गोवा की पोंडा विधानसभा सीट पर उपचुनाव रद्द होने के खिलाफ कांग्रेस ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

गोवा में पोंडा विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को रद्द करने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को कांग्रेस पार्टी ने अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. केतन भाटीकर की ओर से दायर इस विशेष अनुमति याचिका (SLP) में हाईकोर्ट के उस फैसले को पलटने की मांग की गई है, जिसने मतदान से महज 16 घंटे पहले चुनाव आयोग की अधिसूचना को निरस्त कर दिया था।

तटीय राज्य गोवा में इस कानूनी विवाद ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है, क्योंकि मतदान के लिए पूरी तैयारी हो चुकी थी, लेकिन विधानसभा के कार्यकाल की तकनीकी गणना के आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ऐन वक्त पर रोक दिया गया।

पोंडा विधानसभा क्षेत्र के मौजूदा भाजपा विधायक रवि नाइक का 15 अक्टूबर, 2025 को निधन हो गया था, जिसके बाद यह सीट खाली हो गई थी। इस रिक्त पद को भरने के लिए भारत निर्वाचन आयोग ने 9 अप्रैल, 2026 को उपचुनाव कराने की घोषणा की थी।

हालांकि, मतदान शुरू होने से ठीक पहले 8 अप्रैल को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने चुनाव की अधिसूचना को रद्द कर दिया। कोर्ट ने क्षेत्र के दो पंजीकृत मतदाताओं द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चूंकि वर्तमान गोवा विधानसभा का कार्यकाल 14 मार्च, 2027 को समाप्त हो रहा है, इसलिए उपचुनाव कराना जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार किया कि यदि 4 मई को परिणाम घोषित होते, तो जीतने वाले उम्मीदवार को विधायक के रूप में केवल नौ महीने का समय मिलता। कानूनी प्रावधानों के अनुसार, यदि कार्यकाल एक वर्ष से कम बचा हो, तो उपचुनाव अनिवार्य नहीं होता।

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चुनाव रद्द होने के बाद गोवा की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य गिरीश चोडणकर ने आरोप लगाया कि चुनाव हारने के डर से सत्ताधारी भाजपा ने संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर उपचुनाव रुकवा दिया।

चोडणकर ने ‘एक्स’ पर अपनी पोस्ट में कहा, “पोंडा की जनता अपना विधायक चुनने का अधिकार रखती थी। प्रचार खत्म हो चुका था, मतपत्र जारी हो गए थे और उम्मीदवार तैयार थे, लेकिन वोटिंग से सिर्फ 16 घंटे पहले चुनाव रोक दिया गया।”

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कांग्रेस ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ आयोग ने कोई अपील नहीं की, जो लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा ने चुनाव आयोग के साथ मिलकर जानबूझकर अधिसूचना जारी करने में देरी की, ताकि शेष कार्यकाल एक साल से कम रह जाए।

डॉ. केतन भाटीकर द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दलील दी गई है कि जनता के प्रतिनिधित्व के अधिकार को बहाल किया जाना चाहिए। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि चुनाव प्रक्रिया अंतिम चरण में थी और यहां तक कि पोस्टल बैलेट के जरिए मतदान भी शुरू हो चुका था।

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हाईकोर्ट द्वारा अपने फैसले पर स्टे देने से इनकार के बाद पिछले हफ्ते मतदान की सभी गतिविधियां रोक दी गई थीं। अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में इसी सप्ताह सुनवाई होने की संभावना है।

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