अतिरिक्त बिक्री कर लगाने का अधिकार राज्यों को, सुप्रीम कोर्ट ने 1974 के संविधान पीठ के फैसले को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि राज्य सरकारों को बिक्री कर पर अतिरिक्त कर या सरचार्ज लगाने के अधिकार से संबंधित 1974 का संविधान पीठ का फैसला अब भी प्रभावी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सात जजों की संविधान पीठ ने करीब 27 साल पहले भेजे गए कानूनी सवाल पर दोबारा विचार करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने सर्वसम्मति से कहा कि संबंधित कर कानूनों में संशोधन या उनके स्थान पर नए कानून लागू होने और 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था शुरू होने के बाद यह मामला अब केवल अकादमिक महत्व का रह गया है।

संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के अलावा जस्टिस के वी विश्वनाथन, जस्टिस एस वी एन भट्टी, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस एन वी अंजारिया, जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस वी मोहना शामिल थे।

मुख्य न्यायाधीश ने अपने और पांच अन्य जजों की ओर से फैसला लिखा, जबकि जस्टिस के वी विश्वनाथन ने अलग से सहमति वाला फैसला दिया।

1974 के संविधान पीठ का फैसला अब भी लागू

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एस कोडर बनाम केरल राज्य (1974) मामले में पांच जजों की संविधान पीठ का फैसला अतिरिक्त बिक्री कर लगाने की राज्यों की विधायी शक्ति के सवाल पर अब भी लागू रहेगा।

उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देय बिक्री कर के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में लगाया गया अतिरिक्त कर या सरचार्ज, बिक्री कर की दर में वृद्धि के समान है। इसे व्यापारियों की आय पर लगाया गया कर नहीं माना जा सकता।

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सात जजों की पीठ ने दोहराया कि ऐसा कर संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II की प्रविष्टि 54 के अंतर्गत आता है, जैसा कि यह प्रावधान उस समय लागू था। यह प्रविष्टि राज्यों को वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर कर लगाने का अधिकार देती थी।

कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त बिक्री कर लगाने की राज्य विधानसभाओं की विधायी क्षमता का निर्धारण एस कोडर मामले में स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार ही होगा।

सात जजों की पीठ ने दोबारा सुनवाई क्यों नहीं की?

संविधान पीठ ने पाया कि कर कानूनों में बाद के बदलावों और GST व्यवस्था लागू होने के कारण संबंधित संवैधानिक विवाद का व्यावहारिक महत्व समाप्त हो चुका है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पीठ को भेजा गया सवाल अब सात जजों की संविधान पीठ द्वारा निर्णय किए जाने के लिए शेष नहीं है।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक मुद्दे की नए सिरे से जांच किए बिना संदर्भ का निस्तारण कर दिया।

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ओडिशा बिक्री कर कानून के प्रावधान को दी गई थी चुनौती

यह मामला उड़ीसा बिक्री कर अधिनियम, 1947 की धारा 5A को चुनौती दिए जाने से शुरू हुआ था। इस प्रावधान के तहत व्यापारियों के वार्षिक कारोबार के आधार पर अतिरिक्त बिक्री कर लगाया जाता था।

जिन व्यापारियों का वार्षिक कारोबार 10 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये के बीच था, उन पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त कर लगाया जाता था। वहीं, एक करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक कारोबार वाले व्यापारियों के लिए यह दर 15 प्रतिशत थी।

अपीलकर्ताओं ने इस कर को लगाने की राज्य विधानमंडल की संवैधानिक क्षमता पर सवाल उठाया था।

उनका तर्क था कि यह तय किया जाना चाहिए कि ऐसा कर संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II की प्रविष्टि 54 के अंतर्गत आता है या वास्तव में आय पर कर के समान है, जो सूची-I की प्रविष्टि 82 के तहत संसद के अधिकार क्षेत्र का विषय है।

यह विवाद अतिरिक्त बिक्री कर की प्रकृति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों की अलग-अलग व्याख्याओं से भी जुड़ा था।

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एस कोडर मामले में पांच जजों की संविधान पीठ ने अतिरिक्त बिक्री कर को व्यापारियों की आय पर कर मानने से इनकार करते हुए इसे बिक्री कर की दर में वृद्धि माना था।

सॉलिसिटर जनरल ने GST लागू होने का दिया हवाला

22 सितंबर को सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 2017 में GST व्यवस्था लागू होने के बाद संबंधित संवैधानिक विवाद काफी हद तक अप्रासंगिक हो गया है।

उन्होंने यह भी बताया कि इस मुद्दे से जुड़े अपेक्षाकृत कम मामले अब लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस संदर्भ में अब नए सिरे से संवैधानिक निर्णय की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने 1974 के संविधान पीठ के फैसले में स्थापित कानूनी स्थिति को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत फैसले की प्रतीक्षा है।

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