सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत लंबित अयोग्यता याचिका पर दो महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दाखिल याचिकाओं का शीघ्र निस्तारण होना चाहिए और उन्हें लंबे समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। सिंघार ने निर्मला सप्रे के खिलाफ अयोग्यता संबंधी शिकायत पर फैसला होने में देरी को चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में शीघ्र निर्णय का निर्देश देने से इनकार करने वाले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रुख पर भी असहमति जताई।
दल-बदल संबंधी याचिकाओं पर जल्द निर्णय जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता संबंधी मामलों का समय पर निस्तारण आवश्यक है। विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में पर्याप्त समय बाकी होने के आधार पर ऐसी याचिकाओं पर निर्णय टालना उचित नहीं है।
इससे पहले हाईकोर्ट ने उमंग सिंघार की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट का मानना था कि मामला विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष विचाराधीन है और तत्काल हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा था कि निर्मला सप्रे ने कांग्रेस से इस्तीफा देने या भाजपा में शामिल होने से इनकार किया है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताई। पीठ ने स्पष्ट किया कि तत्काल सुनवाई की आवश्यकता न होने या विधानसभा का कार्यकाल बाकी रहने के बावजूद दसवीं अनुसूची के तहत दाखिल याचिकाओं का शीघ्र फैसला होना चाहिए।
कोर्ट ने मामले के लंबे समय से लंबित रहने का संज्ञान लेते हुए विधानसभा अध्यक्ष को दो महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का आरोप
उमंग सिंघार ने जुलाई 2024 में निर्मला सप्रे के खिलाफ अयोग्यता याचिका दाखिल की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि सप्रे ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गईं।
निर्मला सप्रे ने 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बीना विधानसभा सीट से जीत हासिल की थी।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने दलील दी कि सप्रे कांग्रेस छोड़कर विरोधी राजनीतिक दल के लिए प्रचार कर रही थीं, लेकिन इसके बावजूद विधानसभा अध्यक्ष ने अयोग्यता संबंधी कार्यवाही शुरू नहीं की।
तन्खा ने इस मामले को संविधान की दसवीं अनुसूची के उद्देश्य को कमजोर करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल छोड़ने के आरोपों के बावजूद अयोग्यता याचिका पर कार्रवाई नहीं होना दल-बदल विरोधी कानून के लिए गंभीर स्थिति है।
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान शुरू हुआ विवाद
सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से पहली बार विधायक बनीं निर्मला सप्रे को लेकर विवाद मई 2024 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान शुरू हुआ था।
आरोप है कि उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता ली थी।
हालांकि, बाद में सप्रे ने कहा कि उन्होंने न तो कांग्रेस से इस्तीफा दिया है और न ही औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है।
अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार विधानसभा अध्यक्ष को उनके खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिका पर दो महीने के भीतर फैसला करना होगा।
