसिल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए आयोग ने दर्ज किया कि ट्यूमर अत्यधिक आक्रामक (हाईली मैलिग्नेंट) था और इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले कि यदि कैंसर का इलाज पहले शुरू हो जाता तो परिणाम बदल सकता था।
आयोग ने माना कि अस्पताल और आउटसोर्स जांच केंद्र के बीच रिपोर्ट के आदान-प्रदान में समन्वय की कमी जरूर रही, लेकिन प्रशासनिक खामियों को चिकित्सीय लापरवाही की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। पीठ ने कहा कि जहां अस्पतालों को महत्वपूर्ण जांच रिपोर्ट को ट्रैक करने की स्पष्ट व्यवस्था बनानी चाहिए, वहीं मरीजों का भी यह दायित्व है कि वे पेंडिंग जांच रिपोर्ट एकत्र कर अगली मुलाकात में डॉक्टर के सामने प्रस्तुत करें।

