गंभीर बीमारी क्लेम खारिज करने पर इंश्योरेंस कंपनी पर 50 लाख का जुर्माना, उपभोक्ता आयोग का आदेश

हरियाणा के फतेहाबाद जिला उपभोक्ता आयोग ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सिग्ना टीटीके हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी को मृतक पॉलिसीधारक की पत्नी को 50 लाख रुपये का क्लेम भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने बीमा कंपनी द्वारा गंभीर बीमारी (क्रिटिकल इलनेस) का क्लेम खारिज किए जाने को सेवा में गंभीर लापरवाही और कमी माना। इसके साथ ही, उपभोक्ता आयोग ने पीड़िता को हुई मानसिक प्रताड़ना, वित्तीय नुकसान और कानूनी लड़ाई के खर्च के एवज में 20,000 रुपये का अतिरिक्त भुगतान करने का निर्देश भी दिया।

अध्यक्ष गुलाब सिंह और सदस्य ओ. पी. टुटेजा की पीठ ने 6 अगस्त को यह फैसला सुनाते हुए कहा कि कंपनी की ओर से समय पर भुगतान न किए जाने से दावेदार को भारी आर्थिक नुकसान और मानसिक कष्ट सहना पड़ा।

लापरवाही और सेवा में गंभीर कमी

मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि कंपनी ने क्लेम प्रक्रिया को बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीके से निपटाया। पॉलिसीधारक का निधन 25 नवंबर 2021 को हो गया था, जबकि कंपनी के आंतरिक दस्तावेजों में क्लेम खारिज करने की तारीख 30 दिसंबर 2021 दर्ज थी। पीठ ने टिप्पणी की कि व्यक्ति की मौत के एक महीने बाद इस तरह क्लेम खारिज करना कंपनी की लापरवाही और तथ्यों की जांच न करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो अपने आप में सेवा की बड़ी कमी है।

इसके अलावा, मृतक की पत्नी सुमन द्वारा 6 सितंबर 2022 को भेजे गए कानूनी नोटिस का भी बीमा कंपनी ने कोई जवाब नहीं दिया और ना ही राशि का भुगतान किया।

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इलाज, मृत्यु और क्लेम से जुड़ा पूरा मामला

यह मामला ‘लाइफस्टाइल प्रोटेक्शन-क्रिटिकल केयर बेसिक’ नाम की बीमा पॉलिसी से जुड़ा है, जिसे 27 सितंबर 2018 से 26 सितंबर 2019 तक की अवधि के लिए खरीदा गया था। इस पॉलिसी के तहत गंभीर बीमारी के लिए 50 लाख रुपये का बीमा कवर तय था।

पॉलिसी की अवधि के दौरान, बीमित व्यक्ति को दिल की बीमारी के कारण 24 नवंबर 2020 से 28 नवंबर 2020 तक भूना (फतेहाबाद) स्थित पारस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही मेडिकल क्लेम दाखिल किया था, जिसे बीमा कंपनी ने 5 नवंबर 2021 को निरस्त कर दिया। इसके ठीक 20 दिन बाद, 25 नवंबर 2021 को दिल की बीमारी से उनका निधन हो गया। पति की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी सुमन ने कानूनी तौर पर दावे को आगे बढ़ाया, क्योंकि दिल की बीमारी पॉलिसी के क्रिटिकल इलनेस कवर के तहत आती थी।

कंपनी के तर्कों को आयोग ने किया खारिज

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बीमा कंपनी ने अपना बचाव करते हुए तर्क दिया कि क्लेम फर्जी और फर्जीवाड़े के आधार पर तैयार किया गया था। कंपनी का कहना था कि मरीज ने ‘मायोकार्डियल इंफार्क्शन’ (पहला गंभीर हार्ट अटैक) के निर्धारित मेडिकल मापदंडों को पूरा नहीं किया और अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड में कई विसंगतियां थीं। साथ ही, कंपनी ने दावा किया कि शिकायतकर्ता ने मुख्य तथ्य छिपाए हैं।

हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने कंपनी की इन दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि मरीज या उनके परिजनों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे अस्पताल के रिकॉर्ड को बनाए रखें। यदि अस्पताल के कागजातों में कोई प्रशासनिक कमी है, तो उसका दोष मरीज पर नहीं मढ़ा जा सकता। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि बीमा कंपनी ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो सके कि मृतक की मृत्यु क्रिटिकल इलनेस से नहीं हुई थी या उन्हें पॉलिसी लेने से पहले से कोई बीमारी थी।

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