सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादती और हिंसा से जुड़े वीडियो, हलफनामे, याचिकाएं तथा अन्य सबूत हाई-पावर्ड जांच समिति (HPEC) को सौंपने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह आदेश समिति की उस रिपोर्ट पर विचार करने के बाद दिया, जिसमें बताया गया कि व्यापक प्रचार और कई सार्वजनिक नोटिस जारी करने के बावजूद बहुत कम शिकायतें मिली हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने समिति से कहा कि वह नई शिकायतों का अनिश्चित समय तक इंतजार करने के बजाय उपलब्ध सामग्री के आधार पर अपनी जांच आगे बढ़ाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ित व्यक्ति अपना नाम, मोबाइल नंबर या अन्य व्यक्तिगत जानकारी बताए बिना शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
149 अखबारों में नोटिस के बावजूद समिति को नहीं मिली पर्याप्त शिकायतें
पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली जांच समिति ने कोर्ट को बताया कि शिकायतें आमंत्रित करने के लिए किए गए प्रयासों का अपेक्षित परिणाम नहीं मिला।
पीठ ने समिति की 31 अक्टूबर की कार्रवाई रिपोर्ट का परीक्षण किया। इसके अनुसार, 17 अक्टूबर को देशभर के 149 समाचार पत्रों में नोटिस प्रकाशित कर लोगों से शिकायतें मांगी गई थीं। इसके अलावा ऑनलाइन पोर्टल और ईमेल की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई थी। शिकायतें व्यक्तिगत रूप से या रजिस्टर्ड डाक से भी भेजी जा सकती थीं।
पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर समिति ने 21 अक्टूबर को दोबारा सूचना जारी की। इसके बावजूद पोर्टल पर बेहद कम शिकायतें दर्ज हुईं और ईमेल पर एक भी शिकायत नहीं मिली।
समिति ने 29 अक्टूबर को अपने कार्यालय में सुनवाई भी की, जिसका प्रचार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से किया गया था। उस दिन केवल एक शिकायतकर्ता उपस्थित हुआ और उसने हलफनामा दाखिल किया। कुछ पुलिसकर्मी भी समिति के सामने पेश हुए।
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि उसके समक्ष पहले से दाखिल याचिकाएं, हलफनामे और अन्य संबंधित सामग्री जांच समिति को भेजी जाए।
याचिकाकर्ताओं ने समिति की रिपोर्ट पर उठाए सवाल
कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने समिति की रिपोर्ट पर आपत्ति जताई। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ताओं ने ऑनलाइन पोर्टल शुरू होने से पहले ही समिति को एक प्रतिनिधित्व दिया था और पोर्टल शुरू होने के बाद दूसरा प्रतिनिधित्व भी प्रस्तुत किया था।
उनके अनुसार, याचिकाकर्ताओं को बताया गया था कि उनकी प्रस्तुत सामग्री पर उचित समय पर विचार किया जाएगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि पुलिस की कथित ज्यादती से संबंधित सामग्री पहले ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जा चुकी है। इसे जांच समिति के पास भेजा जा सकता है, ताकि प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति को अलग से समिति के सामने उपस्थित न होना पड़े।
ग्रोवर ने यह आरोप भी लगाया कि हिंसा और पुलिस की कथित ज्यादती की घटनाओं को लेकर एक भी FIR दर्ज नहीं की गई है।
शंकरनारायणन ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई नहीं होने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में स्पष्ट किया था कि जांच समिति का गठन दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में बाधा नहीं बनेगा, लेकिन अब तक ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि समिति के गठन का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस अधिकारी या उनके वरिष्ठ अधिकारी प्रदर्शन स्थल पर तैनात किसी कर्मचारी के अनुचित आचरण का पता चलने पर उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकते।
केंद्र ने कहा, हिंसा से प्रभावित लोग स्वयं शिकायत करें
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जनहित याचिका दाखिल करने वाले व्यक्तियों को घटनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी होना जरूरी नहीं है। उनके अनुसार, हिंसा से प्रभावित लोगों का स्वयं समिति के सामने आना उचित होगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों से प्रभावित व्यक्तियों को शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करने को कहा।
पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा जमा किए जाने का दावा की गई सामग्री और वास्तव में समिति तक पहुंची सामग्री के बीच अंतर दिखाई दे रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं के पास मौजूद सभी संबंधित वीडियो, दस्तावेज, शिकायतें और हलफनामे समिति को भेजे जाएं। कोर्ट ने कहा कि पहचान उजागर किए बिना दर्ज शिकायतों की भी समिति जांच करे।
समिति से एक सदस्य को हटाने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक एल. आर. बिश्नोई का व्यक्तिगत कारणों से जांच समिति से अलग होने का अनुरोध भी स्वीकार कर लिया।
जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस शालिंदर कौर और सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला भी शामिल हैं।
क्या है CJP प्रदर्शन का मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादती और पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा के आरोपों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाई-पावर्ड जांच समिति गठित करने का आदेश दिया था।
CJP के नेतृत्व में 20 जून को जंतर-मंतर से शुरू हुआ प्रदर्शन बाद में कई शहरों तक फैल गया था। आंदोलन का मुख्य मुद्दा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग थी।
20 जुलाई को दिल्ली में संसद की ओर मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हुई थी। संसद की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने लाठियों और आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया था।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार द्वारा CJP की अन्य मांगें स्वीकार किए जाने के बाद 25 जुलाई को आंदोलन समाप्त कर दिया गया था।
