दिल्ली हाईकोर्ट ने जापान में आयोजित 20वें एशियाई खेलों में भारतीय जिउ-जित्सु एथलीट को भेजने का निर्देश देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि खिलाड़ियों के चयन और भागीदारी का निर्णय पूरी तरह खेल विशेषज्ञों और संबंधित खेल निकायों के अधिकार क्षेत्र में आता है, और अदालतें उनके फैसलों की जगह अपना निर्णय नहीं थोप सकतीं।
जस्टिस अमित महाजन ने 23 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए कहा कि जब केंद्र सरकार किसी खेल विशेष में कोई भी दल न भेजने का नीतिगत फैसला ले चुकी है, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त असाधारण शक्तियों का प्रयोग करके सरकार को दल भेजने का आदेश नहीं दिया जा सकता। इसके अतिरिक्त, पीठ ने रेखांकित किया कि 19 सितंबर से जापान के आइची-नागोया में एशियाई खेल शुरू हो चुके हैं और यह आयोजन 4 अक्टूबर तक चलेगा। प्रतियोगिता शुरू हो जाने के कारण इस स्तर पर याचिकाकर्ता को कोई व्यावहारिक या प्रभावी राहत प्रदान करना संभव नहीं है।
14 मई की तय समय-सीमा और सरकार का रुख
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के स्थायी वकील सिद्धार्थ शंकर रे और अधिवक्ता सोनाली मोदी ने अदालत को अवगत कराया कि सरकार ने एशियाई खेलों की जिउ-जित्सु स्पर्धा में भारत की ओर से कोई भी दल अथवा खिलाड़ी न भेजने का स्पष्ट निर्णय लिया है।
पीठ ने प्रशासनिक देरी का संज्ञान लेते हुए यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता खिलाड़ी का नाम तय कट-ऑफ तारीख 14 मई से पहले भेजा ही नहीं गया था।
याचिकाकर्ता एथलीट की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता पाठक राकेश कौशिक ने दलील दी थी कि उनका मुवक्किल सभी तय पात्रता मानकों को पूरा करता है। राष्ट्रीय जिउ-जित्सु एसोसिएशन द्वारा उसका नाम आगे बढ़ाने के बावजूद खेल अधिकारियों ने उसकी उम्मीदवारी पर आगे की प्रक्रिया पूरी नहीं की, जिससे वह इन खेलों में शामिल होने से वंचित रह गया।
अन्य खेलों से समानता का तर्क खारिज
याचिकाकर्ता ने भेदभाव का आरोप लगाते हुए यह तर्क भी प्रस्तुत किया कि किसी अन्य खेल विधा के 57 किलोग्राम भार वर्ग में ऐसे प्रतिभागियों को भेजा गया है जो निर्धारित योग्यता पूरी नहीं करते थे।
जस्टिस महाजन ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि किसी अन्य खेल विधा के चयन का हवाला देकर याचिकाकर्ता अपने पक्ष को कानूनी तौर पर मजबूत नहीं कर सकता। खेल विशेषज्ञों द्वारा वस्तुनिष्ठ आधार पर लिए गए प्रशासनिक फैसलों में न्यायिक हस्तक्षेप को अनुचित मानते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

