लैंड-फॉर-जॉब्स मामला: लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत, FIR रद्द करने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव को ‘लैंड-फॉर-जॉब्स’ घोटाले में राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज की गई एफआईआर (FIR) को रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, 77 वर्षीय पूर्व केंद्रीय मंत्री को उनकी उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए बड़ी प्रक्रियात्मक राहत देते हुए ट्रायल कोर्ट में पेशी से छूट दे दी गई है।

यह मामला साल 2004 से 2009 के बीच का है, जब लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। सीबीआई का आरोप है कि इस दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर में पश्चिम मध्य रेलवे जोन में ग्रुप डी के पदों पर नियुक्तियां की गई थीं। जांच एजेंसी के अनुसार, इन नियुक्तियों के बदले में लालू यादव के परिवार के सदस्यों और करीबियों के नाम पर जमीन के प्लॉट उपहार में दिए गए या हस्तांतरित किए गए थे। इस मामले में सीबीआई पहले ही लालू यादव और उनके परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर चुकी है।

आरजेडी प्रमुख ने दिल्ली हाईकोर्ट के 24 मार्च के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले ही उनकी एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि सीबीआई की कार्रवाई कानूनी रूप से वैध है।

लालू यादव की मुख्य कानूनी दलील भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17A पर आधारित थी। इस प्रावधान के अनुसार, किसी लोक सेवक (Public Servant) द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कथित अपराध की जांच शुरू करने से पहले सक्षम अधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य है। यादव के वकीलों का तर्क था कि चूंकि सीबीआई ने ऐसी कोई पूर्व अनुमति नहीं ली थी, इसलिए पूरी जांच और चार्जशीट कानूनी रूप से आधारहीन है।

इस मामले की सुनवाई जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने की। कोर्ट ने फिलहाल एफआईआर रद्द करने से तो मना कर दिया, लेकिन कानूनी बारीकियों पर बहस के द्वार खुले रखे हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लालू यादव ट्रायल के दौरान धारा 17A की लागू होने की योग्यता (Applicability) का मुद्दा उठा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि बचाव पक्ष अभी भी यह तर्क देने के लिए स्वतंत्र है कि पूर्व अनुमति न होने के कारण अभियोजन का मामला प्रभावित होता है। इसके साथ ही, बेंच ने यादव को ट्रायल कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट दे दी है, जिससे अब उनके वकील उनकी ओर से पेश हो सकेंगे।

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