साक्ष्यों की कड़ियाँ टूटीं और एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन कमजोर: 1980 के हत्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1980 के एक हत्या के मामले में आरोपी की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों के आधार पर साक्ष्यों की एक अटूट और निर्णयात्मक कड़ी स्थापित करने में विफल रहा है। जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस देवेंद्र सिंह-I की खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) दिया। कोर्ट ने पाया कि घरेलू सहायक की हत्या की कहानी में अभियोजन पक्ष के दावों के बीच कई गंभीर कमियां थीं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 16 सितंबर 1980 को मुरादाबाद में डॉ. अमित रस्तोगी द्वारा दर्ज कराई गई एक एफआईआर से शुरू हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, डॉ. रस्तोगी के आवास पर तीन नौकर—दन्ना उर्फ रमेश, बाराती (अपीलकर्ता) और सोहन (मृतक)—काम करते थे। 14/15 सितंबर 1980 की रात को नौकरों के कमरे से “बाबूजी बचाओ” की चीखें सुनाई दीं। पूछने पर दन्ना और बाराती ने कहा कि उन्होंने कुछ नहीं सुना और सोहन सो रहा है।

अगली सुबह, बाराती ने मालिक को बताया कि सोहन और दन्ना गांव चले गए हैं। हालांकि, जब बाराती अपने कमरे में जाने के बजाय बार-बार कोयला कक्ष (coal room) जाने लगा, तो संदेह पैदा हुआ। 16 सितंबर की रात को दन्ना वापस आया और पूछताछ के दौरान उसने कथित तौर पर जुए के विवाद में सोहन की हत्या करने की बात स्वीकार की। उसने कोयला कक्ष में रखे एक बोरे की ओर इशारा किया, जिसमें सोहन का शव मिला। इसके बाद बाराती को गिरफ्तार किया गया और उसके पास से कथित तौर पर हत्या में इस्तेमाल किया गया लोहे का हथियार बरामद हुआ।

3 सितंबर 1985 को ट्रायल कोर्ट ने दन्ना और बाराती दोनों को आईपीसी की धारा 302/34 और 201 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दन्ना की मृत्यु के बाद 2018 में उसके खिलाफ अपील समाप्त कर दी गई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि पूरा मामला परिस्थितियों पर आधारित साक्ष्यों (circumstantial evidence) पर टिका है और इस मामले में साक्ष्यों की कड़ी कई महत्वपूर्ण स्थानों पर टूटी हुई है। यह तर्क दिया गया कि कथित ‘एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन’ (अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति) अत्यधिक संदिग्ध है क्योंकि यह ‘रुचि रखने वाले गवाहों’ (मालिकों और उनके पड़ोसियों) के सामने की गई थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि कोयला कक्ष घर के सभी सदस्यों के लिए सुलभ था, इसलिए वहां से शव की बरामदगी को विशेष रूप से आरोपी से नहीं जोड़ा जा सकता।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मदद के लिए चीखें, मृतक का अचानक गायब होना, आरोपी का इकबालिया बयान और बरामदगी एक अटूट कड़ी बनाते हैं जो केवल आरोपियों के अपराध की ओर इशारा करती है।

कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने परिस्थितियों पर आधारित साक्ष्यों से जुड़े सिद्धांतों का विश्लेषण करते हुए शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के पांच स्वर्ण सिद्धांतों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा:

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“यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में, अभियोजन को परिस्थितियों की एक ऐसी पूरी श्रृंखला स्थापित करनी चाहिए जो केवल आरोपी के अपराध के साथ मेल खाती हो और किसी अन्य संभावना के साथ असंगत हो।”

अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति (confession) पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा कि ऐसे साक्ष्य स्वाभाविक रूप से कमजोर होते हैं और इन्हें ठोस समर्थन की आवश्यकता होती है। कोर्ट ने पाया कि गवाह स्वतंत्र नहीं थे और स्वीकारोक्ति “संदिग्ध और अस्वाभाविक” प्रतीत होती है।

शव की बरामदगी पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

“यह स्वीकार किया गया है कि उक्त स्थान (कोयला कक्ष) शिकायतकर्ता के परिसर के भीतर स्थित था और घर के सभी सदस्यों के लिए सुलभ था। इस प्रकार, बरामदगी को विशेष रूप से आरोपी के कहने पर नहीं माना जा सकता ताकि उसे अपराध से निर्णायक रूप से जोड़ा जा सके।”

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि हत्या के हथियार की बरामदगी के लिए किसी स्वतंत्र गवाह की गवाही नहीं ली गई और हथियार को अपराध से जोड़ने वाली कोई फोरेंसिक रिपोर्ट भी नहीं थी। इसके अलावा, जुए के मामूली विवाद को इतनी जघन्य हत्या के लिए पर्याप्त कारण नहीं माना गया।

जितेंद्र कुमार मिश्रा @जित्तू बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने जोर दिया कि यदि साक्ष्यों के आधार पर कोई दूसरी संभावना (Plausible view) बनती है, तो अपीलीय अदालत को आरोपी को संदेह का लाभ देने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपना मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

“परिणामस्वरूप, इस न्यायालय की यह सुविचारित राय है कि अभियोजन पक्ष आरोपी-अपीलकर्ता के विरुद्ध अपना मामला संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है।”

तदनुसार, हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 1985 के फैसले को रद्द कर दिया और आरोपी बाराती को सभी आरोपों से बरी कर दिया। चूंकि वह पहले से ही जमानत पर था, इसलिए उसके बेल बांड रद्द कर दिए गए और जमानतदारों को मुक्त कर दिया गया।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: दन्ना उर्फ रमेश और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2509 ऑफ 1985
  • पीठ: जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस देवेंद्र सिंह-I
  • तारीख: 10 अप्रैल, 2026

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