सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के अमरावती जिले में निर्माणाधीन पिलर गिरने से 12 वर्षीय छात्रा की मौत के मामले में एक आश्रम स्कूल के अध्यक्ष और अधीक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा कि जब निर्माण कार्य ठेकेदार कर रहा था, तो स्कूल अधिकारियों की कथित लापरवाही को छात्रा की मौत का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने 2 नवंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के 25 फरवरी 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 304 के साथ धारा 34 के तहत दर्ज मामले को समाप्त करने से इनकार कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल देखभाल के निर्धारित मानकों का पालन नहीं करने से किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक अपराध स्वतः स्थापित नहीं हो जाता।
स्कूल परिसर में निर्माणाधीन पिलर गिरने से हुई थी मौत
मामला अमरावती जिले के मंगरूल चावला स्थित प्रश्नचिह्न आदिवासी आश्रम शाला का है।
मृतका स्कूल में सातवीं कक्षा की छात्रा थी और छात्रावास में रहती थी।
स्कूल परिसर में सीमेंट और ईंटों से बनाया जा रहा एक पिलर छात्रा और अन्य लड़कियों पर गिर गया। सिर में गंभीर चोट लगने के कारण उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
छात्रा के पिता ने 19 फरवरी 2020 को मंगरूल चावला थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि पिलर का निर्माण लापरवाही से और घटिया सामग्री का इस्तेमाल करके किया गया था।
जांच के बाद स्कूल के अध्यक्ष और अधीक्षक के खिलाफ आईपीसी की धारा 304 के साथ धारा 34 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया।
हाईकोर्ट ने निर्माण में खामियों को माना था पर्याप्त आधार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने केमिकल एनालाइजर की रिपोर्ट और घटनास्थल के पंचनामे के आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया था।
रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण में सीमेंट का निर्धारित अनुपात नहीं रखा गया था। पंचनामे में यह भी दर्ज था कि पिलर के लिए मजबूत आधार नहीं बनाया गया था।
हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री से स्कूल अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्य का उल्लंघन करने का प्रथम दृष्टया आधार मौजूद था।
इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
बचाव पक्ष ने कहा, मौत का प्रत्यक्ष कारण स्कूल अधिकारी नहीं
अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता कुलदीप जौहरी ने दलील दी कि अभियोजन के सभी आरोप सही मान लेने पर भी उनके मुवक्किलों के खिलाफ कोई स्वैच्छिक आपराधिक कृत्य नहीं बनता।
उन्होंने कहा कि आईपीसी की धारा 304 लागू नहीं होती। यहां तक कि धारा 304A के तहत लापरवाही से मृत्यु कारित करने का अपराध भी स्थापित नहीं होता।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए लापरवाही और मृत्यु के बीच प्रत्यक्ष कारण संबंध होना चाहिए।
केवल घटना में योगदान देने वाली परिस्थिति पर्याप्त नहीं है।
महाराष्ट्र सरकार की ओर से अधिवक्ता आदित्य अनिरुद्ध पांडे ने कहा कि कार्यवाही रद्द करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला देखा जाना चाहिए।
राज्य ने तर्क दिया कि कम से कम धारा 304A के तहत अपराध बनता है और कौन-सा अपराध हुआ है, इसका निर्णय ट्रायल कोर्ट को करना चाहिए।
नोटिस मिलने के बावजूद मृतका के पिता सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए।
केवल देखभाल के कर्तव्य का उल्लंघन आपराधिक कृत्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामला किसी व्यक्ति के खिलाफ जानबूझकर किए गए अपराध का नहीं है।
बेंच ने कहा:
“हमारा विचार है कि कानून द्वारा निर्धारित देखभाल के मानक को पूरा करने में मात्र विफलता, जिससे हाईकोर्ट द्वारा बताए गए कर्तव्य का उल्लंघन हुआ हो, आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने माना कि निर्माण कार्य में लापरवाही के लिए प्रथम दृष्टया ठेकेदार जिम्मेदार हो सकता है।
हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि स्कूल अधिकारियों को यह जानकारी थी कि घटिया निर्माण के कारण किसी छात्र की मृत्यु होने की पूरी संभावना है।
बेंच ने कहा:
“हालांकि, केवल इससे यह संकेत नहीं मिलता कि अपीलकर्ताओं को यह जानकारी थी कि घटिया निर्माण से स्कूल में पढ़ने वाले किसी छात्र की मृत्यु होने की पूरी संभावना थी।”
धारा 304A के लिए लापरवाही और मौत में प्रत्यक्ष संबंध जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 304A के तहत जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रत्यक्ष कारण और योगदान देने वाली परिस्थिति के बीच अंतर स्पष्ट किया।
बेंच ने Kurban Hussein Mohamedalli Rangawalla v. State of Maharashtra, Sushil Ansal v. State through CBI और Ambalal D. Bhatt v. State of Gujarat के फैसलों का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि घटना के पीछे कई अन्य परिस्थितियां भी हो सकती थीं।
यदि ठेकेदार ने छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए थोड़ी सावधानी बरती होती, तो संभवतः यह दुर्घटना नहीं होती।
बेंच ने कहा:
“इसलिए वर्तमान अपीलकर्ताओं की कथित लापरवाही को प्रत्यक्ष कारण (causa causans) नहीं माना जा सकता, हालांकि यह एक आवश्यक योगदानकारी परिस्थिति (causa sine qua non) हो सकती है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“इसलिए केवल लापरवाही या उतावलापन किसी मामले को आईपीसी की धारा 304A के दायरे में लाने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि बीच में हस्तक्षेप करने वाले कारण ने स्कूल अधिकारियों की कथित लापरवाही और छात्रा की मृत्यु के बीच प्रत्यक्ष कारण संबंध को तोड़ दिया था।
ठेकेदार प्रथम दृष्टया जिम्मेदार, लेकिन ट्रायल के साक्ष्य निर्णायक होंगे
बेंच ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में छात्रा की मौत के लिए ठेकेदार प्रथम दृष्टया जिम्मेदार प्रतीत होता है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल प्रारंभिक टिप्पणी है। यदि ठेकेदार मामले में आरोपी है, तो उसकी जिम्मेदारी ट्रायल के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर तय होगी।
छात्रा की मृत्यु पर दुख व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“अपने ही स्कूल के पिलर के नीचे दबकर बारह वर्षीय बच्ची की मृत्यु का विचार मात्र हमारे हृदय को पीड़ा और वेदना से भर देता है।”
बेंच ने आगे कहा:
“कानून कितना भी कठोर क्यों न लगे, लेकिन कानून कानून ही रहता है और उसका सम्मान करना आवश्यक है।”
स्कूल अध्यक्ष और अधीक्षक के खिलाफ कार्यवाही रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए स्कूल के अध्यक्ष और अधीक्षक के खिलाफ आरोपपत्र संख्या 15/2020 से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में अन्य सह-आरोपी होने की स्थिति में उनके खिलाफ ट्रायल कानून के अनुसार जारी रह सकता है।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Matin Shankarrao Bhosale & Anr. v. State of Maharashtra & Anr.
केस नंबर: Criminal Appeal No. 5171 of 2026
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन
फैसले की तारीख: 2 नवंबर 2026
