तेजाब हमला (एसिड अटैक) झेलने वाली पीड़िताओं के पुनर्वास को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के टालमटोल और “असंवेदनशील” रवैये पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य के गृह विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिवों को समन जारी कर आगामी 25 मई, 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रशांत की खंडपीठ ने एक पीड़िता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया। अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि हादसे के नौ साल बीत जाने के बाद भी सरकार के पास पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस और व्यावहारिक नीति नहीं है।
नौ साल का दर्द और सिर्फ छह लाख रुपये की मदद: क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक ऐसी युवती का है जो महज 24 साल की उम्र में तेजाब हमले का शिकार हुई थी। जिंदगी को पूरी तरह तबाह कर देने वाली इस त्रासदी के नौ साल बाद भी सरकार ने पीड़िता की सुध नहीं ली।
न्यायालय ने पाया कि इस पूरे दशक में पीड़िता को कुल मिलाकर केवल ₹6 लाख की सहायता राशि दी गई। इसके अलावा सरकार की तरफ से उसके दीर्घकालिक पुनर्वास के लिए कोई गंभीर कदम नहीं उठाया गया।
अदालत ने 14 मई को दिए अपने आदेश में साफ तौर पर कहा, “राज्य सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ मामूली आर्थिक मुआवजा बांट देने भर से खत्म नहीं हो जाती।”
खंडपीठ के अनुसार, वास्तविक पुनर्वास के दायरे में निम्नलिखित बुनियादी जरूरतें अनिवार्य रूप से आनी चाहिए:
- निरंतर मुफ्त चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक उपचार (काउंसलिंग)
- प्लास्टिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी की सुविधा
- शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार के अवसर
- समाज की मुख्यधारा में दोबारा सम्मान के साथ लौटने के लिए जरूरी सरकारी सुरक्षा और सहयोग
कागजी बैठकों पर भड़का कोर्ट: कहा- ‘गंभीरता की भारी कमी’
राज्य सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे पर टिप्पणी करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि सरकारी दस्तावेजों में केवल विभागों के बीच आपसी बातचीत का ब्योरा है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस योजना नजर नहीं आती।
अदालत ने पाया कि सरकार की फाइलों में न तो किसी नीति का खाका था, न कोई समय सीमा तय की गई थी, और न ही बजट का कोई ढांचा मौजूद था। इस ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रशासन ऐसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दों को बहुत हल्के में ले रहा है।
इससे पहले 16 अप्रैल को हुई सुनवाई के दौरान भी कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था, “हमें यह देखकर बेहद अचरज हो रहा है कि राज्य के अधिकारी तेजाब हमले जैसे गंभीर मामलों को इतनी लापरवाही से ले रहे हैं, जबकि पीड़ित को पूरी जिंदगी इसके भयानक परिणाम भुगतने पड़ते हैं।”
संवैधानिक दायित्व और सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश शासन को उसके संवैधानिक कर्तव्यों की याद दिलाई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों के शरीर की सुरक्षा करना राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी है। सरकार का काम केवल गुनहगारों पर मुकदमा चलाकर खत्म नहीं हो जाता।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि सरकार हर नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने की गारंटी देने के लिए बाध्य है। जघन्य अपराध के शिकार लोगों को गरिमापूर्ण जीवन वापस लौटाना सरकार का ही दायित्व है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘परिवर्तन केंद्र बनाम भारत संघ’ का भी जिक्र किया। देश की शीर्ष अदालत ने सालों पहले व्यवस्था दी थी कि एसिड अटैक के मामलों में मुआवजा सिर्फ तात्कालिक शारीरिक चोटों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसमें पीड़ित की जिंदगी भर की शारीरिक-मानसिक पीड़ा, लगातार होने वाले इलाज का खर्च और सामाजिक-आर्थिक अवसरों के नुकसान को शामिल करना बेहद जरूरी है। इसके बावजूद, उत्तर प्रदेश सरकार अब तक कोई व्यावहारिक नीति नहीं बना पाई है।
25 मई को कोर्ट में पेशी: अधिकारियों को इन 3 सवालों के देने होंगे जवाब
प्रशासनिक स्तर पर हो रही देरी को खत्म करने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीधे तौर पर दोनों विभागों के शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही तय की है। 25 मई, 2026 को पेशी के दौरान प्रमुख सचिवों को निम्नलिखित बिंदुओं पर पूरी तैयारी और स्पष्ट कार्ययोजना के साथ आने को कहा गया है:
- ठोस नीतिगत ढांचा (Policy Framework): तेजाब हमले के शिकार लोगों के दीर्घकालिक इलाज, मुआवजे और पुनर्वास के लिए पूरे राज्य में लागू होने वाली एक स्पष्ट सरकारी नीति।
- सहायता और पुनर्वास तंत्र (Support Mechanisms): पीड़ितों के मुफ्त इलाज, रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, मानसिक परामर्श, पढ़ाई-लिखाई और नौकरी से जुड़े अवसरों को सुनिश्चित करने का व्यावहारिक रोडमैप।
- मुआवजे का तार्किक निर्धारण (Rationalized Compensation): चोट की गंभीरता और पीड़ित के पूरे जीवन पर पड़ने वाले असर का सही आकलन करते हुए मुआवजे की राशि तय करने का एक पारदर्शी पैमाना।

